Wednesday, 12 August 2015

वो आधे घंटे का परिचय


 
बी.एच.यू में हिंदी विभाग के प्रध्यापक, वाराणसी से प्रकाशित होने वाली पत्रिका " परिचय " के संपादक व कवि प्रो.श्रीप्रकाश शुक्ल रविवार (6.7.2014) को दूसरी बार रांची में थे। मगर मेरी मुलाकात उनसे पहली बार हो रही थी। स्थान राज्य अतिथिशाला, और महज आधे घंटे का वक्त। और पल-पल महसूस हुआ वे अपनी कविताओं की तरह बेहद सहज और सरल हैं। मेरे जीवन के संघर्षो व उतार.चढ़ाव के बीच मेरी चंद कविताओं को दोबारा-तिबारा ध्यान से सुनते हुए उन्होंने सहसा कहा " मैं अपनी पत्रिका के संपादकीय में तुम्हारा ज...िक्र करूंगा तुम्हारी कविताओं के साथ।" इतना भर सुना था मैंने कि लगा मन की परती जमीन पर एक साथ कई मडुआ के पौधे उग आए हैं। पौधे की फुलंगी पर मानो जिसका दाना-दाना जीवंत हो हवाओं के साथ नाच रहा हो।
बंजर और पथरीले जमीन पर भी रास्ता निकाल कर उग आने वाले साखू के पेड़ों की चर्चा करते हुए उन्होंने एक शब्द में जैसे साखू के जंगलों के बीच मेरा पूरा व्यक्तित्व तलाश लिया हो और एक ही शब्द "जीवट" से जैसे मुझे किसी बड़ी उपाधी से नवाज दिया हो, और सहसा मुझे सारंडा जंगल के भीतर कई सालों से खड़े, तने साखू के पेड़ याद आने लगे। पिछले साल जहां सारंडा के अंदर पहाड़ों से उतरते वक्त मैंने पसीने के साथ बारीश की ठंडी बूंदों को जैसे महसूस किया था। जंगल में भटकते वक्त साखू के पेड़ों को जैसे आंखों से नाप लेने की कोशिश की थी। सहसा लगा फिर एक बार उस कमरे में वो जंगल उग आया हो।
मेरी कविता सुनने के दौरान कोयल नदी के मंगरदाह में गांव के बच्चों के छलांग लगाने की बात सुनते ही उन्होंने कहा " जहां हलचल है वहां जीवन है और इस एक लाईन में तुमने कई सभ्यताओं की बातें कह दी हैं।" आगे मैं कहां कुछ सुन पाई ...... बस मेरा मन वोल्गा से गंगा तक के रास्ते तय करने लगा था। तंद्रा टूटी तभी अचानक उनकी पत्रिका " परिचय " के साथ उनकी कविता संग्रह " बोली बात " मेरी हथेलियों पर दिखी मुस्कुराती हुई सी। और जैसे लगा कि उनकी एक कविता " कील" की तरह मैंने कोई सुंदर चीज हासिल कर ली हो। जैसे एक बच्चा मां के नाक की कील लेकर भागा था और मां दुनिया की सबसे सुंदर चीज को बचाने के लिए दौड़ पड़ी थी।
अपने समय के अनुपम कवि को अपने शहर में पाकर और उनसे पहली बार मिलकर लगा कई सालों के लिए ढेर सारी उर्जा कहीं मेरे अंदर संचित हो गई है। कुछ ऐसे ही एहसासों के साथ मैंने घड़ी देखी शाम के 4.45 बजे थे। बाहर बारिश थम चुकी थी और मैं अथाह उर्जा को अपने अंदर समेटे बाहर निकल गई......।।

No comments:

Post a Comment