Thursday, 10 March 2016

कटती पतंगें


कटती पतंगें
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उन गांवों के ठीक उपर उड़ती
हरी- नीली- पीली पतंगें खुश हैं,
बच्चे खुश हैं देख उड़ती पतंगों को। 

जमीन न सही
आकाश अभी बचा है अधिग्रहण से,
अतिक्रमण के जमने-उजड़ने के खेल से।

कहीं दूर और भी पतंगें उड़ रहीं हैं
जहां मुश्किल है पा लेना
हर आंगन को अपना आकाश,
गरीब बच्चों की आंखें टकटकी लगाए 
देखती हैं उड़ती पतंगों को।

वह पहली पतंग जो गिरी
कटकर किसी की धारदार धागे से
कुचल दी गई नीचे, वयस्क पैरों तले,
गरीब बच्चे जिनकी आंखे चमकी थी
उसे बचा लेने की एक उम्मीद से,
किसी ने नहीं देखा- कितनी गहरी
आह! उठी थी वहां सबसे पहले।

कुचली पंतग की आंखों में 
बच्चों ने देखा था
रह गए थे कुछ सवाल पथराए से,

किस उम्र ने सिखाया है तुम्हें मंझा लगाना?
किसने पैदा की पतंगों को काटने की विधि?
कहां से ढूंढ लाते हो तुम
धागों को धार करने के तरीके?
और कहां तलाशी जाती हैं
हर कटती पतंग पर खुश होने की कला?




जसिन्ता केरकेट्टा

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