Thursday, 10 March 2016

पृथ्वी की नाभि में




पृथ्वी की नाभि में
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मैं ढूंढता हूं
वह जगह जहां
गाड़ दी गई 


मेरी नाभि की नाल,


कटने से जिसके मैं कटकर गिरा 
मां से अलग होकर पहली बार
और खो गया अचानक 
सबसे सुरक्षित कोना
मेरी मां का गर्भ,
और तब से भटक रहा पृथ्वी पर
हाथ में आग और युद्ध लेकर ...।


स्त्री, बारिश, रोशनी
हर चेहरे में तलाशता, 
पहचानने की कोशिश करता 
मां का वही चेहरा
फिर से रूकने के लिए
ठहरने के लिए...।


तलाश रहा हर काल 
अपनी ही नाल 
पृथ्वी की नाभि में।


- जसिन्ता केरकेट्टा

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