Thursday, 28 April 2016

नमी

नमी
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जब धरती सबसे पहले उठकर
सघन अंधेरे को धीरे-धीरे
चटाई की तरह समेट 

भोर के कोने में रख आती थी
धुंध के दरवाजे की सिक्कड़़ बजाकर 
सूरज को धान कूटने बुलाती थी
खपरे की छेद से गिरती रोशनी 
नंगे पांव ढेकी धांगती हुई
दुनिया को जगाती थी,
उसके चेहरे पर तब जो
पसीने की कुछ बूंदे जमी थी
जिंदगी की सूखी जमीन पर 
इसलिए थोड़ी सी नमी थी ।

- जसिन्ता केरकेट्टा

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