Wednesday, 12 August 2015

कब समय कुहक कर उठेगा ?



कब समय कुहक कर उठेगा ?
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आग और चील
दोनों झपट रहे हैं
अधजली लकड़ी के नीचे ...

दबी अधजली लाश पर
और इस बार
दूर बैठे गिद्ध को
इसमें कोई रूची नहीं है।
सूंघ रहा है वह
सुदूर इलाकों के घरों से
निकलती, नवजात बच्चों के
देह की ताजी गंध ,
उसकी नजर जमी है
धीरे-धीरे बढ़ती उम्र पर
चढ़ते मांस की परत पर
और उनके हकों को
पुख्ता करते दस्तावेजों पर।
नस-नस पहचानने वाली
एक मां
अपने बच्चे की,
इस बार नाकाम है
समझ पाने में
क्यों उसके बुढ़ापे की लाठी पर
मांस लटक रहा है
सूखे कांटे की तरह ?
लंबे समय तक
अपनी छाती पर छाए
दूध के भयानक सुखाड़ से
वह नाउम्मीद की किसी
धुंआती लकड़ी की तरह
अंदर ही अंदर जल रही है
और देख रही है दरवाजे पर
टिकी है अब भी
किसी न किसी गिद्ध की नजर।
उड़ाकर दस्तावेजों में दर्ज
उनके हिस्से की खुराख
छांह में उंघते गिद्दों के
गले में अटका कोई डकार
उनके पेट में गुदगुदी करता है।
आखिर कब तक
गिद्ध के मुंह के ठीक उपर
नवजात के मांस का लोंधा
हड्डी पर लटकता रहेगा
उसे ललचाता हुआ ?
और लुढ़की रहेंगी तारीखें
चूल्हे का धुआं पीती हुई आंगन में?
और धंुआती लकडि़यां
कब तक करती रहेंगी
आग पकड़ लेने का नाटक ?
ऐसे में सोई जवान हड्डियां
कब उठेंगी कड़कती हुई
और पीटने लगेंगी
रणभेरी की तरह नगाड़े को ?
कब कुहक कर उठेगा
समय अपने हक पर
दावे का असली मूहर लगाने
और दरवाजे पर जमे गिद्धों को
सही जगह दिखाने ?
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- जसिन्ता केरकेट्टा
















 

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