Thursday, 10 March 2016

आदमी की भाषा

(Pic By- Jacinta kerketta)

आदमी की भाषा
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पहाड़ पर बैठा अकेला
मैं देखता हूं
कैसे पेड़ की डाली 

धीरे से छुड़ाती है

पत्तों को अपने सीने से
जैसे मां बढ़ते बच्चे से 
छुड़ा रही हो दूध अपना,


हजारों उड़ते पत्तों में से एक पत्ता
अचानक ठहर जाता है करीब मेरे 
जैसे कुछ बतियाना चाहता हो
मिट्टी में मिल जाने से पहले
दो जहान की बातें...
और अचानक महसूस करता हूं मैं 
पूर्वज हर रूप में, आस-पास हैं मेरे।

तब मौन मेरी आत्मा
सुनने लगती है उसकी बातें
और इस तरह मौन देखता है 
दो आत्माएं कैसे बतिया रहीं
दो जहान की बातें...
जो नहीं हो पाती दर्ज 
कभी किसी दस्तावेज में
तब भी वे ब्रह्मांड में जीवित रहती हैं।

और इनसे परे 
दस्तावेजों के नीचे अधमरे
दबे कराहते शब्द 
कभी समझ नहीं सके
क्यों आदमी नहीं समझ पाता
आदमी की भाषा...।

- जसिन्ता केरकेट्टा।

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