Saturday, 22 August 2015

महाजनों के हाथों गिरवी संथाल परगाना के गांव

 
 
 
 

                                   महाजनों के हाथों गिरवी संथाल परगाना के गांव

झारखंड का संथाल परगाना लंबे समय से महाजनी शोषण से लड़ता रहा है। यहां का इतिहास भी महाजनी शोषण के खिलाफ संथालों के संघर्ष का गवाह है। संथाल विद्रोह - हूल की जडें़ में भी इसी शोषण से उपजा आक्रोश था। झारखंड के पूर्व मंत्री शिबू सोरेन को संथाल परगना याद करता है तो महाजनी गुलामी के खिलाफ किए गए उनके संघर्षो के ही कारण। कभी शिबू सोरेन की मां रूपी बास्के ने यह मंत्र दिया था कि यह कभी न खत्म होने वाली लड़ाई है। वर्तमान परिस्थितियों में आज भी वह बातें हवाओं में गूंज रही हैं।


संथाल परगाना के किसी भी गांव में प्रवेश करने पर ग्रामीणों की जुबां पर महाजनी शोषण के खिलाफ उनके पूर्वजों के संघर्ष के गीत सुनायी देते हैं। यहां से कई संथाल आदिवासी मंत्री, विधायक रहें है, पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन संथाल परगना से ही हैं लेकिन अपने संघर्ष से अंग्रेजों को झुका देने वाले सिद्धो-कान्हो यहां आज हार चुके हैं। संथाल परगाना की हवाओं में आज भी महाजनी गुलामी की संड़ाध घुली है।

आदिवासी होने के नाते इस आरक्षित क्षेत्र से खड़ा होने वाला आदिवासी संथाल उम्मीदवार जीत हासिल कर सत्ता तक पहुंच तो जाता है, लेकिन वोट देने वाले उसके अपने ही लोग महाजनों के हाथों आज भी गुलाम रह गए हैं। संथाल परगना में सबसे दयनीय स्थिति पहाडि़या आदिम जनजातियों की हैं। यह वही पहाडि़या जनजाति है जिसका इतिहास एक लड़ाके और अपनी आजादी के लिए निरंतर संघर्ष करने वाले की रही है। जो मुगलों और अंग्रेजों की नाक में दम कर देने की ताकत रखता था। जिन्होंने सबसे पहले अंग्रेजों के खिलाफ सषस्त्र विद्रोह छेड़ा था। प्रथम स्वतंत्रता सेनानी तिलका मांझी इसी पहाडि़या समुदाय के थे। यह अलग बात है कि इस आदिम जनजाति के संघर्ष और इसके गौरवशाली इतिहास को आजादी के बाद भी कभी समुचित जगह नहीं मिल सकी। पहाडि़या विद्रोहों को शांत करने के लिए ही अंग्रेज शासकों ने दामिन-ई-कोह का निर्माण कराया गया था।
 दामिन-ई-कोह का भी अपना इतिहास है। यह पहाडि़यों के प्रभाव का जीता-जागता उदाहरण है। राजमहल और भालगपुर के प्रथम गर्वनर जेनरल क्लीवलैंड की हत्या के बाद 1818 में सुदरलैंड को इन पहाड़ी क्षेत्रों में पदस्थापित किया गया था। क्लीवलैंड योजना के तहत अंग्रेजी षासको ने सुदलैंड के प्रतिवेदन पर पहाडि़या विद्रोह को ठंडा करने के लिए 1832-33 में दामिन-ई-कोह की सीमा को परिभाषित किया। दामिन-ई-कोह सरकार द्वारा हमेषा जिले की आदिवासी आबादी के लिए स्वीकार्य रहा और गैर-आदिवासियों का प्रवेष निषिद्ध रहा। जिसपर सेंधमारी के कारण आज पहाडि़या जनजातियों की स्थिति दयनीय हो गई है। पहाड़ों के राजा कहे जाने वाले आदिवासियों के पहाड़ गुंडों के बल पर, बईमानी और छल-कपट से लूटी जा रही हैं और स्टोन-क्रषर के धंधे ने जहां गैर-आदिवासियों को राजा बना दिया है, वहीं आदिवासियों की स्थिति बद्तर कर दी है। जिस क्षेत्र को अंग्रेजी हुकूमत ने जमिंदारी शोषण से मुक्त रखा था वह क्षेत्र जमींदारी शोषण के खिलाफ संघर्ष करता रहा और आज भी कर रहा है।

आज भी आदिम पहाडि़या जनजाति महाजनी गुलामी के षिकार हैं। स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकार पाने के बदले गांव का गांव महाजनों के हाथों गिरवी पड़ा है। पेनम कोल माइंस के लिए चमचमाती सड़कों के किनारे कालिख पुते किसी साए की तरह लोगों की जिंदगी खड़ी है। जहां डिजिटल इंडिया के सपनों के बीच सरकारी आंखें इन क्षेत्रों को अनदेखा कर रही हैं।

खनिजों से समृद्ध जिले में गरीब जिंदगियां

संथाल परगना के साहेबगंज का सब-डिविजन रहा पाकुड़ 28 जून 1994 में अलग जिला बना। 2001 की जनगणना के अनुसार इसकी आबादी 6,65,635 थी। 2011 की जनगणना में यह यह बढ़कर 899,200 हो गई। जिले में आदिवासियों की आबादी 379054 है। 2001 के आधार पर जिले में 128 पंचायत हंै और गांवों की संख्या 1250 हैं। आदिम जनजाति के लोगों की संख्या 3,12,838 है। यहां संथालों की आबादी 2,66,066, माल पहाडि़याओं की आबादी 29,083 और सौरिया पहाडि़या की आबादी 8,252 है। यहां की पांच प्रतिशत आबादी शहर में और 22.24 प्रतिशत गांवों में रहती हैं।

यह जिला खनीजों के मामले में धनी है। ब्लेक स्टोन व कोयला के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। ब्लेक स्टोन की सप्लाई के कारण यह सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला जिला है। हर दिन इस जिले से 500 ट्रक स्टोन बंगाल जाता है। यहां का कोयला पंजाब भेजा जाता है। वर्तमान में पंजाब सरकार के बदले यहां कोयला निकालने और बाहर भेजने का काम पेनम कंपनी कर रही है। इतनी खनिज संपन्नता के बावजूद 2006 में यह सबसे पिछड़े जिले के तहत रखा गया।

ब्लेक स्टोन व कोयले के लिए विश्व में अपनी पहचान रखने वाले इस जिले का एक पहाडि़या आदिवासी बहुल गांव जुब्दिखरियोपाड़ा है । जिला मुख्यालय से इसकी दूरी 30 किलोमीटर है। यहां 300 से अधिक पहाडि़या रहते हैं। यह एक ऐसा गांव है जहां कोई भी परिवार ऐसा नहीं है, जो महाजनी गुलामी का शिकार न हो। हर एक परिवार पांच हजार से लेकर एक लाख रूपये तक के कर्ज में डूबा है। गांव में दो-चार पुरूषों को छोड़कर सारे पुरूष पलायन कर चुके हैं। गांव में सिर्फ महिलाएं हैं और पूरे गांव का जीवन कर्ज के सहारे घिसट रहा है।

हर परिवार के पास खेती की एक-दो या तीन-चार बीघा जमीन है। कर्ज लेने से पहले ये महाजन को अपने खेत या बैल दिखाते हैं। उसी के आधार पर उन्हें कर्ज मिलता है। कर्ज में डूबने के पीछे एक बड़ा कारण टीबी की बीमारी है। आज तक गांव के किसी भी बच्चे ने अस्पताल में जन्म नहीं लिया है, जबकि पाकुड़ सदर अस्पताल में निष्षुल्क संस्थागत प्रसव की व्यवस्था है। 17 अक्टूबर 2014 को इस गांव में जन्म लेते ही षांति देहरी के बच्चे की मौत हो गई, जबकि शांति खून की कमी, कमजोरी व बच्चे की मौत से दुखी, खाट पर पड़ी रहती है। षांति पहाडि़या के परिजनों ने बताया कि न जाने किस बीमारी के कारण शांति मां नहीं बन पा रहीं। दूसरी बार फिर गर्भ में बच्चा ठहरा था लेकिन जन्म के पूर्व ही बच्चा खराब हो गया। डाॅक्टरी ईलाज की कोई सुविधा नहीं होने के कारण जड़ी-बूटी से ईलाज कराया जा रहा है। वहीं कमजोरी या किसी तरह की बीमारी होने पर गांव के लोग खुद घर की छप्पर से स्लाइन की बोतल टांग कर अपने शरीर पर पानी चढ़ाते हैं। गांव के कुछ लोग गूंगे और निशक्त भी हैं। कुछ महिलाएं लंबे समय से रक्तश्राव की बीमारी से पीडि़त हैं।

गांव में ही नहीं पूरे जिले में मनरेगा फेल है और बेरोजगारी के कारण पलायन है। यह गांव महज एक उदाहरण भर है। कमोबेस यही स्थिति दूसरे पहाडि़या आदिवासी गांवों की भी है। यह जानकर आष्चर्य होता है कि पेनम की सड़क इस गांव से महज 7-8 किलोमीटर दूर से होकर गुजरती है, जिसपर हर दिन काला सोना ;कोयलाद्ध लेकर गाडि़यां गुजरती हैं। समय-समय सरकारी अधिकारी भी इधर दौरा करते हैं लेकिन गांवों तक किसी की पहुंच नहीं। इस रास्ते को विकास का पर्याय बताया जाता है, वहीं निकट के गांवों की स्थिति ऐसी कि कब किसी की जिंदगी खत्म हो जाए, इसकी गारंटी किसी के पास नहीं।

बंधक हो गई आने वाली कई पीढि़यां

जुब्दिखरियोपाड़ा गांव, शंकर साहू नाम के महाजन के हाथों गिरवी है। इस गांव की आने वाली पीढि़यां भी बंधक रहेगी क्योंकि कर्ज की राशि की दुगुना राशि चुकानी होती है। जमीन, बैल और घर बिक जाने के बाद बेटे-बेटियां काम कर महाजन को सूद चुकाएंगे। यह पूर्व से ही तय है।

इस गांव की फूलमुनी पहाडि़न ने अपने बेटे की टीबी की बीमारी के ईलाज के लिए षंकर साहू से 60-70 हजार रूपये कर्ज लिया है। एक-डेढ़ बीघा की खेती है। वह कर्ज कैसे चुकाएंगे? इस सवाल पर उसका जवाब है मजदूरी और खेती से कर्ज चुकाने का प्रयास करेगी। कर्ज कब तक चुकेगा इसकी कोई गारंटी नहीं। हर दिन सूद बढ़ता जाएगा और जमीन, बैल, पैसे सब खत्म हो जाएंगे। मूल और सूद का पैसा आने वाली कई पीढि़यां चुकाती रहेंगी। यह इस गांव का भविष्य है। काम करने की क्षमता खत्म होते ही आने वाली पीढ़ी भी महाजन के हाथों बंधक बन जायेगी।

भवनी देहरी के बेटे रोजगार की तलाश में पूणे गए हैं। बड़ी बेटी की बीमारी के ईलाज के लिए उन्होंने अब तक 90 हजार रूपये का कर्ज लिया है। हाल ही में पीलिया के ईलाज के लिए चार हजार रूपये और कर्ज लिए हैं। दो बीघा खेत है उनके पास। पति बेरोजागर हैं। कहती हैं खेती और मजदूरी से कर्ज चुकाएगी। बेटे शहर से पैसे भेजेंगे तो कर्ज उतारने में मदद मिलेगी। अन्यथा इतने पैसे चुकाने के लिए एक जन्म काफी नहीं है।

चीनी देहरी के पति व लड़कों ने पुणे और चेन्नई पलायन किया है। उसने 31 हजार रूपये का कर्ज ले रखा है। खेती से ही कर्ज चुकाएगी। पर, सिंचाई के आभाव में खेती की स्थिति ठीक नहीं। खाने भर को अनाज मिल जाता है। पर वह भी कर्ज चुकाने में चला जाता है।

विनीता पहाडि़या ने अपने ईलाज के लिए शंकर साहू से 20 हजार रूपये कर्ज लिया है। उसके तीन बच्चे हैं। तीनों बच्चे गांव में दाई की मदद से जन्में हैं। इसके बाद विनीता कमजोर व बीमार हो गयी और अब लंबे समय से ईलाज चल रहा है।

रामी पहाडि़या ने 15 हजार कर्ज लिया है। चांदी की चूड़ी गिरवी रखकर और 12 हजार रूपये का कर्ज भी लिया। तीन बीघा खेत है, जिसमे सिंचाई की कमी के कारण एक ही फसल होती है। साल बीतते ही सूद बढ़ जाता है।

इसी तरह कमली पहाडि़या ने 15 हजार, मेहंदी देहरी ने 15 हजार, लखी पहाडि़या, अनिता देहरी ने 10 हजार, सूरजमनी देहरी व रिया देहरी ने सात हजार और मंगू देहरी ने भी तीन हजार रूपये का पकर्ज लिया है। गांव का हर परिवार ऐसे ही कर्ज में डूबे हैं।

मनरेगा के साथ दम तोड़ता उसका मकसद
 मनरेगा के अस्तित्व में आने के पीछे एक दर्शन था कि इससे गांवों से पलायन रूकेगा। हर हाथ को काम मिलेगा। लोगों का जीवन-स्तर बेहतर होगा। आजीविका के अवसर बढ़ेगें। विकास का रास्ता गांवों तक पहुंचेगा। पर ऐसे दर्षन के दर्दनाक हस्र ऐसे गांवों में नजर आता है, जहां की जिंदगियां महाजनों के हाथों गिरवी हैं। आदिम जनजातियों की आबादी घटने से भी बड़ा प्रष्न यह है कि उनके जीवन को बचाने और बेहतर बनाने के तंत्र क्यों कमजोर हैं? बच्चे जन्म तो ले रहे पर कितने दिन जी सकेंगे इसकी गारंटी क्यों नहीं?

गांव के लखन पहाडि़या बताते हैं कि तीन साल पहले गांव में तीन तालाब बनने का काम शुरू हुआ था। आधा पैसा मिलने के बाद बाकी राशि नहीं मिली, जिससे काम अधर पर लटक गया। यह योजना 2012-13 की थी, पर अब तक पूरा नहीं हुई है। 2013-2014 सत्र में सात लाख ग्यारह हजार पांच सौ की राशि से और तीन तालाब बनने थे। इसमें एक तालाब के लिए 22 हजार, दूसरे के लिए 26 हजार और तीसरे के लिए मात्र नौ हजार रूपये ही दिये गये। बाकी राशि नहीं मिली और काम अधूरा रह गया। यह काम 2014 में पूरा होना था। सरकार की ओर से समय पर राशि न मिलने पर महाजन से 50,000 रूपये कर्ज लेकर काम किया गया। पर अब तक न काम पूरा हुआ है, न बकाया राशि ही मिली है। उल्टे ग्रामीण ही कर्ज में डूब गए। लखन पहाडि़या ने ग्राम सभा भवन व चबूतरे की मरम्मत के लिए भी कई बार आवेदन दिया है लेकिन उसका आवेदन स्वीकृत नहीं हुआ है। वे बताते हैं कि इस साल जुलाई माह में 2014 के लिए गए कर्ज के कारण महाजन 40 हजार की कीमत के गाय-बैल ले गए और उनकी जमीनें भी सूद के रूप में अपने नाम कर गए हैं। लोगों का सबकुछ महाजनों के पास गिरवी है। गांव में मातम सा माहौल है।

यह विडंबना है कि संथाल परगना की जिस जमीन पर पूर्वज महाजनी गुलामी के खिलाफ लड़ते रहे, वह संथाल परगना आज भी महाजनी गुलामी से मुक्त नहीं हो सका है।

 

 - जसिन्ता केरकेट्टा, स्वतंत्र पत्रकार




                                             



 
    




 
 

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