Wednesday, 12 August 2015

गीतों का विलाप






गीतों का विलाप
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चटकती सुबह की तरह
पुरखे उठते थे
कड़ी धूप से भिड़ जाने को, ...
आज उनकी नई पौध
धूप का सामना करने से कतराती है ।

सरहुल, करम, दशई, जतरा की
धुन पर थिरकती सड़कों पर
घिसटते रहते हैं आधे ।
कुछ रात के पिछवाड़े
छुपकर सूंघते हैं
अपनी नशे में डूबी उंगलियां ।
उल्टे डुभनी-कटोरे के बीच से
बास मारता उठता है भोर,
लड़खड़ाकर गिर जाता है
फिर खेतों की मेढ़ पर ।
और दिल्ली से घर लौटी
जिंदगी से हारी
दिन की सुबकती आखें
दौड़ पड़ती है डूब जाने को
कोईल नदी में...
उसी सांझ नदी की छोर से
मेहनतकश दोपहर, ढोकर लौटता है
पीठ पर उसकी लाश ,
तब भी खेतों की आड़ में पड़े
कुछ उंघते भोर की आंखों में
खून नहीं उतरता ।
कुछ, सारी जिंदगी लगा देते हैं
अपनी चारो ओर खड़ी करने को
आत्ममुग्धता की चहारदीवारी
और सिर्फ एक सुराख,
जहां से दिखती रहती है
थोड़ी बारिश - थोड़ा बवंडर ।
कुछ, किन्हीं इशारों के पीछे
दौड़ते हुए बदल जाते हैं
लहराते लाठी डंडों में
बंद कराने शटर दुकानों की ।
और , कुछ की आखें खुलती हैं
गोलियों की आवाजों के बीच,
जो धूप से बचाकर
धकेल दिए जाते हैं
गाढ़ी छाया के भ्रम में,
जो अंतत: बदल जाती है
किसी गहरी खाई में ।
कुछ भीतर ही भीतर
किले की नींव पर
बैठ जाते हैं भेदिया बन
और सौदा करते हैं अपने ही मूल्यों का ।
और, बच गए मुट्ठी भर कुछ
जो मैदान में खड़े रहते हैं
तीखी धूप के खिलाफ,
गर्म हवाओं का
जिनपर चैतरफा हमला है ।
देखकर, अलग-अलग हांडी में
रानू घुले, टूटे चावलों की तरह
गलते अपने भविष्य को,
पुरखों के गीत धीरे-धीरे
बदलने लगते हैं
किसी पहाड़ी विलाप में....।
हे सिंगबोंगा, बुरूबोंगा , इकिरबोंगा
तुम्हीं बताओ ऐसे में
कब और कैसे बच सकेंगे हम?
तपती धरती की आंच पर ,
पकते समय की साजिशों से,
जहां धीरे-धीरे सीझ रहा सबकुछ
मिटटी, हवा, जंगल,
आदमी और उसकी आत्मा तक ....।
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(क्यों आदिवासी गीतों में विलाप छिपा है, क्यों एक कराह है, कसक है और उसका स्वरूप बदल नहीं रहा हर काल में? हर बार उठने और कुछ कर दिखाने की ललकार है। वह कसक, कराह, विलाप के खत्म होने का समय कब आएगा? 30 जून हूल दिवस पर हूल वंशजों के चिंतन का समय है यह।
कुछ शब्दों के अर्थ -
( रानू - आदिवासी पूजा व पर्व त्योहारों में प्रयोग करने वाले पेय पदार्थ हडि़या के निर्माण के लिए रानू का प्रयोग करते हैं। खुद्दी या टूटे चावलों को रानू गलाने का काम करता है।
सिंगबोंगा - परमपिता परमेश्वर।
बुरूबोंगा व इकिरबोंगा - क्रमश: पहाड़ व जल के देवता के लिए संबोधन है।)
- जसिन्ता केरकेट्टा
 

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