Tuesday, 6 October 2015

खो गया है सच का साथ देने का साहस



डा- कपिल तिवारी, भोपाल

अश्विनी कुमार दूबे, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली

तिस्ता सीतलवाड़, समाजिक कार्यकर्ता

मंच पर मंजू कांकरिया, प्रो. विश्वनाथ( बीएचयू), प्रो. सुरेंद्र( बीएचयू)
 मेग्सेस से सम्मानित संदीप पांडे, ट्राइबल आर्ट के आर्टिस्ट व प्रो. विश्वनाथ, बीएचयू
                                           खो गया है सच का साथ देने का साहस

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गाजीपुर ( उत्तरप्रदेश ) में  जीवनोदय शिक्षा समिति व विंध्य न्यूज नेटवर्क के संयुक्त सहयोग से 3 और 4 अक्टूबर को अंतराष्ट्रीय सेमिनार सह लोक कला प्रदर्शन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। विषय था " भारतीय जनजातियां: संस्कृति व समाज।" कई बड़े वक्ता इस मौके पर देश-विदेश से उपस्थित थे। 
 कार्यक्रम में 3 अक्टूबर को भोपाल से आए डा- कपिल तिवारी ने कई बड़े व कड़े सवाल उठाए। पूरा जीवन जनजातियों के बीच काम करते हुए गुजार देने वाले डाॅ. कपिल ने कहा काम करते हुए जीवन बीत गया अब कहने के लिए शेष क्या रह गया है? आदिवासियों पर अपने अनुभव बांटने से पहले ही उनकी आंखें भरने लगी और होंठ थरथराने लगे। कुछ ऐसी हालत में रूकते-रूकते, धीरे-धीरे उनके शब्द सभागार में गूंजे और जब गूंजे तो पूरी सभा जैसे किसी घुप्प चुप्पी की आगोश में समाने लगा।

  उन्होंने कहा देश जिसे समाज कहता है। वास्तव में वह समाज सिर्फ स्वार्थी लोगों की जमात है, एक भीड़ भर है। उसमें से यदि स्वार्थ को काट दिया जाए तो इस समाज का हर आदमी अकेला रह जाएगा, निहत्था खड़ा रह जाएगा। वास्तविक अर्थ में तो सिर्फ आदिवासी ही अपने समूह के साथ बचेगा क्योंकि उनके पास एक समाज है। वह अकेला हो ही नहीं सकता क्योंकि उसके पीछे उनका समाज है, उनका अपना संसार है, उनके पूर्वजों की आत्माएं हैं। वह सिर्फ अपनी उन्ही अद्भुत शक्तियों को बचाने के लिए लड़ रहा है। देश के 125 करोड़ की जनता को खड़ा कर दीजिए वह इस समाज में अकेला ही खड़ा है। भारतीय समाज ने सत्य का चुनाव करने और सत्य कहने का साहस खो दिया है। किस समाज की स्थिति यहां दयनीय है?

आपकी मुख्यधारा को किसने तय किया है? वह मुख्यधारा जिसमें आपकी तरह जो न खाता हो, न चलता हो, न बोलता हो, उन्हें सीधे पिछड़ा और असभ्य घोषित कर दिया जाता है। मुख्यधारा में आदिवासियों को लाने के प्रयास में करोड़ों रूपये की योजनाएं चलाई जा रही जो उनतक सही मायने में पहुंचती ही नहीं। आदिवासी अपनी छोटी-छोटी धारा में मिलकर भारतीय संस्कृति को और सुंदर बना रहे हैं। आदिवासी जिस दिन इस मुख्यधारा की तरह हो जाएगा उस दिन देश में करोड़ों वर्षो की जैवविविधता, जीवन शैली, कला खत्म हो जाएगी। देश में 700 से अधिक मिट्टी के शिल्प हैं जिन्हें सिर्फ जनजातियों के हाथ ही गढ़ सकते हैं। उनके पास इतना ज्ञान है कि वह ज्ञान उन्हें विनम्र बना देता है। वे आज भी सीखना जानते हैं, अपना ज्ञान नहीं बघारते और दंभ से भरा यह मुख्यधारा उन्हें सिर्फ सिखाने पर तुला है। सामूदायिकता में ही भारत की संस्कृति है और वह सामूदायिकता आदिवासियों के पास है।

उन्होंने वर्तमान हालातों पर टिप्पणी की। कहा गो-हत्या तो नहीं करनी चाहिए लेकिन गाय के पैर बांधकर दूध कौन निकालता है? क्या इसे अच्छा कहा जा सकता है? जीव-जंतु में कोई ऐसा जीव नहीं होगा जो अपनी मां का दूध पीने के बाद किसी और जीव का दूध पीता हो मगर गाय जिसके दूध पर उसके बच्चे का हक है। यह समाज उस बछड़े को उसका हक नहीं दे पाता। देश की जनजातियां ही हैं जिनमें कुछ तो गाय का दूध सिर्फ इसलिए नहीं पीती या उसका कम प्रयोग करती है क्योंकि बछड़े का उसकी मां के दूध पर पहला हक है। जनजातियां उन्हें उनका हक देती है। सही मायने में इस तथाकथित समाज ने अपनी परंपरा को ठीक से देखने की शक्ति खो दी है।
मुंबई से आई समाजिक कार्यकर्ता तिस्ता शीतलवाड़ ने कहा कि नई तकनीक का प्रयोग समाज अपने विकास के लिए करती है। लेकिन आज तथाकथित समाज जिस तरीके से नए तकनीक का प्रयोग खूनी, हत्यारे तैयार करने के लिए कर रही है। इस विकास की परिभाषाएं तय हो रही है। आदिवासियों के विकास की परिभाषाएं ऐसे ही समाज से निकल कर आ रही है। यह खतरनाक है। आरएसएस पर जैसे ही उनकी जुबान से कुछ शब्द निकले सभा में बैठे कुछ कट्टर हिंदूवादी उठ खड़े हुए, लगे चिल्लाने। तिस्ता शीतलवाड़ फिर चीखी यह पहचान है आपके सभ्य समाज की जो लोगों से उसके बोलने की आजादी छीन लेता है, अपने तरीके से पहनने-ओढ़ने, खाने-पीने और स्वतंत्रता से जीने की आजादी छीन लेता है। आदिवासियों ने जिस तरह झारख्ंाड, ओडि़शा, छत्तीसगढ़ में अपने आंदोलन के दम पर एमओयू रोके हैं। किसी समाज में इतनी ताकत नहीं है कोई एमओयू रोक सके। यह समाज दादरी जैसी घटनाएं पैदा करने की ही ताकत रखता है।
मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित संदीप पांडे ने कहा जिन इलाकों को आदिवासियों ने वर्षो से बचाए रखा। उन इलाकों को आज सरकार नक्सल-क्षेत्र घोषित कर दिया है। आदिवासी इलाकों में नक्सलवाद के पनपने के सबसे बड़े कारण पुलिस, राजस्व व वन विभाग है। आदिवासी इलाकों में, जंगलों में घुसकर इन लोगों ने उनकी स्त्रियों के साथ, बेटों के साथ, बूढ़े-बच्चों के साथ क्रूरतम व्यवहार न किया होता तो नक्सलवाद के पनपने का कोई वजह ही नहीं था। इन इलाकों में बेहतर नेतृत्व निकलकर आए तो चीजें बदलेंगी।
यह अंतराष्ट्रीय सेमिनार एक मौका था मेरे लिए अपनी बात कहने का। मैंने अपनी कविताओं को रखते हुए झारखंड में प्रकृति के दोहन की चर्चा की। इस दौरान लंबे समय से सांस्कृतिक अतिक्रमण के खिलाफ लड़ रहे आदिवासियों के संघर्ष की चर्चा की। कहा कि आदिवासी आज उठ खड़े हुए हैं अपने को संस्थागत धर्मो की खींचतान से बचाने के लिए। अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा, अपनी पहचान पर हो रहे अतिक्रमण से रोकने के लिए। समाज सवाल उठा रहा है कि क्या आदिवासी हिंदू हैं? क्या यह ईसाई है? क्यों कोई भी धर्म इसे अपनी पहचान के साथ जीने की शर्त पर उसका विकास करना नहीं चाहता । क्यों अपनी शर्तो पर इस समाज की मदद करने की बात उठती है। पूरा इतिहास गवाह है किस तरह आदिवासी समाज की संस्कृति को खत्मकर उनकी मदद के नाम पर खुद की जड़ें मजबूत करने के लिए इसकी लाश पर सब अपने पेड़ उगा रहे हैं । चाहे वह प्यार से हो या क्रूरता से। झारखंड के 86 लाख आदिवासी और देश भर में 13-14 करोड़ आदिवासी आज इसके खिलाफ लड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अश्विनी कुमार दूबे जिन्हें इस कार्यक्रम में विंध्य न्यूज नेटवर्क की ओर से सम्मानित किया गया। लगातार लेखन व रचनात्मक कार्य करते रहने और अपने इलाकों में इसके लिए प्रयास करने के लिए उन्होंने अपने सम्मान की राशि मुझे भेंट की और लगातार संघर्षरत रहने के लिए प्रेरित किया। वे स्वयं मध्यप्रदेश में आदिवासियों के लिए लगातार कानूनी लड़ाई लड़ रहे और इस दिशा में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके अलावा विंध्य न्यूज नेटवर्क ने महाराष्ट्र से आई लेखिका मधु कांकरिया और गाजीपुर के डा. आनंद कुमार सिंह को सम्मानित किया। जीवनोदय शिक्षा समिति ने बलिया के भोजपूरी कवि तारकेश्वर मिश्रा राही, तुर्की से आई प्रो. एसटी जसल, गाजीपुर के राम बदन राय, सुल्तानपुर हरिराम बनबासी, वाराणसी से पारसनाथ यादव, बिहार से प्रो. यू कुंडला और गाजीपुर के अजीज उल हसन सिद्दकी को सम्मानित किया।
झारख्ंड के लातेहार से सामूएल बिरजीया ने असुर जनजातियों की त्रासदी को लोगों के समक्ष रहा। इसके अलावा तुर्की से आई प्रो. एसटी सजल, जमैका के प्रो. आरके मिश्रा, नालंदा के प्रो. यू कुंडला, मध्यप्रदेश के प्रो. धर्मेंद्र पारे, बीएचयू के डा.विश्वनाथ मिश्रा,डा. सुरेंद्र नायक, डा. योगेंद्र, डा. संतोष सिंह, डा.. गोपाल ठाकुर, डा. पीके उपाध्याय, डा.मनीज खान, डा.प्रमोद तिवारी ने अपने विचार रखें।
इस अंतरास्ट्रीय सेमिनार में तुर्की, जमैका, सिंगापुर, नेपाल, नालंदा, मुंबई, बनारस, हरियाणा, झारख्ंड, गाजीपुर व अन्य राज्यों से लोगों ने हिस्सा लिया। पूरे आयोजन में पीजी कालेज, गाजीपुर के प्रो. डा. नारायण तिवारी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 6 अक्टूबर 2015