Friday, 14 August 2015

आग और उम्मीद के फूल

(Pic By- Jacinta Kerketta) 
सारंडा के फूल
...............................
नींद में डूबी बेखबर
फूलों की खुशबू
उठती है तिलमिला कर...
जब नथुने भरने लगते हैं
मशीनों की गंध से
और फटने लगते हैं
कान, विस्फोटों से।
उठकर महसूसती है जैसे
एक करारा तमाचा
किसी ने जड़ दिया हो
अलसाए चेहरे पर
और उभर आया है
उसके अस्तित्व पर
कोई गहरा गड्ढा।
फिर भी वह उठकर
चुनने लगती है
गंध अपनी जड़ों की,
उड़ रहे हवाओं में
जिसके परखच्चे बारूद से।
टांग दी गई है
बारिश की लाश
किसी पेड़ पर,
ठीक जंगल के उपर
तश्तरी सा आकाश
गिद्धों से पट रहा है
और नदियों की आंखों से
खून, आंसू बन बह रहा है।
कुदाल, गैंता और कुछ हाथ
कोने में चुपचाप सिसक रहे हैं।
दरवाजे पर खड़े
चंद कागजों के इशारे पर
लगते हैं वो दफनाने
अपने ही गुस्से को।
तब चुपके से
बारूद और मशीनों की
गंध के गले पर वार कर
खुशबू उठती है
और घुस जाती है
जंगल में हर फूल के भीतर।
और उग आता है सुबह
फिर कोई नया फूल
आग और उम्मीद बन
सारंडा के अंदर कहीं।
........................................
जसिन्ता केरकेट्टा

No comments:

Post a Comment