Friday, 14 August 2015

अपने आदिवासी पूर्वजों को सलाम

 
स्वतंत्रता दिवस पर अपने आदिवासी पूर्वजों को सलाम
जिन्हें अंगरेजों ने 'सर' और 'रायबहादुर' की उपाधि नहीं, जेल और फांसी दी
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मुझे अपने आदिवासी पूर्वजों पर गर्व है, जिन्होेंने पूरे देश में अंगरेजों के खिलाफ सबसे पहले लड़ाई छेड़ी। यह महज संयोग नहीं कि हमारे पूर्वजों को अंगरेजों ने 'सर' और 'रायबहादुर' जैसी उपाधि नहीं दी। बल्कि, उन्हें जेल में कठिन यातनाएं और फांसी दी। उन्होंने आजादी और अस्मिता की रक्षा के लिए मौत को गले लगाना पसंद किया।

बाबा तिलका मांझी : तिलका मांझी ने अविभाजित बिहार के भागलपुर के आसपास के क्षेत्रों में अंगरेजों व जमींदारों के खिलाफ संतालों में राजनीतिक चेतना जगायी, उन्हें एकजुट किया। विद्रोह का बिगुल फूंका। पूरे संताल प्रदेश को अंगरेजों से मुक्त करने की लड़ाई लड़ी। पकड़े जाने के बाद उन्हें पूरे भागलपुर की सड़कों पर हजारों की भीड़ के सामने चार घोड़ों से घसीटा गया था, फिर चौक के एक पेड़ पर फांसी दे दी गयी। यह 1784— 1785 के आसपास की बात है। 1857 की 'आजादी की पहली लड़ाई' से काफी पहले।
वीर बुधु भगत : जन्म चान्हो प्रखंड के सलगाई गांव मे हुआ था। उन्होंने 1820 में जमींदारों, सूदखोरों, ठेकेदारों और अंगरेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूंका, जिसे आज हम कोल विद्रोह के नाम से जानते हैं। यह लगभग 12 सालों तक चला। पिठोरिया, बुंडू, तमाड़ आदि कई स्थानो पर घमासान लड़ाई हुई। उन्हें पकड़ने के लिए अंगरेजों ने अपनी पूरी ताकत झोंकी थी। वह 14 फरवरी 1832 को सिंहभूम के ऐतिहासिक सेरेंगसिया घाटी की लड़ाई में शहीद हुए।
संताल हूल के नायक सिदो कान्हू: 1793 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने परमानेंट सेटेलमेंट एक्ट लागू किया। बंगाल, बिहार और ओड़िशा का लगभग पूरा क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन आ गया और जमींदार जमीन के मालिक बन गये। उनके साथ साहूकार, ठेकेदार और पूरा अमला आया। उनके चक्रव्यूह में संताल बंधुआ मजदूर बनने लगे। उन्होंने 1855 में जमींदारों, साहूकारों, ठेकेदेारों और अमलों के खिलाफ संताल हूल की शुरूआत की। भागलपुर, पियालपुर, कदमसराय, पालसा, महेशपुर व अन्य जगहों पर अंगरेजो के साथ जबरदस्त लड़ाई हुई। सरकार ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। 24 जुलाई 1855 को सिदो को गिरफ्तार कर लिया गया। कान्हू के नेतृत्व में 30,000 संताल जंगलों में रह कर लड़ते रहे। 1856 में अंगरेजों की बड़ी सेना ने विद्रोह को दबा दिया।
तेलंगा खड़िया : गुमला के सिसई जिले के थे। 1793 में परमानेंट सेटेलमेंट एक्ट ने आदिवासियों का जीना हराम कर दिया। इसके खिलाफ तेलंगा खड़िया के नेतृत्व में आदिवासी एकजुट होने लगे। उनका विद्रोह फूट पड़ा। तेलंगा खड़िया को गिरफ्तार कर कोलकाता के सेंट्रल जेल में रखा गया। उन्हें दो साल तक अमानवीय यातनाएं दी गयीं। जेल से छूटने के बाद उन्होंने फिर से लोगों को संगठित करना शुरू किया।23 अप्रैल 1880 को जब वह प्रार्थना कर रहे थे, तब अंगरेजों के दलाल बोधन सिंह ने गोली मार कर उनकी हत्या कर दी।
धरती आबा बिरसा मुंडा : जमींदारों द्वारा मुफ्त ली जाने वाली सेवा, जमींदारों द्वारा मालगुजारी के अलावा सेवा व सामानों की उगाही के खिलाफ खूंटी, तमाड़ क्षेत्र में उलगुलान की शुरूआत की। इसके लिए लोगों को एकजुट करना शुरू किया। 1895 तक उनके शिष्यों की संख्या हजारों तक पहुंच चुकी थी। 1895 में उन्हें रात के समय सोते हुए गिरफ्तार किया गया।
जेल से छूटने के बाद उन्होंने रांची के चुटिया मंदिर पर कब्जा कर लिया। वह मानते थे कि चुटिया मुंडाओं का पुराना गढ था, जिस पर हिंदुओ ने कब्जा कर लिया था। जहां के मंदिर में उन्होंने अपने देवी— देवताओें की मूर्तियों को स्थापित कर दी थी। 24 — 25 दिसंबर 1899 की रात उलगुलान की शुरूआत की तिथि तय हुई।
क्रिसमस की रात खूंटी, तमाड़, बसिया और रांची थाना क्षेत्रों में एक साथ सौ से अधिक स्थानों पर जानलेवा हमले और लूटपाट की घटनाओं को अंजाम दिया गया। एंग्लिकन, जर्मन, रोमन कैथोलिक मिशनरी और पुलिस पर हमले हुए। नौ जनवरी 1900 को डोंबारी पहाड़ पर मुडाओं को अंगरेजी सेना ने घेर लिया। बिरसा सिंहभूम की ओर निकल गये, जहां चार फरवरी को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस के अनुसार नौ जून को रांची जेल में हैजे के कारण उनकी मौत हो गयी, जबकि कई लोग यह मानते हैं कि उन्हें जहर दिया गया था।

संकलन — बेंजामिन लकड़ा की पुस्तक 'झारखंड के आदिवासी महानायक' से।
फोटो — 160 साल से अधिक समय से जीवित वह पेड़, जिसपर संथाल-हूल के अगुआ सिदो को फांसी पर लटकाया गया। यह साहेबगंज जिले, बहरेहट प्रखंड के पंचकठिया में क्रांति-स्थल पर खड़ा है।


By - Manoj Praveen Lakra.

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