Friday, 14 August 2015

बवंडर और दिशाएं

 
बवंडर और दिशाएं
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मुट्ठी भर दाना
बचा रहे पृथ्वी पर
इसलिए भूसा ओसाने ...

खड़ा है एक गांव
गर्म हवाओं के खिलाफ
खलिहान में सूप लेकर ।
ऐसी जद्ोजह्द की एक शाम,
खपरों की छेद से
देख लेती है डिबरी की रोशनी
पगडंडियों से चुपचाप
चले आते बवंडरों को,
दौड़ पड़ती है
धान की ताजी गंध से तार
धूप के अंगोर से धार
हंसिया, गड़ा देने को
बवंडरों के सीने पर,
ठिठकती है देख,
तेज हवाओं की चाकू से
चाक हुए गांवों की घाव पर
दिशाएं डाल रही हैं चीरकर
उनके ही इतिहास का चिथड़ा,
और वह कर रहा खुद को
धीरे-धीरे घुप्प अंधेरे में
दिलासा देती दिशाओं के हवाले।
अंततः दिशाएं
उजाले का वादा कर
धकेल देती हैं उन्हें
बवंडरों के बीच
और झाड़ लेती हैं पल्ला
देकर हवाला
" पृथ्वी को बचाने के लिए
किसी न किसी को तो
कुर्बानी देनी ही होगी। "
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जसिन्ता केरकेट्टा

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