Thursday, 13 August 2015

हवस पर हंसिया गड़ाती " रेड जोन " की आदिवासी स्त्रियां

 
 
 

                           हवस पर हंसिया गड़ाती " रेड जोन " की आदिवासी स्त्रियां
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                   ( विनोद कुमार के उपन्यास " रेड जोन " पर समीक्षात्मक आलेख)

उस दिन एक आदिवासी औरत ने कटघरे में खड़े होकर न्याय की भीख मांगना कबूल नहीं किया। भीख मांगना उसके खून में नहीं। अपने बच्चों की ओर इशारा कर भरी अदालत में कहा कि इस व्यवस्था से उसे कोई उम्मीद नहीं है। उसके पति और अपने पिता को न्याय तो उसके बच्चे देंगे। देखते ही देखते भीड़ को चीरती हुई वह दोनों बच्चों का हाथ थामे निकल गई।
उस रात झोपड़ी में दो चीजें अचानक चमकी थी। व्यवस्था की भूखी आंखें और एक हंसिया। फिर एक चीख के साथ हवस के गले से खून निकला था। वह औंधे मूंह पड़ा था। तब हंसिया की आंखें अंधेरे में चमकी थी, वह जोर से हंसी थी। धान के काटने के बाद की उसकी हंसी से यह अलग थी। उस हंसिया की धार ने हवस से समझौता नहीं किया न खुद को उनके हवाले। वह हंसिया गांव से जब निकली तो ऐसी ही व्यवस्था को सुरक्षा देने वाले गलियों में गोलियां बरसाने वाली बंदूक में तब्दिल हो गई। देखते ही देखते वह उन गलियों को लांघती हुई रेड जोन के गलियारे में घुस गई।
विनोद कुमार के उपन्यास " समर शेष है " में जिस आदवासी स्त्री ने अपने पति सोबरन मांझी को महाजनी प्रथा के खिलाफ लड़ते देखा, उसकी हत्या के बाद उसने लड़ाई को अपने बेटे के माध्यम से जिंदा रखा। जिसने मंत्र दिया - "हमारे लिए यह कभी न खत्म होने वाली लड़ाई है। इसलिए यहां थककर बैठना मना है।" उस आदिवासी स्त्री ने अनायास ही पूरे आदिवासी आंदोलन व संझर्ष के लिए वह मंत्र दे डाला था। " यह कभी न खत्म होने वाली लड़ाई है। हमारे लिए थकना मना है।" "समर शेष है" जहां अंत होता है वहां एक कसक पैदा होती है। अनवरत चलने वाले युद्ध का एक यौद्धा जिसने महाजनी प्रथा के खिलाफ लड़कर लोगों को उनके शोषण से मुक्त कराने का संकल्प लिया था, वह महाजनी प्रथा के पोषक तत्वों से समझौता कर बैठा। जिस व्यवस्था ने महाजनी प्रथा के विरूध उनके प्रतिरोध को आतंकवाद की संज्ञा दी। दुखद यह कि जिसे पिछड़े तबके ने कभी आतंकवादी नहीं माना, स्वयं उसने भी अपने आप को आतंकवादी नहीं माना, उस शक्स ने षडयंत्र के सामने अंततः आत्मसपर्मण कर दिया। उपन्यास "रेड जोन" इसके बाद क्या हुआ इसके आगे की कहानी कहता है। शोषण को निरंतर पोषित करने वाली व्यवस्था किस तरह आंदोलनों को तोड़ती है, षडयंत्र के तहत खत्म करती है और यौद्धाओं के नाखुन कुतर लेती है। उपन्यास रेड जोन इसकी सच्चाई खोलता है। कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े एके राय, महेंद्र सिंह जिनके संघर्ष का इतिहास धूमिल न पड़े, उसपर से धूल -गर्द हटाकर उपन्यास उन विचारों को जिंदा रखने का काम करता है। एके राय ने सिर्फ अलग-झारखंड का नहीं बल्कि एक शोषण मुक्त झारखंड की कल्पना की थी। वे गलत नहीं थे कि यदि वर्ग संघर्ष पीछे पड़ा तो संप्रदायिक संघर्ष आगे आ जाएगा। तब बाहरी और भीतरी, मजदूर व किसान, आदिवासी-गैरआदिवासी और अंततः आदिवासियों के बीच भी ईसाई और गैरईसाई के नाम पर विभाजन होगा और संघर्ष का रूख बदलेगा। आज वही हो रहा है जिसका डर उन्हें झारखंड बनने के पूर्व से था।
" समर शेष है" जिन अलग-अलग आदिवासी स्त्रियों की मनोदशा व जीवन को सामने रखता है, अचानक उनको " रेड जोन " में हम दुर्गा के रूप में देखते हैं। रेड जोन को ठीक से समझने के लिए विनोद कुमार के उपन्यास " समर शेष है " से भी गुजरना बेहद जरूरी लगता है। इसके तार उपन्यास " रेड जोन " तक बिछे हुए हैं।
" समर शेष है " से लेकर " रेड जोन " तक का सफर महज किसी कहानी से गुजरना नहीं है। ये सिर्फ उपन्यास नहीं है। ये एक ऐतिहासिक दास्तावेज हैं। छोटानागपुर की धरती पर संघर्षो और आंदोलनों की जड़ों में कैसी गंध छिपी हुई है। आने वाली पीढ़ियों को अपने पूर्वजों के उसी गंध से रू-ब-रू कराते हैं ये उपन्यास। इनकी खासियत ऐसी जड़ों की तरह है जो मिट्टी को बांधे रखती हैं। जड़ों के साथ उसी मिट्टी के बंधन सा उपन्यास पाठक को पूरी तरह बांधकर रखता है। शुरू से अंत तक। जीवन में कई झटके होने के बावजूद भी उपन्यास के साथ जीवन के तमाम झटकों के बीच स्मृतियों के पहिये तेजी से भागते हैं। एक यथार्थ जो उपन्यास के रूप में तेजी से सांसों में चढता-उतरता है, खून में गर्माहट पैदा करता है और अचानक मुट्ठियां भिंचने लगती हैं। किसी सपने में चलते हुए, उसका वास्तविक महसूस होना। नींद में आदमी का पसीना-पसीना हो जाना। सांसे सपने को हकीकत के रूप में महसूसते हुए कहीं न रूक जाए। इसलिए विनोद कुमार के उपन्यास पाठक को झकझोर कर उठाते हैं।
उनका उपन्यास " रेड जोन " गांवों की जमीन से सूरज की मानिंद उगता है। बिल्कुल लाल। जैसे कोई पृथ्वी के छोर पर किसी ने मिट्टी के घड़े उबड़ाकर रख दिए हो। लाल, तपी हुई पेंदी पूरे आकाश में सूरज बन गया हो। इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाएं जिसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को सुनाने की जिम्मेदारी जब कोई नहीं निभा रहा तब उनका उपन्यास उस जिम्मेदारी को उठा रहा है। एक संघर्षशील पत्रकारिता के दौरान कलम को छिल-छिलकर तीर की तरह पैना बनाने वाले उपन्यासकार विनोद कुमार के उपन्यास " रेड जोन " आपको कब, कहां, कैसे भेदता है, गड़ता है पता नहीं चलेगा। हां लेकिन कुछ तो कहीं जेहन में धंस गया है, यह जरूर महसूस होगा।
" समर शेष है " में आदिवासी स्त्रियां विभिन्न त्रासदी व पहलुओं को सामने लाती हैं। " रेड जोन " उन स्त्रियों से अलग पहलुओं को जीती स्त्रियों को भी सामने लाकर खड़ा करता है। नेमरा गांव की रामेश्वरी जहां शहर के किसी ईट-भट्ठे के मुंशी के द्वारा शोषित होकर अंततः विक्षिप्त अवस्था में भटकती है। रामेश्वरी के कई अनकहे सवाल वर्तमान को भी मथते हैं। सड़कों में इतनी स्त्रियां आखिरकार कैसे विक्षिप्त हो रहीं हैं? कैसे बिन बाप के बच्चे कटोरा पकड़कर भटक रहे हैं? समाज का कोई न कोई पुरूष उनके इन हालातों का कारण तो जरूर होगा। नेमरा गांव की जिरन धनबाद के कोलियरी इलाकों का संघर्ष देखती है और अपने पति के अंदर थोड़ा-थोड़ा अंगोर डालती रहती है कि अन्याय के खिलाफ हम क्यों मुंह बांधे खड़े रहते हैं। महाजनी गुलामी के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपने प्राण देने वाले सोबरन मांझी की पत्नी सोनामणि कैसे इस पूरे संघर्ष के आगे का रास्ता तैयार करती है। इन सारी घटनाओं के ताने-बाने के बीच एक सबसे बड़ा क्षेत्र जो रेड जोन के रूप में घोषित है, उसके पीछे की वास्तविकता उपन्यास " रेड जोन " कहता है। एक ' लड़ाई ' जो जिस मकसद से शुरू हुई और कई कारणों से जिसमें भटकाव आया, वह भटकाव अब कौन सा रास्ता अख्तियार करेगा? यह सवाल भी खड़ा करता है उपन्यास।
उपन्यास " रेड जोन " इस कथित सभ्य समाज की सोच कि बेहतर कल की चिंता और कामना से ही समाज के आगे बढ़ने और मानव जाति के विकास की बात पर बहस खड़ा करता है। बेहतर कल की कामना से जिस मानव जाति के विकास की बात की दलीलें कथित सभ्य समाज देता रहा है। । उपन्यासकार सवाल उठाते हैं कि वहां किस मानव जाति का विकास हो रहा है? इसी सोच से महाजनी सभ्यता का उदय हुआ है। आदिवासी समाज सरप्लस उत्पादन नहीं करता इसलिए वह विकास के एक मोड़ पर आकर रूक गया है ऐसा मानने वालों को उपन्यासकार यह भी याद दिलाते हैं कि सरप्लस उत्पादन के बाद से ही मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण शुरू हुआ। एक मनुष्य द्वारा दूसरे के श्रम के शोषण की शुरूआत हुई।
वे बहस करते हैं कि सरप्लस उत्पादन को सभ्यता-संस्कृती के विकास और श्रम विभाजन को विकास का पैमाना मानने वालों ने किसी काम को श्रेष्ठ और निम्न के दर्जे में किस तरह विभाजित किया। इसके साथ एक अंहकार को भी किसी भेड़िए की तरह पाला-पोसा। और यह तय कर दिया कि वह किसी को भी नोंच खाने का हक रखता है। शारीरिक श्रम को दोयम दर्जे का माना और प्रतिष्ठा को उन लोगों की गोद में बिठा दिया जो काम कम करते हों। समाज में किसी के कम शारीरिक श्रम को बडप्पन का पैमाना स्थापित करने में लगे हैं।
उपन्यास " रेड जोन " माओवाद के उदय और धीरे-धीरे उसके बदलते स्वरूप को स्पष्ट करता है। इसके पीछे के राजनीतिक कारणों, समाजिक कारणों को उजागर करता है। छोटानागपुर की राजनीतिक जमीन के उपर और अंदर होने वाले उथल-पुथल को बेहतरीन तरीके से सामने रखता है। यह उपन्यास नई पीढ़ियों में राजनीतिक चेतना लाने का काम करता है। इस उपन्यास को पढ़ने के बाद झारखंड बनने के पूर्व और झारखंड बनने के बाद के राजनीतिक षडयंत्र और संघर्षो का सारा कच्चा-चिट्ठा खुलता है। एक पत्रकार जो अपने काम को मिशन की तरह लेता है, वह किन परिस्थितियों से दफ्तर के अंदर और बाहर अपने अधिकारियों से, फिर अपने आप से जूझता है, उलझता है। पत्रकारिता की नब्ज टटोलते हुए " रेड जोन " उसकी नसों पर सीधे कलम की निभ गड़ा देता है।
एक गांव की साधारण सी लड़की जिसका एक सीधा-साधा सपना जो बहुत बड़ा भी नहीं होता। शाम को घर से सटे पिंडा में बैठ भुना मकई चबाने वाली गांव की लड़कियों के सपने उसी मुट्टी -भर दानों की तरह है। लेकिन कौन उन्हें मजबूर करता है दरोगा की जेब से पिस्तौल निकाल लेने को? समाज की वह कौन सी गंदी व्यवस्था है जो शाम होते ही किसी भी गांव की ओर लडखड़ाते हुए बढ़ती है? अपनी हवस मिटाने। कितना हवस भरा हुआ है इस समाज में? दुर्गा की हंसिया समाज के इसी हवस का गला रेतती है। माओवाद के नाम पर आज जितने विवाह मंडप बनाए जा रहे हैं झारखंड में, उस मंडप में कितने गांवों की सीधी-साधी दुर्गाओं को जबरन घसीटा जा रहा है इसका हिसाब कौन देगा? रेड जोन के अंदर एक ' लड़ाई ' कब और कैसे ' लेवी ' में बदल जाती है? वे कौन हैं जो आज तक हर लड़ाई को लेवी में बदल देने की कोशिश में लगे हैं? इन सवालों के गले पर चाकू रखने वाले पत्रकार कहां हैं? अपनी दो जून की रोटी के लिए काॅरपोरेट हाउस के इशारे पर शहर में आग लगाने और उस पर रोटी पकाने वाली पत्रकारिता को छोड़कर जिस पत्रकार ने बाहर निकल आने की हिम्मत जुटाई, उसी हिम्मत का परिणाम है " रेड जोन।"
" रेड जोन " माओवाद के नाम पर हिंसात्मक घटनाओं के शुरू से ही खिलाफ दिखता है। अंत तक एक आवाज गूंजती है " यह रास्ता जनता के शासन की ओर नहीं मुट्ठी भर हथियारबंद लोगों की तानाशाही की ओर ले जाता है। "
माओवादी ग्रुपों के साथ कई साल भटकती गांव की दुर्गा पार्टी के अंदर ही अंततः सवाल उठाती है कि उनके गांव-घरों में तो सभी साथ लड़ते-मरते हैं, सभी साथ निर्णय लेते हैं। फिर पार्टी के अंदर लड़े-मरे कोई और निर्णय सुनाए कोई और ऐसा क्यों? ओदश का पालन करने वाले पुतलों के हाथों बंदूक थमाकर उन्हें मंत्र दे दिया कि वे क्रांति कर रहे हैं। अचानक वर्षो पहले किसी की कही बात उसके दिमाग में गूंज उठती है। " सिद्धो-कान्हू, बिरसा मुंडा ने अपने दुश्मनों से लड़ने के लिए हथियारबंद सेना नहीं बनायी थी। वे समाज के साथ मिल-जुलकर लड़े थे। उनके गांव का हर आदमी, औरत-मर्द, बच्चे-वृद्ध, सभी उस सेना के सिपाही थे। यह रास्ता जनता के शासन की ओर नहीं मुट्ठी भर हथियारबंद लोगों की तानाशाही की ओर ले जाता है। "
आखिरकार दुर्गा जंगलों से लौटती हुई अपने गांव की ओर उसी स्थान पर पहुंचती है जहां से उसने रेड जोन की यात्रा शुरू की थी। यह माओवाद के बाहर और भीतर के संघर्षो का दिखाता है। एक भटकाव को फिर पुराने रास्तों पर लौटते देखते हैं लेकिन फिर नए सवाल खड़े होते हैं कि क्या पुराने रास्ते इतने दुरूस्त हो गए हैं कि रेड जोन की ओर गए लोग वापस आ सके?
उपन्यास " रेड जोन " पूर्व की घटनाओं को नई पीढ़ी के सामने रखते हुए उन्हें आगाह करने का काम भी करता है । आने वाली पीढ़ी उन गलतियों से समय रहते बच सके, जिनको उनके संघर्षकर्ताओं ने दोहराया। नई पीढ़ी के लिए यह उपन्यास नई रणनीति गढ़ने के लिए अनायास ही मार्गदर्शक का काम करता है। यह झारखंड के आंदोलनों व संघर्षो का हस्र दिखाता है।
वह बूढ़ा शेर जिसकी उनींदी आंखें अब सामने वाले को चमत्कृत नहीं करती। जिसने छोटानागपुर की जमीन पर महाजनी प्रथा के खिलाफ लड़ते हुए एक ऐतिहासिक जीवन जिया। आज भी गांव के बूढ़े-बुजुर्ग उन दिनों को नहीं भूलते। जिनके संघर्ष से महाजनी गुलामी से छूड़ाई जमीन पर पीढ़ियां खेती कर रही हैं। उसकी कहानी सिर्फ कहानी नहीं हो सकती। वह तपे हथौड़े की आवाज है जिसकी आवाज शताब्दियों के पहाड़ों से टकराकर वापस आती रहेगी। वह आग है जिसे हर हाथ को तुफान के बीच बचाकर आने वाले कल के हाथों सरका देना है। वह आंखों की ऐसी नमी है जिसका फिर से कोई सारंडा उगाने के लिए बचा रहना जरूरी है। जंगल में किसी जानवर की उठती आवाज है जो खतरों से पहले ही आगाह कर देता है। उन सारी बातों को उपन्यास बखूबी अपने अंदर जज्ब कर सका है। किसी बूढ़े शेर के पहाड़ी पर चढ़कर दहाड़ने और फिर किसी लंबी उदासी की थकान से अपनी मांद में चले जाने, फिर न निकलने के लिए। उस दहाड़ के कंक्रीट के जंगल में कहीं गुम हो जाने की कहानी कहता है रेड जोन।
झारखंड की जमीन पर इतने संघर्षो का परिणाम क्या है? अंततः उपन्यास सवाल पूछता है आने वाले कल से। वह सवाल पूछता है नई पीढ़ियों से। वह सवाल पूछता है रेड जोन की गलियों में भागती परछाईयों से। वह सवाल पूछता है हर एक शक्स से जो अपने पूर्वजों के संघर्षो की जमीन पर आज चैन की नींद सो रहा है और गर्म-सोंधी रोटी खा रहा है। वह पूछता है हर उस आवाज से जो बस देखती है पर अपनी जुबान नहीं खोलती । पूछता है उन हाथों से जहां हंसिया गायब हो गया है, झंडा ढोने का काम कर रहा। हर उस दिन से जो सूरज के उठते ही घर से निकलता है और हर शाम घर के पिछवाड़े उल्टे डुभनी-ग्लास के बगल में औंधे मूंह पड़ा रहता है। हर तारीख से जो बार-बार फिर से उठने की कोशिश में लड़खड़ा रहा है। हर उस रात से जो कहीं कोई मशाल न जलने के कारण नींद में उंघती है। वह पूछता है एक ही सवाल।
" क्यों आज भेड़ियों के नाखुन और तेज हो रहे हैं? क्यों आज सियारों की आंखें चमक रही है? क्यों आज लकड़बग्घे हंस रहे हैं?"

उपन्यास - रेड जोन
उपन्यासकार - विनोद कुमार
मूल्य - 695
प्रकाशन - अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली।



- जसिन्ता केरकेट्टा

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