Friday, 14 August 2015

विकास की धूल

 
 
 



 
विकास की धूल
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फांकती हुई विकास की धूल
दिन-रात खांसती हैं जिंदगी
हृदय की उम्र सिमट गई है,
आंखें उम्मीदों की
दिन गिन रही अंगूलियों में।
 
अब नहीं जाते कोई कदम
खेतों की ओर वहां
पैरों को लत पड़ चुका है
दौड़ पड़ने को कोयले लदे
खड़े ट्रकों के पीछे
पैनम के रास्तों पर,
कुदाल ने नहीं चखा
लंबे अरसे से
किसान के कंधे में झूल
गीतों का रस
वो अब निकलता है
घर से चुपचाप
किसी चोर की तरह।
 
और सपने दब जाते हैं रात
अचानक रौंदकर निकल गए
किसी ट्रक के नीचे
तब अपने हिसाब से आकर
जीवन की कीमत तय करती हैं
उंची बोलियां
और रफा-दफा हो जाती हैं
इस झमेले में कई जिंदगियां।
 
क्या-क्या मिला है मुआवजे में
जब पूछती है सच्चाई किसी से
तब कोने में बैठा बूढ़ा अनुभव
बस इतना ही कह पाता है
फांकती हुई विकास की धूल
दिन-रात खांसती हैं जिंदगी
हृदय की उम्र सिमट गई है,
आंखें उम्मीदों की
दिन गिन रही अंगूलियों में।
 
 
- जसिन्ता केरकेट्टा


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