Wednesday, 12 August 2015

स्त्री देह ही निशाने पर क्यों ?





                                                      स्त्री देह ही निशाने पर क्यों ?
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                            http://www.imdb.com/title/tt3786270/combined
अमेरिका में रह रही डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर अनामिका बंधोपाध्याय इन दिनों सेक्स टैबू पर आधारित अपनी नई फिल्म " द थर्ड ब्रेस्ट " के निर्माण को लेकर काफी व्यस्त हैं। Chhayabajee Motion Pickchars के बैनर तले बन रहीं उनकी फिल्म की विषयवस्तु पर काफी चर्चा हो रही है। अनामिका ने इससे पहले लालगढ़ व सिंगूर की घटनाओं पर भी फिल्में बनायी हैं। इनके कारण वे न सिर्फ गिरफ्तार हुई, बल्कि परिस्थितियों ने ऐसा मजबूर किया कि कोलकाता यूनिवर्सिटी की अपने लेक्चरर की नौकरी से हाथ भी धोना पड़ा है।
लीक से हटकर ज्वलंत मुद्दों पर बनी उनकी फिल्मों की देश - विदेश में अपनी एक अलग पहचान है। अनामिका ने अपने काम से लोगों का विश्वास जीता है। उनकी नई डाॅक्यूमेंट्री फिल्म " द थर्ड ब्रेस्ट " के नाम का चयन उन्होंने दक्षिण भारत की एक पुरानी कहानी से लिया है।
महिलाओं पर हिंसा के लिए उनके शरीर को लक्ष्य बनाया जाता है। चाहे वह दुष्कर्म हो या चाहे घरेलू हिंसा। इस संबंध में जब अनामिका ने एक मंत्री से इसके पीछे की मानसिकता, यौन शिक्षा के माध्यम से बीमार मानसिकता को स्वस्थ बनाने, एक समझ पैदा करने की पहल की बाबत पूछी, तो उन्हें पता चला कि यहां कोई इसपर बात नहीं करना चाहता। उनका कहना था कि इस तरह की बातें तो " अनइंडियन" है!!

फिल्म यह सवाल उठाती है कि यदि इस तरह की बातें " अनइंडियन " है, तो अजन्ता, एलोरा की नक्काशियां, राधा-कृष्ण की पूजा, अर्धनारिश्वर व शिवलिंग की पूजा के पीछे कौन सी सोच है? आखिर, महिलाओं को हिंसा व दुष्कर्म का शिकार बनाने वाले लोग कौन हैं और कहां के हैं?
इसी देश में ंरहने वाले आदिवासी समाज की सोच इतर क्यों है? आदिवासी समाज में आज भी स्त्री -पुरूष का संबंध सहज -सरल है। उनकी मान्यताएं, परंपराएं, संस्कृति, उनका धूमकुडि़या और अखड़ा मुख्यधारा के समाज को आज भी कई नई बातें सिखाने में सक्षम है। जबकि, खुद को मुख्यधारा बताने वाला समाज उनके शिक्षण केंद्र घोटुल और धुमकुडि़या को यौन क्रिया का अड्डा बताने से गुरेज नहीं करता। अखड़ा में स्त्री-पुरूषों के एक साथ एक-दूसरे की कमर में हाथ डाले नृत्य करता देख निगाहें चुराता है।

लेकिन आदिवासी समाज में भी धीरे धीरे स्थितियां बदलने लगी हैं। मुख्यधारा के प्रभाव में आते आदिवासी समाज की महिलाएं अब अकेली जंगल जाने से डरने लगी हैं। बाजार भी अकेली नहीं जाना चाहतीं। अब उन्हें लगता है कि साड़ी का पल्लू खिसक जाने से दिख रहे उसके मांस पर भूखे भेडि़ए की निगाहें अटकती हंै।
अनामिका यह कहने का प्रयास कर रही है कि पुरूषों का वर्चस्व कायम रखने के क्रम में बदला लेने, अपमानित करने, तोड़ने, नीचा दिखाने, जलील करने और महिलाओं के उठते सिर को कुचलने के लिए स्त्री देह ही निशाने पर क्यों? दुष्कर्म का खंजर हर दिन किसी न किसी गली - कुचे में स्त्री देह को लहूलुहान करता हुआ रूह तक को चीरता हुआ निकल जाता है और पुरूष वर्चस्व को बरकरार रखने को बेताब लोग इस विषय पर बात करने से कतराते हुए इस विषय को ही सिरे से खारीज करते हैं। इसे " अनइंडियन " बताते हैं।
इस दिशा में लोगों को मंथन करना चाहिए और ऐसी बीमार मानसिकता को स्वस्थ बनाने की दिशा में नई सोच, नई पहल की जरूरत है। इस फिल्म का प्रदर्शन भारत समेत विश्व के कई देशों में होगा। इस डाॅक्यूमेंट्री में मेरी चंद कविताएं भी गूंजेगी। इसके लिए मैं शुक्रगुजार हूं। अनामिका को मेरी ढेरों शुभकामनाए।

(अनामिका बंधोपाध्याय की फिल्म द थर्ड ब्रेस्ट 15 जनवरी 2015 को यूएस में प्रदर्शित की गई। प्रोडक्शन, रिसर्च में सहयोग के लिए उन्होंने अपनी फिल्म की टीम में मेरा नाम शामिल किया है। मैं उनकी शुक्रगुजार हूं।)

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