Friday, 14 August 2015

डोंबारी की आवाज


डोंबारी की आवाज
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सोचता हूं आखिर क्यों ?
भोगनाडीह के घेरे की
सलाखों को थामे
फिर से निकल आने को
सिद्धो-कान्हू का
एक हूल छटपटाता है
और डोंबारी पहाड़ पर
बार-बार बिरसा मुंडा का
एक उलगुलान फिसल जाता है ।
मैं धरती से मांगने लगता हूं
थोड़ा सा खुरदुरापन
और जोहने लगता हूं मुंह
किसी चट्टान की रगड़ का
चाहता हूं एक मुट्ठी
जिसमें थोड़ा आग हो।
एक जिंदा आग की लकीर
गोदना चाहता हूं माथे पर आज
और सोख लेना चाहता हूं आंसू
जिसकी बाढ़ पर बसता हो समाज।
मैं चुनना चाहता हूं वह बिखराव
जहां अकेला पड़ जाता है हर दांव
जिसकी कीलों से उखड़ गए
कई योद्धाओं के पांव।
मैं मांगता हूं एक नया आगाज
जब-जब बिरसा मुंडा
खोलें समाधि पर
अपनी स्मृति की दराज
वो पाएं हूल को सुनते हुए
डोंबारी की आवाज....।।

- जसिन्ता केरकेट्टा

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