Friday, 14 August 2015

लाल नदियां

 
 
लाल नदियां
............................
हजारों पेड़ों की लाश
गिरा चुकने के बाद
खून से सने हाथ
चुपचाप धोते है खुद को
सारंडा की नदियों में
तब दहाड़ें मारता है उजला पानी
किनारों के कांधे पर सर रखकर
और पूरा जंगल लाल हो उठता है।
सखुआ की डाली ठोंकती हैं
जीवित स्मृतियों का पर्चा दरख्तों पर
एक आवाज हहराती है
गवाह बनकर वक्त के कटघरे में
और दम तोड़ते सबूत इंतजार करते हैं
अंतिम सांस तक न्याय के
कदमों की आहटों का,
तब सांझ, भरोसे की आंखें
डूबने लगती है सूरज के साथ
जब कागजों पर समझौतों का ठप्पा
लगाने लगता है कोई खौपनाक ठहाका....।
सारी पड़तालें दुबक जाती हैं
और भूखी हड़तालें अंधेरे में
चुपचाप चबाने लगती हैं रोटियां
और खून के आंसू
रोती रह जाती हैं
सारंडा की लाल नदियां।
........................................................
 

No comments:

Post a Comment