Friday, 14 August 2015

हूल की हत्या

 
 
हूल की हत्या
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हां मैं वही गाछ हूं
पंचकठिया-बरहेट के क्रांति स्थल का
वक्त की अदालत में खड़ा ...

एक जीवित गवाह
जो पहचानता है
हूल के हत्यारों के चेहरे ।
मैं छूता हूं अपने कंधे के दाग
उस रस्सी की रगड़ से उभरे
जिसके फंदे से
लटका दिया गया था
सन् 1855 का प्रतिरोध ।
झूल गई थी जिसपर
संथाल हूल के अगुआ सिद्धू की
शोषण के खिलाफ युद्धरत आत्मा ।
उसकी देह से अंतिम बार निकली
पसीने की गंध
कुचले हूल की सिर उठाती गंध बन
बह रही जंगल की शिराओं में
पारे की तरह आज भी।
छटपटाते हुए उसके पैर के अंगूठे
टकराए थे मेरे सीने से
ठीक वहीं जहां मेरा कलेजा धड़कता है ,
वहीं से आज भी रिसता है खून
हूल-हूल पुकारता हुआ ।
उस पुकार पर
जंगलों के सीने में धंसी
स्मृतियों की छूरियों की धार
व्याकुल हो उठती हैं
काट डालने को सारी बांबियां
निहत्थों की देह
चाट जाने वाले दीमकों की
और मचलती हैं तोड़ डालने को
हत्यारों के उम्र पर
चढ़ाए गए सारे कवच ।
हां इसी गाछ की बूढ़ी बाहें
जिसपर झूलकर
जवान होती थी पीढ़ियां
मेरी बाहों का लेकर सहारा
वीर सपूतों को साजिशों ने
मौत के घाट है उतारा
मैं खड़ा हूं ठीक वहीं आज भी
दफना दिए गए
वक्त की कब्र पर
एक जीवित सबूत बनकर,
एक लौ बन सच्चाई की
जो जगाए रखता है
इतिहास को नींद में भी ।
वक्त की अदालत पूछती है मुझसे
हूल के हत्यारों के चेहरे कैसे थे?
तब मैं चीखकर कहता हूं
हर काल में हैं
उनके चेहरे कुछ एक से ...
निर्दयता की पराकाष्ठा से माथे
हवस की सीमाएं लांघती हुई आंखें
जीवन रस चूसने वाली नरभक्षी अंगूलियां,
पृथ्वी की पोटली कांख में छिपाकर
और...और... की तलाश में भटकती
ब्रह्माण्ड की सबसे भूखी आकृतियां....
यह सुनते ही अदालत
उठ खड़ी होती है
और स्वयं को स्थगित कर
बढ़ जाती है न जाने
किस अनिश्चतकाल की ओर....
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- जसिन्ता केरकेट्टा
(160 साल से भी अधिक समय से जीवित वह पेड़, जिसपर संथाल-हूल के अगुआ सिद्धू को फांसी पर लटकाया गया था। साहेबगंज जिले, बहरेहट प्रखंड के पंचकठिया में क्रांति-स्थल पर खड़ा है वह पेड़ आज भी ।)

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