Saturday, 7 May 2016

जलती जड़ों की गंध

(pic - Google)

जलती जड़ों की गंध
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मैं ढूंढ रहीं हूं पहाड़ पर
रिश्तों की जड़ें।

बिना शब्दों के जहां
रिश्तों की महीन गंध बिछी है
जमीन के भीतर।
जैसे पेड़ की जड़ें
भीतर ही भीतर छू रही हैं
दूसरी जड़ों को
और पूरा जंगल महसूस रहा
" हम एक हैं "

फिर कब, कैसे आग पहुंची
जमीन के भीतर ?
जड़ें जलने लगीं धीरे-धीरे,
होने लगा जंगल धुंआ-धुंआ।
घुट रहा मिट्टी से
जड़ों का रिश्ता,
क्यों गंध आने लगी है
अब भीतर ही भीतर 
अपनेपन के जलने की?



- जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 9.4.2016

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