Wednesday, 12 August 2015

प्रतिरोध का "एक बैजनी रंग"



प्रतिरोध का "एक बैजनी रंग"
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वो ठिठकी
उसके ठिठकने से
एकपल को सन्नाटा भी ठिठका
जाने क्यों लगा
दबे पांव कोई चल रहा है संग
पलटकर देखा
उसके वजूद से निकलकर
साए की तरह चल रहा था
"एक बैजनी रंग"

उपन्यास गायब होता देश कई रंगों में रंगा नजर आता है, लाल रंग के खून के छींटे हों या रियल स्टेट के पीछे का कोई काला रंग लेकिन इन सबसे परे कोई रंग यदि पाठकों को बांधता है तो वह है बैजनी रंग। जब-जब बैजनी रंग का जिक्र आता है ऐसा लगता है, कहने को तो रंगों का भेद मिट रहा है, लेकिन रंगभेद की दुनिया आज भी जीवित है सांस लेती हुई, कई रूपों में । और यह अपनी पूरी ताकत हर रंग को गौरवर्ण में परिवर्तित कर देने के लिए झोंक रहीं है । ऐसे में कोई रंग जैसे पूरे परिवेश को अपने रंग में रंगने लगता है तो वह है बैजनी रंग। आदिवासियों का रंग सांवला है और जो समाज गौरवर्ण को सबसे श्रेष्ठ समझता है वही समाज अपने देवी देवताओं में से अधिकांश ऐसे देवताओं की शक्ति को श्रेष्ठ मानता है जो सचमुच बैजनी रंग से रंगे हुए हैं। चाहे वे कृष्ण हांे या शिव।
गायब होता देश में उसी बैजनी रंग से रंगी है अनुजा पाहन भी। उपन्यास में आदिवासी स्त्रियों की पीड़ा, चाहे वह महानगर जाकर अपने सपनों के टूटने का दर्द हो या लौटकर अपने गांव-घर वापस आकर चुप्पी की चादर ओढ़कर टूटे सपनों को फिर से जोड़ने की जद्दोजहद हो, बड़ी बारीकी से उनके मनोभावों को अभिव्यक्त किया है उपन्यासकार ने। इतना ही नहीं इसके पात्र किषन विद्रोही के उपर यह बैजनी रंग किस तरह रह-रहकर हावी होता है और उसके पूरे मनोभाव को जिस तरह चित्रित किया गया है वह भी एक वास्तविकता ही है। बैजनी रंग के जादू से कौन बच सका है लेकिन यह बैजनी रंग का उसका अपना जादू भी आदिवासी बालाओं को बचा पाने में असमर्थ है। बैजनी रंग के ये पहलु भी स्पष्ट नजर आते हैं।

सिर्फ आदिवासी स्त्रियों की ही नहीं उपान्यासकार उस वर्ग की स्त्रियों के अंदर उठते प्रतिरोध को भी प्रस्तुत करते हैं जहां पुरूषो ने अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए हर कायदे अपने ही हित के हिसाब से गढ़े हैं। जब किशन विद्रोही की पत्नी कमला यह कहती हैं - "वह प्रेमी था या रूपलोभी, यहां-वहां भटकता रहता। कभी इसके मन-देह के द्वार पर तो कभी उसके। मेरे अंदर आग सी सुलगती रहती। इस एकनिस्ठा की चाह केवल स्त्रियों से ही क्यों? उससे ही एक ठौर स्थिर रहने की कामना क्यों? और पुरूस समूहभोग के लिए आजाद। एक चतुर शिकार जो शिकाररगाह में अपने पैने हथियारों के साथ हमेशा शिकार के लिए चैकस-चैकन्ना। मेरे अंदर हमेश कुछ खदबदाता रहता। कुछ खौलता सा।"
उपन्यासकार इन शब्दों में सिर्फ कमला की मनोदशा को ही नहीं पूरी स्त्री समाज द्वारा पुरूष सत्ता से पूछते सवालों को उठाते हैं। समाज के लिए आंदोलनों में हिस्सा लेती स्त्रियां उन चिन्हों को भी सिरे से नकार रहीं जो जबरन उनके सौभाग्य के प्रतीक बना दिए गए हैं। इन चंद पंतियों में -" गुलामी के जिन-जिन चिन्हों को सौभाग्य का प्रतीक बता थोपने की कोषिष, हजार-हजार सालों में की गई थी, उसे आंदोलन की साथिनों ने एक झटके में बिलगा दिया था। न सिंदूर, न मंगलसूत्र, न चूड़ी-कंगन, न पायल-बिछिया, न नथनी-नकबेसर। कथित सौभाग्य और सजावट की कोई भी निषानी नहीं।" इन शब्दों में वे हजार-हजार सालों से अपनी गुलामी के प्रतिरूपों को नई परिभाषाएं देकर ढोने को मजबूर हैं, उन प्रतिरूपों पर वार करते हुए स्त्री स्वतंत्रता को मजबूती से रखते हैं। जब कि पुरूष सत्ता ने अपने को इन प्रमाणों से दूर रखा है ताकि समूहभोग के लिए आजाद रहे। जिसका विरोध कहीं न कहीं आज हर स्त्री कर रही है।

इन सबके परे कमला किशन विद्रोही को गहराई से समझने का प्रयत्न करती है। मां के प्रेम से महरूम एक इंसान अपनी मौसी के लाड-प्यार में जिन परिस्थितियो में बढ़ता है। वह ताउम्र हर स्त्री में उसी प्रेम की तलाश में भटकता है और स्वयं को एक बच्चा समझकर प्रेम पाना अपना अधिकार समझता है , प्रेम देने की परवाह किए बगैर। और मुझे अनायास ही कमला की जगह मेरी मां की तस्वीर आंखों में उभर आती है। एक स्त्री की देह और आत्मा देानों पर हिंसा की पराकाष्ठा और बदले में स्त्री के प्रेम की पराकास्ठा मैंने देख षायद कच्ची उम्र में देख ली थी।
अपनी कविता की चंद पंतियां याद आ रही है जब मां को बाजार जाने से पहले अपने माथे के जख्म को सिंदुर से ढकते हुए देखा था मैंने एक दिन।

"ओ सांवरी
तुम्हारे माथे पर यह जख्म कैसा
कोई गाढ़ा लाल सा
जैसे जम गया हो रक्त
माथे पर तुम्हारे न जाने
कई सदियों से पुराने घाव सा
और तुम उसपर डाले फिरती हो
डहडहाता लाल रंग का सिंदूर
जिससे छुपा सको जख्म अपने
और खुष हो जमाने को देकर
अपने सुहागन होने का प्रमाण।। "

उपन्यासकार रणेंद्र चाहते तो किशन विद्रोही जो प्रमुख पात्र है, अनुजा पाहन के प्रति उठते उनके मनोभावों को छुपा लेते और उसका एक आर्दश रूप प्रस्तुत कर सकते थे लेकिन वे उस सच्चाई को सामने उजागर करते हैं जो आज भी अनुजा पाहन की तरह बैजनी रंग से रंगी कई स्त्रियों के इर्द-गिर्द मंडराता हुआ सच है। मुख्य पात्र के अंदर चलती दोहरी मनोदशा को भी वे बड़ी ईमानदारी से रख देते हैं। किशन विद्रोही की मनोदशा आज भी बाह्य जगत में बैजनी रंग के प्रति कईयों के अंदर उठते मनोभावों को प्रदर्शित करता है। अनुजा के कांधे से ढलके आंचल को देखकर देह की परिभाषा कोई आदिवासी पुरूष शायद नहीं गढ़ पाता हां किशन विद्रोही के रूप में उन्होंने उस पूरे समाज के मनोभाव को खड़ा कर दिया है जो सर पर आंचल ढंकने के कट्टर हिमायती हुआ करते हैं। लेकिन आंचल सरकते ही देह के एक टुकड़े पर कई परिभाषाएं गढ़ते दिखते हैं। किसी ने यह भी खूब कहा है जिस देश में स्त्री के पैर देखकर प्रेम हो जाता है वहां पूरी स्त्री दिख जाए तो फिर क्या होगा। और इसके विभत्स रूप समाज में हर दिन दिख रहे हैं। इन सबके बाद भी वे बैजनी रंगों वाली उस स्त्री को अंत तक अपने निर्णय पर अडिग दिखाते हैं और अचानक वह बैजनी रंगों वाली स्त्री पूरी आदिवासी नई पीढ़ी की प्रेरणा बनकर खड़ी नजर आती है।
उपन्यास पाठकों को किशन विद्रोही की रहस्यमय मौत से बांधने की कोशिश प्रारंभ से ही करता नजर आता है लेकिन पाठक इस कोशिश से परे तब खुद ब खुद बंधने लगता हैं जब वे लेमुरिया की दुनिया में कदम रखता है और सचमुच मेगालिथ की शक्तियों को कहीं अपने अंदर प्रस्फुटित होता हुआ महसूस करता है। उपन्यासकार जमीन के आंदोलनों में सोनामुनी का संघर्ष, पत्रकारिता की दुनिया में अनुजा पाहन का जुझारू तेवर, जद्दोजहद व मेहनत, आदिवासी स्त्रियों की शक्ति, पुरूषो के साथ कदम से कदम मिलाकर अपने अस्तित्व के लिए लड़ने की इच्छा व क्षमता को प्रदर्शित करते हुए पूरे आदिवासी समाज की स्त्रियों की ताकत को ही रेखांकित करते हैं।
इसके साथ ही पात्र सोमेश्वर बाबा की जीवन कहानी और मेगालिथ के उर्जा -पुंज से जुड़े उनके तजुर्बे से पाठक वर्ग भी वाकिफ होता है। जो उन्हें अपनी जड़ों से और गहरे जोड़ता है। सोमेश्वर बाबा के अनुभव ससनदीरी को लेकर न सिर्फ नई आदिवासी पीढ़ी को को अपनी परंपराओं के पीछे छिपे पूर्वजों के विचारों से वाकिफ करवाता है बल्कि मुख्यधारा के सामने भी आदिवासियों के रीति रिवाज, परंपराओं के पीछे छिपे वैज्ञानिक सोच व उसके महत्व को दर्शाता है।
आज आदिवासी समाज के समक्ष सबसे बड़ा संकट आर्थिक संकट है। आर्थिक संकट से उबारने के प्रयत्नों के बिना इस समाज को मजबूत बनाए रखना मुश्किल है। आजीविका के तरीके जैसे-जैसे बदल रहे हैं आदिवासी अपनी संस्कृति, अपने समाज से कट रहा है। हमें कटता हुआ वह समाज दिख रहा है लेकिन आजीविका की उनकी अपनी संस्कृति को कैसे बचा सके, इसपर कोई बहस नहीं हो रही। उसके जीने की अपनी संस्कृति को बचाए बिना आदिवासियों के देस को गायब होने से नहीं बचाया जा सकता। उनका अस्तित्व जल-जंगल-जमीन से जुड़ा है और गायब होता देश इसी संकट की ओर इशारा करता है। यह न सिर्फ उनकी आजीविका के संसाधनों को बचाए रखने बल्कि उनकी आजीविका की एक पूरी आदिवासी संस्कृति को कैसे बचाया और बनाया रखा जा सके, इस पर गंभीरता से चिंतन करने के लिए एक बहस के नए दरवाजे खोलता है।
इतना ही नहीं मीडिया पर भी उपन्यासकार की कलम वार करती है। आंदोलनों से निकला एक विद्रोही और पत्रकार पर काॅरपोरेट कैसे हावी हो जाता है। दबाव बढ़ता ही जाता है लेकिन मन तो विद्रोही ही होता है अंत तक। दिन-भर की थकान के बाद घर लौटकर वह अपने अंदर ही कहीं अपना एक कोना तलाशने की कोष करता है और इसी तलाश में रात कट जाती है और वह छटपटाता रहता है। तब अनायास ही वह अपने कमरे के कैनवास पर बैजनी रंग रंगने लगता है। बाहरी दबाव और अंदर की छटपटाहट बढ़ती जाती है और ऐसे में नशा साथी बनने लगता है और फिर एक दिन दुनिया से कैसे , किसके द्वारा और कब कूच कर जाता है। किसी को पता नहीं चलता। यह तब पता चलता है जब उनके कमरे की दिवार पर टंगी कोई पेंटिग नजर आ जाती है। " पीछे दीवार पर सेमल के छतनार गाछ की पेंटिग टंगी हुई। टहटह सुर्ख फूलों से लहू टपकता हुआ। चेहरे पर भयानक दर्द की लकीरें, छाती पर एक तीर धंसा हुआ, लहू बहता हुआ, सामने बहेलिए के वेष में हूबहू विद्रोही सर जैसा ही एक शक्स। " शायद इन पंतियों से उनके जाने के बाद उनकी मनःस्थिति का पता चलता है पाठकों को। इसके साथ ही विजन के साथ अपनी कलम को तलवार बनाकर लड़ने वाले पत्रकारों की बदलती परिस्थितियेां में बदलता मनोभाव व मनःस्थिति समझने के लिए ये चंद पंतियां काफी हैं।
उपन्यास सदियों से हो रहे आदिवासियों के संघर्ष के कारणों की ओर भी सबका ध्यान आकर्षित करता है। कोई क्यों हथियार उठा लेता है? इस सवाल के जवाब में इसके कारणों का समाधान की जगह हर किसी को दिखता है उनके हाथों का हथियार। और इसी के साथ मेरी कविता " मेरे हाथों का हथियार की अंतिम चंद पंतियां मैं दोहरना चाहूंगी।"

"मैं लड़ रहा हूं उन सारे दर्दो के साथ
जो मेरे सीने में कहीं गहरे गड़े हंै
लड़ रहा हूं सदियों से
लोगों को ये बस लड़ाई लगती है
नहीं दिखता
मेरा सदियों पुराना दर्द
नहीं दिखता
मेरा सदियों पुराना जख्म
नहीं दिखता
सदियों से दूसरों द्वारा
लूटते.खसोटते वक्त
मेरी देह पर गढ़ गए
जहरीले नाखूनों के दाग
उन्हें दिखता है
सिर्फ मेरी जमीन, जंगल
और मेरे हाथों का हथियार ..........।।


मंच पर वरिष्ठ पत्रकार डा. रामशरण जोशी, डा. आनंद तेलतुम्बडे, डा. अजय वर्मा, पंकज मित्र, तिलक बारी, उपस्थित थे। कार्यक्रम में दयामनी बारला, महादेव टोप्पो, डा. रविभूषण, डा. प्रणय कृष्ण, डा. केदार प्रसाद मिणा, डा. हितेंद्र, डा. मनमोहन पाठक, डा. खगेंद्र ठाकुर सहित कई लोग उपस्थित थे।
@ जसिन्ता केरकेट्टा
 

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