Tuesday, 6 October 2015

खो गया है सच का साथ देने का साहस



डा- कपिल तिवारी, भोपाल

अश्विनी कुमार दूबे, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली

तिस्ता सीतलवाड़, समाजिक कार्यकर्ता

मंच पर मंजू कांकरिया, प्रो. विश्वनाथ( बीएचयू), प्रो. सुरेंद्र( बीएचयू)
 मेग्सेस से सम्मानित संदीप पांडे, ट्राइबल आर्ट के आर्टिस्ट व प्रो. विश्वनाथ, बीएचयू
                                           खो गया है सच का साथ देने का साहस

                                          .....................................................
गाजीपुर ( उत्तरप्रदेश ) में  जीवनोदय शिक्षा समिति व विंध्य न्यूज नेटवर्क के संयुक्त सहयोग से 3 और 4 अक्टूबर को अंतराष्ट्रीय सेमिनार सह लोक कला प्रदर्शन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। विषय था " भारतीय जनजातियां: संस्कृति व समाज।" कई बड़े वक्ता इस मौके पर देश-विदेश से उपस्थित थे। 
 कार्यक्रम में 3 अक्टूबर को भोपाल से आए डा- कपिल तिवारी ने कई बड़े व कड़े सवाल उठाए। पूरा जीवन जनजातियों के बीच काम करते हुए गुजार देने वाले डाॅ. कपिल ने कहा काम करते हुए जीवन बीत गया अब कहने के लिए शेष क्या रह गया है? आदिवासियों पर अपने अनुभव बांटने से पहले ही उनकी आंखें भरने लगी और होंठ थरथराने लगे। कुछ ऐसी हालत में रूकते-रूकते, धीरे-धीरे उनके शब्द सभागार में गूंजे और जब गूंजे तो पूरी सभा जैसे किसी घुप्प चुप्पी की आगोश में समाने लगा।

  उन्होंने कहा देश जिसे समाज कहता है। वास्तव में वह समाज सिर्फ स्वार्थी लोगों की जमात है, एक भीड़ भर है। उसमें से यदि स्वार्थ को काट दिया जाए तो इस समाज का हर आदमी अकेला रह जाएगा, निहत्था खड़ा रह जाएगा। वास्तविक अर्थ में तो सिर्फ आदिवासी ही अपने समूह के साथ बचेगा क्योंकि उनके पास एक समाज है। वह अकेला हो ही नहीं सकता क्योंकि उसके पीछे उनका समाज है, उनका अपना संसार है, उनके पूर्वजों की आत्माएं हैं। वह सिर्फ अपनी उन्ही अद्भुत शक्तियों को बचाने के लिए लड़ रहा है। देश के 125 करोड़ की जनता को खड़ा कर दीजिए वह इस समाज में अकेला ही खड़ा है। भारतीय समाज ने सत्य का चुनाव करने और सत्य कहने का साहस खो दिया है। किस समाज की स्थिति यहां दयनीय है?

आपकी मुख्यधारा को किसने तय किया है? वह मुख्यधारा जिसमें आपकी तरह जो न खाता हो, न चलता हो, न बोलता हो, उन्हें सीधे पिछड़ा और असभ्य घोषित कर दिया जाता है। मुख्यधारा में आदिवासियों को लाने के प्रयास में करोड़ों रूपये की योजनाएं चलाई जा रही जो उनतक सही मायने में पहुंचती ही नहीं। आदिवासी अपनी छोटी-छोटी धारा में मिलकर भारतीय संस्कृति को और सुंदर बना रहे हैं। आदिवासी जिस दिन इस मुख्यधारा की तरह हो जाएगा उस दिन देश में करोड़ों वर्षो की जैवविविधता, जीवन शैली, कला खत्म हो जाएगी। देश में 700 से अधिक मिट्टी के शिल्प हैं जिन्हें सिर्फ जनजातियों के हाथ ही गढ़ सकते हैं। उनके पास इतना ज्ञान है कि वह ज्ञान उन्हें विनम्र बना देता है। वे आज भी सीखना जानते हैं, अपना ज्ञान नहीं बघारते और दंभ से भरा यह मुख्यधारा उन्हें सिर्फ सिखाने पर तुला है। सामूदायिकता में ही भारत की संस्कृति है और वह सामूदायिकता आदिवासियों के पास है।

उन्होंने वर्तमान हालातों पर टिप्पणी की। कहा गो-हत्या तो नहीं करनी चाहिए लेकिन गाय के पैर बांधकर दूध कौन निकालता है? क्या इसे अच्छा कहा जा सकता है? जीव-जंतु में कोई ऐसा जीव नहीं होगा जो अपनी मां का दूध पीने के बाद किसी और जीव का दूध पीता हो मगर गाय जिसके दूध पर उसके बच्चे का हक है। यह समाज उस बछड़े को उसका हक नहीं दे पाता। देश की जनजातियां ही हैं जिनमें कुछ तो गाय का दूध सिर्फ इसलिए नहीं पीती या उसका कम प्रयोग करती है क्योंकि बछड़े का उसकी मां के दूध पर पहला हक है। जनजातियां उन्हें उनका हक देती है। सही मायने में इस तथाकथित समाज ने अपनी परंपरा को ठीक से देखने की शक्ति खो दी है।
मुंबई से आई समाजिक कार्यकर्ता तिस्ता शीतलवाड़ ने कहा कि नई तकनीक का प्रयोग समाज अपने विकास के लिए करती है। लेकिन आज तथाकथित समाज जिस तरीके से नए तकनीक का प्रयोग खूनी, हत्यारे तैयार करने के लिए कर रही है। इस विकास की परिभाषाएं तय हो रही है। आदिवासियों के विकास की परिभाषाएं ऐसे ही समाज से निकल कर आ रही है। यह खतरनाक है। आरएसएस पर जैसे ही उनकी जुबान से कुछ शब्द निकले सभा में बैठे कुछ कट्टर हिंदूवादी उठ खड़े हुए, लगे चिल्लाने। तिस्ता शीतलवाड़ फिर चीखी यह पहचान है आपके सभ्य समाज की जो लोगों से उसके बोलने की आजादी छीन लेता है, अपने तरीके से पहनने-ओढ़ने, खाने-पीने और स्वतंत्रता से जीने की आजादी छीन लेता है। आदिवासियों ने जिस तरह झारख्ंाड, ओडि़शा, छत्तीसगढ़ में अपने आंदोलन के दम पर एमओयू रोके हैं। किसी समाज में इतनी ताकत नहीं है कोई एमओयू रोक सके। यह समाज दादरी जैसी घटनाएं पैदा करने की ही ताकत रखता है।
मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित संदीप पांडे ने कहा जिन इलाकों को आदिवासियों ने वर्षो से बचाए रखा। उन इलाकों को आज सरकार नक्सल-क्षेत्र घोषित कर दिया है। आदिवासी इलाकों में नक्सलवाद के पनपने के सबसे बड़े कारण पुलिस, राजस्व व वन विभाग है। आदिवासी इलाकों में, जंगलों में घुसकर इन लोगों ने उनकी स्त्रियों के साथ, बेटों के साथ, बूढ़े-बच्चों के साथ क्रूरतम व्यवहार न किया होता तो नक्सलवाद के पनपने का कोई वजह ही नहीं था। इन इलाकों में बेहतर नेतृत्व निकलकर आए तो चीजें बदलेंगी।
यह अंतराष्ट्रीय सेमिनार एक मौका था मेरे लिए अपनी बात कहने का। मैंने अपनी कविताओं को रखते हुए झारखंड में प्रकृति के दोहन की चर्चा की। इस दौरान लंबे समय से सांस्कृतिक अतिक्रमण के खिलाफ लड़ रहे आदिवासियों के संघर्ष की चर्चा की। कहा कि आदिवासी आज उठ खड़े हुए हैं अपने को संस्थागत धर्मो की खींचतान से बचाने के लिए। अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा, अपनी पहचान पर हो रहे अतिक्रमण से रोकने के लिए। समाज सवाल उठा रहा है कि क्या आदिवासी हिंदू हैं? क्या यह ईसाई है? क्यों कोई भी धर्म इसे अपनी पहचान के साथ जीने की शर्त पर उसका विकास करना नहीं चाहता । क्यों अपनी शर्तो पर इस समाज की मदद करने की बात उठती है। पूरा इतिहास गवाह है किस तरह आदिवासी समाज की संस्कृति को खत्मकर उनकी मदद के नाम पर खुद की जड़ें मजबूत करने के लिए इसकी लाश पर सब अपने पेड़ उगा रहे हैं । चाहे वह प्यार से हो या क्रूरता से। झारखंड के 86 लाख आदिवासी और देश भर में 13-14 करोड़ आदिवासी आज इसके खिलाफ लड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अश्विनी कुमार दूबे जिन्हें इस कार्यक्रम में विंध्य न्यूज नेटवर्क की ओर से सम्मानित किया गया। लगातार लेखन व रचनात्मक कार्य करते रहने और अपने इलाकों में इसके लिए प्रयास करने के लिए उन्होंने अपने सम्मान की राशि मुझे भेंट की और लगातार संघर्षरत रहने के लिए प्रेरित किया। वे स्वयं मध्यप्रदेश में आदिवासियों के लिए लगातार कानूनी लड़ाई लड़ रहे और इस दिशा में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके अलावा विंध्य न्यूज नेटवर्क ने महाराष्ट्र से आई लेखिका मधु कांकरिया और गाजीपुर के डा. आनंद कुमार सिंह को सम्मानित किया। जीवनोदय शिक्षा समिति ने बलिया के भोजपूरी कवि तारकेश्वर मिश्रा राही, तुर्की से आई प्रो. एसटी जसल, गाजीपुर के राम बदन राय, सुल्तानपुर हरिराम बनबासी, वाराणसी से पारसनाथ यादव, बिहार से प्रो. यू कुंडला और गाजीपुर के अजीज उल हसन सिद्दकी को सम्मानित किया।
झारख्ंड के लातेहार से सामूएल बिरजीया ने असुर जनजातियों की त्रासदी को लोगों के समक्ष रहा। इसके अलावा तुर्की से आई प्रो. एसटी सजल, जमैका के प्रो. आरके मिश्रा, नालंदा के प्रो. यू कुंडला, मध्यप्रदेश के प्रो. धर्मेंद्र पारे, बीएचयू के डा.विश्वनाथ मिश्रा,डा. सुरेंद्र नायक, डा. योगेंद्र, डा. संतोष सिंह, डा.. गोपाल ठाकुर, डा. पीके उपाध्याय, डा.मनीज खान, डा.प्रमोद तिवारी ने अपने विचार रखें।
इस अंतरास्ट्रीय सेमिनार में तुर्की, जमैका, सिंगापुर, नेपाल, नालंदा, मुंबई, बनारस, हरियाणा, झारख्ंड, गाजीपुर व अन्य राज्यों से लोगों ने हिस्सा लिया। पूरे आयोजन में पीजी कालेज, गाजीपुर के प्रो. डा. नारायण तिवारी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 6 अक्टूबर 2015

Saturday, 22 August 2015

‘अनिवासी’ सारंडावासी!

‘अनिवासी’ सारंडावासी!
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की पहल के बाद सारंडा में विकास की उम्मीद जगी है. लेकिन उन सौ गांवों या तकरीबन 25 हजार लोगों के लिए नहीं जिनका नाम सरकारी दस्तावेजों से गायब है
   


फोटोः  जसिन्ता केरकेट्टा
फोटोः जसिन्ता केरकेट्टा


जुलाई-अगस्त, 2011 में सरकार ने औपचारिक रूप से माना था कि झारखंड का नक्सल प्रभावित क्षेत्र सारंडा माओवादियों के कब्जे से मुक्त करा लिया गया है. उससे पहले पश्चिम सिंहभूम जिले का यह इलाका तकरीबन 11 साल से माओवादियों के नियंत्रण में था. इसके बाद अक्टूबर के महीने से ही यहां विकास कार्यक्रम बनने लगे. लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सारंडा सुर्खियों तब आना शुरू हुआ जब जुलाई, 2012 में जयराम रमेश केंद्रीय ग्रामीण मंत्री बने. उन्होंने मंत्री बनते ही इस इलाके के विकास के लिए योजनाएं बनाने के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर नए सिरे से कवायद शुरू की. इसके बाद सारंडा विकास योजना बनी और उसके तहत कुछ काम भी हुए. साल 2013 में गणतंत्र दिवस के अवसर पर जयराम ने सारंडा जंगल के दीघा गांव में विकास की बात कही थी. इसके बाद एकीकृत विकास योजना के अंतर्गत दीघा में कुछ काम शुरू हुए हैं. इस योजना में 56  और गांवों को भी शामिल किया गया है जो वनग्राम या राजस्व ग्राम घोषित हैं.
लेकिन इस सबके बीच आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इसी सारंडा में जंगल के बीच तकरीबन सौ गांव ऐसे हैं जिनके बारे में औपचारिक रूप से राज्य या केंद्र सरकार को कोई जानकारी नहीं है. जाहिर है कि तब यहां के निवासियों की गिनती भी राज्य के बाशिंदों में नहीं होती. ये न वनग्राम हैं, न राजस्वग्राम. इस ‘प्रोटेक्टेड फोरेस्ट’ में रहने वाले करीब 25 हजार आदिवासी व अन्य वन निवासी बिना किसी ‘पता’ के हैं. पहचान पत्र नहीं होने के कारण उन्हें वोट देने का अधिकार भी नहीं. इस क्षेत्र में वनविभाग की अनुमति के बिना प्रवेश निषिद्ध है. विभाग से अनुमति मिलने के बाद जब हम घने जंगलों के बीच बसे इन गांवों तक पहुंचे तो हमें पता चला कि पहचान या कागजों पर ‘पता’ न होने से इतर इन लोगों की पीड़ा कहीं ज्यादा है.
सारंडा के ऐसे ही गुमनाम गांवों में से एक जंबईबुरू गांव की सुकुरमुनी तोरकोद अपनी पीड़ा बयान करते हुए बताती हैं कि उनके बड़े बेटे बिरसा तोरकोद, जो स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (सेल) में काम करता था, को पुलिस ने दो साल पहले नक्सली होने के आरोप में पकड़ लिया था. बुरी तरह प्रताड़ित करने के बाद ही उसे छोड़ा गया. यह सिर्फ सुकुरमुनी के बेटे की बात नहीं है. यहां के आम युवकों को पुलिस के इस दुराग्रह से अक्सर जूझना पड़ता है. पुलिस माओवाद उन्मूलन के नाम पर इन गांवों के युवाओं को पकड़ लेती है. सरकारी पहचान न होने की वजह से वे तब ही पुलिस के चंगुल से छूट पाते हैं जब पुलिस ऐसा चाहे. सुकुरमनी जानकारी देती हैं, ‘ सालों पहले 17 किलोमीटर दूर कुंदलीबाग गांव से 250 लोगों का समूह वहां आकर बस गया था. लेकिन सरकारी अधिकारी इस पहचानते नहीं.’
जंबईबुरू की सुकुरमुनी नदी का गंदा पानी देखाते हुए जो वे खाने-पीने में उपयोग करती हैं
जंबईबुरू की सुकुरमुनी नदी का गंदा पानी देखाते हुए जो वे खाने-पीने में उपयोग करती हैं. फोटोः जसिन्ता केरकेट्टा


इस क्षेत्र में एक नदी है जो इन लोगों के लिए जीवनरेखा सरीखी है. लेकिन इस क्षेत्र में सेल सहित खनन करने वाली अन्य कंपनियां खनिजों की धुलाई के बाद निकला गंदा पानी इसमें बहाती हैं. इसकी वजह से नदी का पानी पूरी तरह लाल हो गया है. अपने घर के बर्तन में रखे पीने के पानी को दिखाती हुई सुकुरमुनी बताती हैं कि घर के लोग उसी लाल पानी को कई बार छान कर पीते हैं. इसी गांव के सरगिया तोरकोद जानकारी देते हैं, ‘ नदी की मछलियां और केकड़े तक इस पानी में मर चुके हैं. लेकिन हमारे पास कोई विकल्प नहीं है. सभी गांववाले इसी को इस्तेमाल करते हैं. हम इसकी शिकायत कंपनी के लोगों से कर चुके हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई.’
सरकार गरीब लोगों को खाने के अनाज पर भारी रियायत देती है, लेकिन यहां के लोगों को यह भी मयस्सर नहीं है. इन लोगों में किसी के पास भी राशन कार्ड नहीं है. इसी गांव के 33 वर्षीय तुरपा सुरीन की उम्र 33 साल है. उनकी दो बेटियां हैं जो चार किलोमीटर दूर कलईता गांव के आंगनबाड़ी केंद्र में पढ़ने जाती हैं. चूंकि सरकार जंबईबुरू को गांव का दर्जा नहीं देती तो वहां कोई स्कूल या आंगनबाड़ी भी नहीं है. तुरपा बताते हैं, ‘ गांव के हालात के बारे में  बीडीओ को जानकारी दी थी पर बीडीओ ने कोई कदम नहीं उठाया.’
जंबईबुरू से जंगल के और अंदर करीब चार किलोमीटर की दूरी पर बालेहातु गांव है. इस गांव की 69 वर्षीया सोमारी जानकारी देती हैं कि उनके गांव में 26 परिवार रहते हैं. यहां के कुछ बच्चे पढ़ने के लिए थोलकोबाद जाते हैं. बालेहातु के ही खोतो होनहागा बताते हैं कि इस गांव में कोई मुखिया या बीडीओ कभी नहीं आया. इस गांव के आगे चेरवांलोर, कादोडीह, धरनादिरी गांवों की भी ऐसी ही स्थिति है.
सारंडा में करमपदा एक बड़ा गांव है जिसका तमाम सरकारी दस्तावेजों में नाम आता है लेकिन इसी के पास कई और गांव हैं जो अपना नाम अब तक इनमें दर्ज नहीं करवा पाए हैं. करमपदा के बिमल होनहागा का दावा है कि इस इलाके में करीब चालीस ऐसे गांव हैं जिन्हें अब तक वनग्राम घोषित नहीं किया गया है और जो हर तरह की सुविधा से वंचित हंै. उनके मुताबिक यहां चेरवांलोर, धरनादिरी, कादोडीह, टोपकोय, कलमकुली, ओकेतबा, कुलातुपु, सरचीकुदर, तोगबो, जोजोबा, बनरेड़ा आदि गांव बसे हैं.
संरक्षित वन, असंरक्षित लोग
ह्यूमन राइट्स एेंड लॉ नेटवर्क नाम की संस्था से जुड़े चाईबासा हाई कोर्ट के अधिवक्ता अली हैदर इसे विडंबना मानते हैं कि आजादी के 64 साल बाद भी सारंडा के अंदर कई गांवों को वनग्राम का दर्जा नहीं मिला है और वे सरकारी, गैरसरकारी सुविधाओं से पूरी तरह वंचित हैं. वे इस बात को व्यंग्यात्मक लहजे में कहते हैं, ‘ जबकि इसी बीच जंगलों को संरक्षित वन घोषित कर दिया गया है.’  रांची हाई कोर्ट के अधिवक्ता अनूप अग्रवाल कहते हैं, ‘ यहां कोई कम आबादी नहीं है. 25,000 लोग रहते हैं जंगल के बीच. ऐसे में सरकारी जिम्मेदारी बनती है कि वह सर्वे के माध्यम से ऐसे गुमनाम गांवों का पता लगाए और उन्हें वनग्राम व राजस्व ग्राम घोषित करे.’
सरकार इन गांवों से पूरी तरह अनजान नहीं है लेकिन वह जिस कछुआ गति से आगे बढ़ रही है उससे इन गांवों को सरकारी पहचान मिलने में सालों लग सकते हैं. जगन्नाथपुर अनुमंडल एसडीओ जयकिशोर प्रसाद कहते हैं कि ऐसे गांवों का सर्वे होकर उन्हें बहुत पहले ही वनग्राम घोषित किया जाना चाहिए था. लेकिन अब इसकी जानकारी धीरे-धीरे मिल रही है. फिर भी काम प्रक्रिया के तहत होगा. सर्वे होने, वनग्राम घोषित करने, मतदाता सूची में नाम जाने में अभी लंबा समय लग सकता है. नोवामुंडी प्रखंड भाग-एक की जिला परिषद सदस्य देवकी कुमारी के अनुसार इस समय पांच गांवों को चिह्नित किया गया है. इनमें जंबईबुरू, बालेहातु, धरनादिरी, चेरवांलोर व कादोडीह शामिल हैं. ये पांचों नोवामुंडी प्रखंड भाग-एक के अंतर्गत आते हैं. चाईबासा के डिप्टी कलेक्टर अबुबकर सिद्दीकी ने नोटिफिकेशन पेपर दे दिया है. इसमें इन गांवों को राजस्व ग्राम घोषित करने की बात कही गई है. अब इन गांवों में ग्रामसभा कराना बाकी है. देवकी कुमारी खुद बताती हंै, ‘अभी लगभग सौ और ऐसे गांव हैं, जिन्हें ढूंढ कर राजस्व ग्राम घोषित करना है.’
फिलहाल सारंडा के अंदर दीघा गांव को छोड़कर और कहीं विकास की कोई रोशनी नहीं पहुंच रही है. दरअसल सारंडा के जंगल को ‘ प्रोटेक्टेड फोरेस्ट’ घोषित करने के पहले पूरे क्षेत्र का गहन सर्वे जरूरी था. जंगल के अंदर के अचिह्नित गांवों की पहचान करके  उन्हें वनग्राम और राजस्व ग्राम घोषित करना था. ग्रामीणों को वनभूमि का पट्टा देना था. पर सरकार ने बिना सर्वे कराए ही पूरे वनक्षेत्र को संरक्षित कर दिया. ऐसे में सरकार वहां पहुंची नहीं और उस एक चूक ने इन हजारों लोगों की जिंदगी कई और महीनों के लिए पीछे धकेल दी.


(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 6 Issue 6, Dated 31 March 2014)

महाजनों के हाथों गिरवी संथाल परगाना के गांव

 
 
 
 

                                   महाजनों के हाथों गिरवी संथाल परगाना के गांव

झारखंड का संथाल परगाना लंबे समय से महाजनी शोषण से लड़ता रहा है। यहां का इतिहास भी महाजनी शोषण के खिलाफ संथालों के संघर्ष का गवाह है। संथाल विद्रोह - हूल की जडें़ में भी इसी शोषण से उपजा आक्रोश था। झारखंड के पूर्व मंत्री शिबू सोरेन को संथाल परगना याद करता है तो महाजनी गुलामी के खिलाफ किए गए उनके संघर्षो के ही कारण। कभी शिबू सोरेन की मां रूपी बास्के ने यह मंत्र दिया था कि यह कभी न खत्म होने वाली लड़ाई है। वर्तमान परिस्थितियों में आज भी वह बातें हवाओं में गूंज रही हैं।


संथाल परगाना के किसी भी गांव में प्रवेश करने पर ग्रामीणों की जुबां पर महाजनी शोषण के खिलाफ उनके पूर्वजों के संघर्ष के गीत सुनायी देते हैं। यहां से कई संथाल आदिवासी मंत्री, विधायक रहें है, पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन संथाल परगना से ही हैं लेकिन अपने संघर्ष से अंग्रेजों को झुका देने वाले सिद्धो-कान्हो यहां आज हार चुके हैं। संथाल परगाना की हवाओं में आज भी महाजनी गुलामी की संड़ाध घुली है।

आदिवासी होने के नाते इस आरक्षित क्षेत्र से खड़ा होने वाला आदिवासी संथाल उम्मीदवार जीत हासिल कर सत्ता तक पहुंच तो जाता है, लेकिन वोट देने वाले उसके अपने ही लोग महाजनों के हाथों आज भी गुलाम रह गए हैं। संथाल परगना में सबसे दयनीय स्थिति पहाडि़या आदिम जनजातियों की हैं। यह वही पहाडि़या जनजाति है जिसका इतिहास एक लड़ाके और अपनी आजादी के लिए निरंतर संघर्ष करने वाले की रही है। जो मुगलों और अंग्रेजों की नाक में दम कर देने की ताकत रखता था। जिन्होंने सबसे पहले अंग्रेजों के खिलाफ सषस्त्र विद्रोह छेड़ा था। प्रथम स्वतंत्रता सेनानी तिलका मांझी इसी पहाडि़या समुदाय के थे। यह अलग बात है कि इस आदिम जनजाति के संघर्ष और इसके गौरवशाली इतिहास को आजादी के बाद भी कभी समुचित जगह नहीं मिल सकी। पहाडि़या विद्रोहों को शांत करने के लिए ही अंग्रेज शासकों ने दामिन-ई-कोह का निर्माण कराया गया था।
 दामिन-ई-कोह का भी अपना इतिहास है। यह पहाडि़यों के प्रभाव का जीता-जागता उदाहरण है। राजमहल और भालगपुर के प्रथम गर्वनर जेनरल क्लीवलैंड की हत्या के बाद 1818 में सुदरलैंड को इन पहाड़ी क्षेत्रों में पदस्थापित किया गया था। क्लीवलैंड योजना के तहत अंग्रेजी षासको ने सुदलैंड के प्रतिवेदन पर पहाडि़या विद्रोह को ठंडा करने के लिए 1832-33 में दामिन-ई-कोह की सीमा को परिभाषित किया। दामिन-ई-कोह सरकार द्वारा हमेषा जिले की आदिवासी आबादी के लिए स्वीकार्य रहा और गैर-आदिवासियों का प्रवेष निषिद्ध रहा। जिसपर सेंधमारी के कारण आज पहाडि़या जनजातियों की स्थिति दयनीय हो गई है। पहाड़ों के राजा कहे जाने वाले आदिवासियों के पहाड़ गुंडों के बल पर, बईमानी और छल-कपट से लूटी जा रही हैं और स्टोन-क्रषर के धंधे ने जहां गैर-आदिवासियों को राजा बना दिया है, वहीं आदिवासियों की स्थिति बद्तर कर दी है। जिस क्षेत्र को अंग्रेजी हुकूमत ने जमिंदारी शोषण से मुक्त रखा था वह क्षेत्र जमींदारी शोषण के खिलाफ संघर्ष करता रहा और आज भी कर रहा है।

आज भी आदिम पहाडि़या जनजाति महाजनी गुलामी के षिकार हैं। स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकार पाने के बदले गांव का गांव महाजनों के हाथों गिरवी पड़ा है। पेनम कोल माइंस के लिए चमचमाती सड़कों के किनारे कालिख पुते किसी साए की तरह लोगों की जिंदगी खड़ी है। जहां डिजिटल इंडिया के सपनों के बीच सरकारी आंखें इन क्षेत्रों को अनदेखा कर रही हैं।

खनिजों से समृद्ध जिले में गरीब जिंदगियां

संथाल परगना के साहेबगंज का सब-डिविजन रहा पाकुड़ 28 जून 1994 में अलग जिला बना। 2001 की जनगणना के अनुसार इसकी आबादी 6,65,635 थी। 2011 की जनगणना में यह यह बढ़कर 899,200 हो गई। जिले में आदिवासियों की आबादी 379054 है। 2001 के आधार पर जिले में 128 पंचायत हंै और गांवों की संख्या 1250 हैं। आदिम जनजाति के लोगों की संख्या 3,12,838 है। यहां संथालों की आबादी 2,66,066, माल पहाडि़याओं की आबादी 29,083 और सौरिया पहाडि़या की आबादी 8,252 है। यहां की पांच प्रतिशत आबादी शहर में और 22.24 प्रतिशत गांवों में रहती हैं।

यह जिला खनीजों के मामले में धनी है। ब्लेक स्टोन व कोयला के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। ब्लेक स्टोन की सप्लाई के कारण यह सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला जिला है। हर दिन इस जिले से 500 ट्रक स्टोन बंगाल जाता है। यहां का कोयला पंजाब भेजा जाता है। वर्तमान में पंजाब सरकार के बदले यहां कोयला निकालने और बाहर भेजने का काम पेनम कंपनी कर रही है। इतनी खनिज संपन्नता के बावजूद 2006 में यह सबसे पिछड़े जिले के तहत रखा गया।

ब्लेक स्टोन व कोयले के लिए विश्व में अपनी पहचान रखने वाले इस जिले का एक पहाडि़या आदिवासी बहुल गांव जुब्दिखरियोपाड़ा है । जिला मुख्यालय से इसकी दूरी 30 किलोमीटर है। यहां 300 से अधिक पहाडि़या रहते हैं। यह एक ऐसा गांव है जहां कोई भी परिवार ऐसा नहीं है, जो महाजनी गुलामी का शिकार न हो। हर एक परिवार पांच हजार से लेकर एक लाख रूपये तक के कर्ज में डूबा है। गांव में दो-चार पुरूषों को छोड़कर सारे पुरूष पलायन कर चुके हैं। गांव में सिर्फ महिलाएं हैं और पूरे गांव का जीवन कर्ज के सहारे घिसट रहा है।

हर परिवार के पास खेती की एक-दो या तीन-चार बीघा जमीन है। कर्ज लेने से पहले ये महाजन को अपने खेत या बैल दिखाते हैं। उसी के आधार पर उन्हें कर्ज मिलता है। कर्ज में डूबने के पीछे एक बड़ा कारण टीबी की बीमारी है। आज तक गांव के किसी भी बच्चे ने अस्पताल में जन्म नहीं लिया है, जबकि पाकुड़ सदर अस्पताल में निष्षुल्क संस्थागत प्रसव की व्यवस्था है। 17 अक्टूबर 2014 को इस गांव में जन्म लेते ही षांति देहरी के बच्चे की मौत हो गई, जबकि शांति खून की कमी, कमजोरी व बच्चे की मौत से दुखी, खाट पर पड़ी रहती है। षांति पहाडि़या के परिजनों ने बताया कि न जाने किस बीमारी के कारण शांति मां नहीं बन पा रहीं। दूसरी बार फिर गर्भ में बच्चा ठहरा था लेकिन जन्म के पूर्व ही बच्चा खराब हो गया। डाॅक्टरी ईलाज की कोई सुविधा नहीं होने के कारण जड़ी-बूटी से ईलाज कराया जा रहा है। वहीं कमजोरी या किसी तरह की बीमारी होने पर गांव के लोग खुद घर की छप्पर से स्लाइन की बोतल टांग कर अपने शरीर पर पानी चढ़ाते हैं। गांव के कुछ लोग गूंगे और निशक्त भी हैं। कुछ महिलाएं लंबे समय से रक्तश्राव की बीमारी से पीडि़त हैं।

गांव में ही नहीं पूरे जिले में मनरेगा फेल है और बेरोजगारी के कारण पलायन है। यह गांव महज एक उदाहरण भर है। कमोबेस यही स्थिति दूसरे पहाडि़या आदिवासी गांवों की भी है। यह जानकर आष्चर्य होता है कि पेनम की सड़क इस गांव से महज 7-8 किलोमीटर दूर से होकर गुजरती है, जिसपर हर दिन काला सोना ;कोयलाद्ध लेकर गाडि़यां गुजरती हैं। समय-समय सरकारी अधिकारी भी इधर दौरा करते हैं लेकिन गांवों तक किसी की पहुंच नहीं। इस रास्ते को विकास का पर्याय बताया जाता है, वहीं निकट के गांवों की स्थिति ऐसी कि कब किसी की जिंदगी खत्म हो जाए, इसकी गारंटी किसी के पास नहीं।

बंधक हो गई आने वाली कई पीढि़यां

जुब्दिखरियोपाड़ा गांव, शंकर साहू नाम के महाजन के हाथों गिरवी है। इस गांव की आने वाली पीढि़यां भी बंधक रहेगी क्योंकि कर्ज की राशि की दुगुना राशि चुकानी होती है। जमीन, बैल और घर बिक जाने के बाद बेटे-बेटियां काम कर महाजन को सूद चुकाएंगे। यह पूर्व से ही तय है।

इस गांव की फूलमुनी पहाडि़न ने अपने बेटे की टीबी की बीमारी के ईलाज के लिए षंकर साहू से 60-70 हजार रूपये कर्ज लिया है। एक-डेढ़ बीघा की खेती है। वह कर्ज कैसे चुकाएंगे? इस सवाल पर उसका जवाब है मजदूरी और खेती से कर्ज चुकाने का प्रयास करेगी। कर्ज कब तक चुकेगा इसकी कोई गारंटी नहीं। हर दिन सूद बढ़ता जाएगा और जमीन, बैल, पैसे सब खत्म हो जाएंगे। मूल और सूद का पैसा आने वाली कई पीढि़यां चुकाती रहेंगी। यह इस गांव का भविष्य है। काम करने की क्षमता खत्म होते ही आने वाली पीढ़ी भी महाजन के हाथों बंधक बन जायेगी।

भवनी देहरी के बेटे रोजगार की तलाश में पूणे गए हैं। बड़ी बेटी की बीमारी के ईलाज के लिए उन्होंने अब तक 90 हजार रूपये का कर्ज लिया है। हाल ही में पीलिया के ईलाज के लिए चार हजार रूपये और कर्ज लिए हैं। दो बीघा खेत है उनके पास। पति बेरोजागर हैं। कहती हैं खेती और मजदूरी से कर्ज चुकाएगी। बेटे शहर से पैसे भेजेंगे तो कर्ज उतारने में मदद मिलेगी। अन्यथा इतने पैसे चुकाने के लिए एक जन्म काफी नहीं है।

चीनी देहरी के पति व लड़कों ने पुणे और चेन्नई पलायन किया है। उसने 31 हजार रूपये का कर्ज ले रखा है। खेती से ही कर्ज चुकाएगी। पर, सिंचाई के आभाव में खेती की स्थिति ठीक नहीं। खाने भर को अनाज मिल जाता है। पर वह भी कर्ज चुकाने में चला जाता है।

विनीता पहाडि़या ने अपने ईलाज के लिए शंकर साहू से 20 हजार रूपये कर्ज लिया है। उसके तीन बच्चे हैं। तीनों बच्चे गांव में दाई की मदद से जन्में हैं। इसके बाद विनीता कमजोर व बीमार हो गयी और अब लंबे समय से ईलाज चल रहा है।

रामी पहाडि़या ने 15 हजार कर्ज लिया है। चांदी की चूड़ी गिरवी रखकर और 12 हजार रूपये का कर्ज भी लिया। तीन बीघा खेत है, जिसमे सिंचाई की कमी के कारण एक ही फसल होती है। साल बीतते ही सूद बढ़ जाता है।

इसी तरह कमली पहाडि़या ने 15 हजार, मेहंदी देहरी ने 15 हजार, लखी पहाडि़या, अनिता देहरी ने 10 हजार, सूरजमनी देहरी व रिया देहरी ने सात हजार और मंगू देहरी ने भी तीन हजार रूपये का पकर्ज लिया है। गांव का हर परिवार ऐसे ही कर्ज में डूबे हैं।

मनरेगा के साथ दम तोड़ता उसका मकसद
 मनरेगा के अस्तित्व में आने के पीछे एक दर्शन था कि इससे गांवों से पलायन रूकेगा। हर हाथ को काम मिलेगा। लोगों का जीवन-स्तर बेहतर होगा। आजीविका के अवसर बढ़ेगें। विकास का रास्ता गांवों तक पहुंचेगा। पर ऐसे दर्षन के दर्दनाक हस्र ऐसे गांवों में नजर आता है, जहां की जिंदगियां महाजनों के हाथों गिरवी हैं। आदिम जनजातियों की आबादी घटने से भी बड़ा प्रष्न यह है कि उनके जीवन को बचाने और बेहतर बनाने के तंत्र क्यों कमजोर हैं? बच्चे जन्म तो ले रहे पर कितने दिन जी सकेंगे इसकी गारंटी क्यों नहीं?

गांव के लखन पहाडि़या बताते हैं कि तीन साल पहले गांव में तीन तालाब बनने का काम शुरू हुआ था। आधा पैसा मिलने के बाद बाकी राशि नहीं मिली, जिससे काम अधर पर लटक गया। यह योजना 2012-13 की थी, पर अब तक पूरा नहीं हुई है। 2013-2014 सत्र में सात लाख ग्यारह हजार पांच सौ की राशि से और तीन तालाब बनने थे। इसमें एक तालाब के लिए 22 हजार, दूसरे के लिए 26 हजार और तीसरे के लिए मात्र नौ हजार रूपये ही दिये गये। बाकी राशि नहीं मिली और काम अधूरा रह गया। यह काम 2014 में पूरा होना था। सरकार की ओर से समय पर राशि न मिलने पर महाजन से 50,000 रूपये कर्ज लेकर काम किया गया। पर अब तक न काम पूरा हुआ है, न बकाया राशि ही मिली है। उल्टे ग्रामीण ही कर्ज में डूब गए। लखन पहाडि़या ने ग्राम सभा भवन व चबूतरे की मरम्मत के लिए भी कई बार आवेदन दिया है लेकिन उसका आवेदन स्वीकृत नहीं हुआ है। वे बताते हैं कि इस साल जुलाई माह में 2014 के लिए गए कर्ज के कारण महाजन 40 हजार की कीमत के गाय-बैल ले गए और उनकी जमीनें भी सूद के रूप में अपने नाम कर गए हैं। लोगों का सबकुछ महाजनों के पास गिरवी है। गांव में मातम सा माहौल है।

यह विडंबना है कि संथाल परगना की जिस जमीन पर पूर्वज महाजनी गुलामी के खिलाफ लड़ते रहे, वह संथाल परगना आज भी महाजनी गुलामी से मुक्त नहीं हो सका है।

 

 - जसिन्ता केरकेट्टा, स्वतंत्र पत्रकार




                                             



 
    




 
 

Friday, 14 August 2015

अपने आदिवासी पूर्वजों को सलाम

 
स्वतंत्रता दिवस पर अपने आदिवासी पूर्वजों को सलाम
जिन्हें अंगरेजों ने 'सर' और 'रायबहादुर' की उपाधि नहीं, जेल और फांसी दी
...........................................
....................
मुझे अपने आदिवासी पूर्वजों पर गर्व है, जिन्होेंने पूरे देश में अंगरेजों के खिलाफ सबसे पहले लड़ाई छेड़ी। यह महज संयोग नहीं कि हमारे पूर्वजों को अंगरेजों ने 'सर' और 'रायबहादुर' जैसी उपाधि नहीं दी। बल्कि, उन्हें जेल में कठिन यातनाएं और फांसी दी। उन्होंने आजादी और अस्मिता की रक्षा के लिए मौत को गले लगाना पसंद किया।

बाबा तिलका मांझी : तिलका मांझी ने अविभाजित बिहार के भागलपुर के आसपास के क्षेत्रों में अंगरेजों व जमींदारों के खिलाफ संतालों में राजनीतिक चेतना जगायी, उन्हें एकजुट किया। विद्रोह का बिगुल फूंका। पूरे संताल प्रदेश को अंगरेजों से मुक्त करने की लड़ाई लड़ी। पकड़े जाने के बाद उन्हें पूरे भागलपुर की सड़कों पर हजारों की भीड़ के सामने चार घोड़ों से घसीटा गया था, फिर चौक के एक पेड़ पर फांसी दे दी गयी। यह 1784— 1785 के आसपास की बात है। 1857 की 'आजादी की पहली लड़ाई' से काफी पहले।
वीर बुधु भगत : जन्म चान्हो प्रखंड के सलगाई गांव मे हुआ था। उन्होंने 1820 में जमींदारों, सूदखोरों, ठेकेदारों और अंगरेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूंका, जिसे आज हम कोल विद्रोह के नाम से जानते हैं। यह लगभग 12 सालों तक चला। पिठोरिया, बुंडू, तमाड़ आदि कई स्थानो पर घमासान लड़ाई हुई। उन्हें पकड़ने के लिए अंगरेजों ने अपनी पूरी ताकत झोंकी थी। वह 14 फरवरी 1832 को सिंहभूम के ऐतिहासिक सेरेंगसिया घाटी की लड़ाई में शहीद हुए।
संताल हूल के नायक सिदो कान्हू: 1793 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने परमानेंट सेटेलमेंट एक्ट लागू किया। बंगाल, बिहार और ओड़िशा का लगभग पूरा क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन आ गया और जमींदार जमीन के मालिक बन गये। उनके साथ साहूकार, ठेकेदार और पूरा अमला आया। उनके चक्रव्यूह में संताल बंधुआ मजदूर बनने लगे। उन्होंने 1855 में जमींदारों, साहूकारों, ठेकेदेारों और अमलों के खिलाफ संताल हूल की शुरूआत की। भागलपुर, पियालपुर, कदमसराय, पालसा, महेशपुर व अन्य जगहों पर अंगरेजो के साथ जबरदस्त लड़ाई हुई। सरकार ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। 24 जुलाई 1855 को सिदो को गिरफ्तार कर लिया गया। कान्हू के नेतृत्व में 30,000 संताल जंगलों में रह कर लड़ते रहे। 1856 में अंगरेजों की बड़ी सेना ने विद्रोह को दबा दिया।
तेलंगा खड़िया : गुमला के सिसई जिले के थे। 1793 में परमानेंट सेटेलमेंट एक्ट ने आदिवासियों का जीना हराम कर दिया। इसके खिलाफ तेलंगा खड़िया के नेतृत्व में आदिवासी एकजुट होने लगे। उनका विद्रोह फूट पड़ा। तेलंगा खड़िया को गिरफ्तार कर कोलकाता के सेंट्रल जेल में रखा गया। उन्हें दो साल तक अमानवीय यातनाएं दी गयीं। जेल से छूटने के बाद उन्होंने फिर से लोगों को संगठित करना शुरू किया।23 अप्रैल 1880 को जब वह प्रार्थना कर रहे थे, तब अंगरेजों के दलाल बोधन सिंह ने गोली मार कर उनकी हत्या कर दी।
धरती आबा बिरसा मुंडा : जमींदारों द्वारा मुफ्त ली जाने वाली सेवा, जमींदारों द्वारा मालगुजारी के अलावा सेवा व सामानों की उगाही के खिलाफ खूंटी, तमाड़ क्षेत्र में उलगुलान की शुरूआत की। इसके लिए लोगों को एकजुट करना शुरू किया। 1895 तक उनके शिष्यों की संख्या हजारों तक पहुंच चुकी थी। 1895 में उन्हें रात के समय सोते हुए गिरफ्तार किया गया।
जेल से छूटने के बाद उन्होंने रांची के चुटिया मंदिर पर कब्जा कर लिया। वह मानते थे कि चुटिया मुंडाओं का पुराना गढ था, जिस पर हिंदुओ ने कब्जा कर लिया था। जहां के मंदिर में उन्होंने अपने देवी— देवताओें की मूर्तियों को स्थापित कर दी थी। 24 — 25 दिसंबर 1899 की रात उलगुलान की शुरूआत की तिथि तय हुई।
क्रिसमस की रात खूंटी, तमाड़, बसिया और रांची थाना क्षेत्रों में एक साथ सौ से अधिक स्थानों पर जानलेवा हमले और लूटपाट की घटनाओं को अंजाम दिया गया। एंग्लिकन, जर्मन, रोमन कैथोलिक मिशनरी और पुलिस पर हमले हुए। नौ जनवरी 1900 को डोंबारी पहाड़ पर मुडाओं को अंगरेजी सेना ने घेर लिया। बिरसा सिंहभूम की ओर निकल गये, जहां चार फरवरी को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस के अनुसार नौ जून को रांची जेल में हैजे के कारण उनकी मौत हो गयी, जबकि कई लोग यह मानते हैं कि उन्हें जहर दिया गया था।

संकलन — बेंजामिन लकड़ा की पुस्तक 'झारखंड के आदिवासी महानायक' से।
फोटो — 160 साल से अधिक समय से जीवित वह पेड़, जिसपर संथाल-हूल के अगुआ सिदो को फांसी पर लटकाया गया। यह साहेबगंज जिले, बहरेहट प्रखंड के पंचकठिया में क्रांति-स्थल पर खड़ा है।


By - Manoj Praveen Lakra.

आग और उम्मीद के फूल

(Pic By- Jacinta Kerketta) 
सारंडा के फूल
...............................
नींद में डूबी बेखबर
फूलों की खुशबू
उठती है तिलमिला कर...
जब नथुने भरने लगते हैं
मशीनों की गंध से
और फटने लगते हैं
कान, विस्फोटों से।
उठकर महसूसती है जैसे
एक करारा तमाचा
किसी ने जड़ दिया हो
अलसाए चेहरे पर
और उभर आया है
उसके अस्तित्व पर
कोई गहरा गड्ढा।
फिर भी वह उठकर
चुनने लगती है
गंध अपनी जड़ों की,
उड़ रहे हवाओं में
जिसके परखच्चे बारूद से।
टांग दी गई है
बारिश की लाश
किसी पेड़ पर,
ठीक जंगल के उपर
तश्तरी सा आकाश
गिद्धों से पट रहा है
और नदियों की आंखों से
खून, आंसू बन बह रहा है।
कुदाल, गैंता और कुछ हाथ
कोने में चुपचाप सिसक रहे हैं।
दरवाजे पर खड़े
चंद कागजों के इशारे पर
लगते हैं वो दफनाने
अपने ही गुस्से को।
तब चुपके से
बारूद और मशीनों की
गंध के गले पर वार कर
खुशबू उठती है
और घुस जाती है
जंगल में हर फूल के भीतर।
और उग आता है सुबह
फिर कोई नया फूल
आग और उम्मीद बन
सारंडा के अंदर कहीं।
........................................
जसिन्ता केरकेट्टा

लाल नदियां

 
 
लाल नदियां
............................
हजारों पेड़ों की लाश
गिरा चुकने के बाद
खून से सने हाथ
चुपचाप धोते है खुद को
सारंडा की नदियों में
तब दहाड़ें मारता है उजला पानी
किनारों के कांधे पर सर रखकर
और पूरा जंगल लाल हो उठता है।
सखुआ की डाली ठोंकती हैं
जीवित स्मृतियों का पर्चा दरख्तों पर
एक आवाज हहराती है
गवाह बनकर वक्त के कटघरे में
और दम तोड़ते सबूत इंतजार करते हैं
अंतिम सांस तक न्याय के
कदमों की आहटों का,
तब सांझ, भरोसे की आंखें
डूबने लगती है सूरज के साथ
जब कागजों पर समझौतों का ठप्पा
लगाने लगता है कोई खौपनाक ठहाका....।
सारी पड़तालें दुबक जाती हैं
और भूखी हड़तालें अंधेरे में
चुपचाप चबाने लगती हैं रोटियां
और खून के आंसू
रोती रह जाती हैं
सारंडा की लाल नदियां।
........................................................
 

हूल की हत्या

 
 
हूल की हत्या
.....................
हां मैं वही गाछ हूं
पंचकठिया-बरहेट के क्रांति स्थल का
वक्त की अदालत में खड़ा ...

एक जीवित गवाह
जो पहचानता है
हूल के हत्यारों के चेहरे ।
मैं छूता हूं अपने कंधे के दाग
उस रस्सी की रगड़ से उभरे
जिसके फंदे से
लटका दिया गया था
सन् 1855 का प्रतिरोध ।
झूल गई थी जिसपर
संथाल हूल के अगुआ सिद्धू की
शोषण के खिलाफ युद्धरत आत्मा ।
उसकी देह से अंतिम बार निकली
पसीने की गंध
कुचले हूल की सिर उठाती गंध बन
बह रही जंगल की शिराओं में
पारे की तरह आज भी।
छटपटाते हुए उसके पैर के अंगूठे
टकराए थे मेरे सीने से
ठीक वहीं जहां मेरा कलेजा धड़कता है ,
वहीं से आज भी रिसता है खून
हूल-हूल पुकारता हुआ ।
उस पुकार पर
जंगलों के सीने में धंसी
स्मृतियों की छूरियों की धार
व्याकुल हो उठती हैं
काट डालने को सारी बांबियां
निहत्थों की देह
चाट जाने वाले दीमकों की
और मचलती हैं तोड़ डालने को
हत्यारों के उम्र पर
चढ़ाए गए सारे कवच ।
हां इसी गाछ की बूढ़ी बाहें
जिसपर झूलकर
जवान होती थी पीढ़ियां
मेरी बाहों का लेकर सहारा
वीर सपूतों को साजिशों ने
मौत के घाट है उतारा
मैं खड़ा हूं ठीक वहीं आज भी
दफना दिए गए
वक्त की कब्र पर
एक जीवित सबूत बनकर,
एक लौ बन सच्चाई की
जो जगाए रखता है
इतिहास को नींद में भी ।
वक्त की अदालत पूछती है मुझसे
हूल के हत्यारों के चेहरे कैसे थे?
तब मैं चीखकर कहता हूं
हर काल में हैं
उनके चेहरे कुछ एक से ...
निर्दयता की पराकाष्ठा से माथे
हवस की सीमाएं लांघती हुई आंखें
जीवन रस चूसने वाली नरभक्षी अंगूलियां,
पृथ्वी की पोटली कांख में छिपाकर
और...और... की तलाश में भटकती
ब्रह्माण्ड की सबसे भूखी आकृतियां....
यह सुनते ही अदालत
उठ खड़ी होती है
और स्वयं को स्थगित कर
बढ़ जाती है न जाने
किस अनिश्चतकाल की ओर....
.....................................................
- जसिन्ता केरकेट्टा
(160 साल से भी अधिक समय से जीवित वह पेड़, जिसपर संथाल-हूल के अगुआ सिद्धू को फांसी पर लटकाया गया था। साहेबगंज जिले, बहरेहट प्रखंड के पंचकठिया में क्रांति-स्थल पर खड़ा है वह पेड़ आज भी ।)

बवंडर और दिशाएं

 
बवंडर और दिशाएं
...........................
मुट्ठी भर दाना
बचा रहे पृथ्वी पर
इसलिए भूसा ओसाने ...

खड़ा है एक गांव
गर्म हवाओं के खिलाफ
खलिहान में सूप लेकर ।
ऐसी जद्ोजह्द की एक शाम,
खपरों की छेद से
देख लेती है डिबरी की रोशनी
पगडंडियों से चुपचाप
चले आते बवंडरों को,
दौड़ पड़ती है
धान की ताजी गंध से तार
धूप के अंगोर से धार
हंसिया, गड़ा देने को
बवंडरों के सीने पर,
ठिठकती है देख,
तेज हवाओं की चाकू से
चाक हुए गांवों की घाव पर
दिशाएं डाल रही हैं चीरकर
उनके ही इतिहास का चिथड़ा,
और वह कर रहा खुद को
धीरे-धीरे घुप्प अंधेरे में
दिलासा देती दिशाओं के हवाले।
अंततः दिशाएं
उजाले का वादा कर
धकेल देती हैं उन्हें
बवंडरों के बीच
और झाड़ लेती हैं पल्ला
देकर हवाला
" पृथ्वी को बचाने के लिए
किसी न किसी को तो
कुर्बानी देनी ही होगी। "
.......................................
जसिन्ता केरकेट्टा

विकास की धूल

 
 
 



 
विकास की धूल
............................
फांकती हुई विकास की धूल
दिन-रात खांसती हैं जिंदगी
हृदय की उम्र सिमट गई है,
आंखें उम्मीदों की
दिन गिन रही अंगूलियों में।
 
अब नहीं जाते कोई कदम
खेतों की ओर वहां
पैरों को लत पड़ चुका है
दौड़ पड़ने को कोयले लदे
खड़े ट्रकों के पीछे
पैनम के रास्तों पर,
कुदाल ने नहीं चखा
लंबे अरसे से
किसान के कंधे में झूल
गीतों का रस
वो अब निकलता है
घर से चुपचाप
किसी चोर की तरह।
 
और सपने दब जाते हैं रात
अचानक रौंदकर निकल गए
किसी ट्रक के नीचे
तब अपने हिसाब से आकर
जीवन की कीमत तय करती हैं
उंची बोलियां
और रफा-दफा हो जाती हैं
इस झमेले में कई जिंदगियां।
 
क्या-क्या मिला है मुआवजे में
जब पूछती है सच्चाई किसी से
तब कोने में बैठा बूढ़ा अनुभव
बस इतना ही कह पाता है
फांकती हुई विकास की धूल
दिन-रात खांसती हैं जिंदगी
हृदय की उम्र सिमट गई है,
आंखें उम्मीदों की
दिन गिन रही अंगूलियों में।
 
 
- जसिन्ता केरकेट्टा


डोंबारी की आवाज


डोंबारी की आवाज
................................
सोचता हूं आखिर क्यों ?
भोगनाडीह के घेरे की
सलाखों को थामे
फिर से निकल आने को
सिद्धो-कान्हू का
एक हूल छटपटाता है
और डोंबारी पहाड़ पर
बार-बार बिरसा मुंडा का
एक उलगुलान फिसल जाता है ।
मैं धरती से मांगने लगता हूं
थोड़ा सा खुरदुरापन
और जोहने लगता हूं मुंह
किसी चट्टान की रगड़ का
चाहता हूं एक मुट्ठी
जिसमें थोड़ा आग हो।
एक जिंदा आग की लकीर
गोदना चाहता हूं माथे पर आज
और सोख लेना चाहता हूं आंसू
जिसकी बाढ़ पर बसता हो समाज।
मैं चुनना चाहता हूं वह बिखराव
जहां अकेला पड़ जाता है हर दांव
जिसकी कीलों से उखड़ गए
कई योद्धाओं के पांव।
मैं मांगता हूं एक नया आगाज
जब-जब बिरसा मुंडा
खोलें समाधि पर
अपनी स्मृति की दराज
वो पाएं हूल को सुनते हुए
डोंबारी की आवाज....।।

- जसिन्ता केरकेट्टा

गांवों से निकलती प्रतिभाएं






 
झारखंड के सिमडेगा जिले के सुदूर क्षेत्र के आदिवासी लड़कियों की कविताएं पहली बार प्रभात खबर समाचार पत्र के बाल-प्रभात में छप रही हैं। अब तक रेंगारीह (सिमडेगा) की चार बच्चियों की कविताएं बाल-प्रभात में प्रकाशित हुई हैं। इनमें सपना सोरेंग, सोनिया मिंज, अमला किंडो व करिश्मा बा शामिल हैं। स्कूल में पहली बार आदिवासी बच्चियों ने स्वयं की प्रकाशित कविताएं देखी। यह पूरे स्कूल के लिए प्रेरणा बन रहीं हैं। रेंगारीह में स्कूल की प्रचार्या निर्मला ने इन बच्चियों का उदाहरण देते हुए पूरे स्...कूल के समक्ष इनकी प्रकाशित कविताओं की चर्चा की। स्कूल के दूसरे बच्चों को पढ़ने के लिए बाल-प्रभात उपलब्ध कराने की बात कही । स्कूल के दूसरे बच्चों से अभी से ही अधिक पढ़ने व कुछ न कुछ रचनात्मक लिखने के लिए प्रोत्साहित किया और अपनी प्रतिभा के अनुसार कुछ नया करने की बात कही है।
एक शुभचितंक ने इन बच्चियों के लिए 20 कहानी व कविता की पुस्तकें सहयोग के रूप में दी हैं। इनमें प्रेमचंद की कहानियां, आदिवासी लोक कथाएं, उपन्यासकार रणेंद्र के ग्लोबल गांव के देवता, वंदना टेटे की कविता संग्रह कोनजोगा, प्रणव प्रियदर्शी की नई कविता संग्रह सब तुम्हारा सहित अन्य कई किताबें शामिल हैं। इस तरह कुल 45 किताबें हम बच्चों के लिए उपलब्ध करा सके हैं। इन किताबों को पढ़ने-पढ़ाने व संचालन का जिम्मा हमने बच्चों के हाथों में दिया है। ताकि किसी को किताब लेने में डर या झिझक न हो। इसके सही संचालन के लिए चार चयनित छात्रा को नेतृत्वकर्ता की जिम्मेदारी दी है। दो उनके सहयोगी के रूप में कार्य करेंगी। दो संचालन की मुख्य भूमिका में रहेंगी। इनके उपर स्कूल प्रबंधन को जिम्मेदारी दी है ताकि वे इनका मागदर्शन करे। स्कूल बच्चों में काफी उत्साह है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अन्य बच्चियों की कहानियों के प्रकाशन का कार्य राह पर है।

लम्हें जो जिम्मेदारी का एहसास कराते हैं







1- विश्व आदिवासी दिवस-2014 में झारखंड इंडिजिनस पीपुल्स फोरम द्वारा सम्मानित होते हुए।
2- छोटानागपुर सांस्कृतिक संघ द्वारा युवा प्रेरणा सम्मान-2014।
3- डा. रविशंकर स्मृति उपाध्याय संस्थान वाराणसी द्वारा रविशंकर उपाध्याय स्मृति पुरस्कार - 2015 (बीएचयू में)

Thursday, 13 August 2015

हवस पर हंसिया गड़ाती " रेड जोन " की आदिवासी स्त्रियां

 
 
 

                           हवस पर हंसिया गड़ाती " रेड जोन " की आदिवासी स्त्रियां
                             .............................................................................
                   ( विनोद कुमार के उपन्यास " रेड जोन " पर समीक्षात्मक आलेख)

उस दिन एक आदिवासी औरत ने कटघरे में खड़े होकर न्याय की भीख मांगना कबूल नहीं किया। भीख मांगना उसके खून में नहीं। अपने बच्चों की ओर इशारा कर भरी अदालत में कहा कि इस व्यवस्था से उसे कोई उम्मीद नहीं है। उसके पति और अपने पिता को न्याय तो उसके बच्चे देंगे। देखते ही देखते भीड़ को चीरती हुई वह दोनों बच्चों का हाथ थामे निकल गई।
उस रात झोपड़ी में दो चीजें अचानक चमकी थी। व्यवस्था की भूखी आंखें और एक हंसिया। फिर एक चीख के साथ हवस के गले से खून निकला था। वह औंधे मूंह पड़ा था। तब हंसिया की आंखें अंधेरे में चमकी थी, वह जोर से हंसी थी। धान के काटने के बाद की उसकी हंसी से यह अलग थी। उस हंसिया की धार ने हवस से समझौता नहीं किया न खुद को उनके हवाले। वह हंसिया गांव से जब निकली तो ऐसी ही व्यवस्था को सुरक्षा देने वाले गलियों में गोलियां बरसाने वाली बंदूक में तब्दिल हो गई। देखते ही देखते वह उन गलियों को लांघती हुई रेड जोन के गलियारे में घुस गई।
विनोद कुमार के उपन्यास " समर शेष है " में जिस आदवासी स्त्री ने अपने पति सोबरन मांझी को महाजनी प्रथा के खिलाफ लड़ते देखा, उसकी हत्या के बाद उसने लड़ाई को अपने बेटे के माध्यम से जिंदा रखा। जिसने मंत्र दिया - "हमारे लिए यह कभी न खत्म होने वाली लड़ाई है। इसलिए यहां थककर बैठना मना है।" उस आदिवासी स्त्री ने अनायास ही पूरे आदिवासी आंदोलन व संझर्ष के लिए वह मंत्र दे डाला था। " यह कभी न खत्म होने वाली लड़ाई है। हमारे लिए थकना मना है।" "समर शेष है" जहां अंत होता है वहां एक कसक पैदा होती है। अनवरत चलने वाले युद्ध का एक यौद्धा जिसने महाजनी प्रथा के खिलाफ लड़कर लोगों को उनके शोषण से मुक्त कराने का संकल्प लिया था, वह महाजनी प्रथा के पोषक तत्वों से समझौता कर बैठा। जिस व्यवस्था ने महाजनी प्रथा के विरूध उनके प्रतिरोध को आतंकवाद की संज्ञा दी। दुखद यह कि जिसे पिछड़े तबके ने कभी आतंकवादी नहीं माना, स्वयं उसने भी अपने आप को आतंकवादी नहीं माना, उस शक्स ने षडयंत्र के सामने अंततः आत्मसपर्मण कर दिया। उपन्यास "रेड जोन" इसके बाद क्या हुआ इसके आगे की कहानी कहता है। शोषण को निरंतर पोषित करने वाली व्यवस्था किस तरह आंदोलनों को तोड़ती है, षडयंत्र के तहत खत्म करती है और यौद्धाओं के नाखुन कुतर लेती है। उपन्यास रेड जोन इसकी सच्चाई खोलता है। कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े एके राय, महेंद्र सिंह जिनके संघर्ष का इतिहास धूमिल न पड़े, उसपर से धूल -गर्द हटाकर उपन्यास उन विचारों को जिंदा रखने का काम करता है। एके राय ने सिर्फ अलग-झारखंड का नहीं बल्कि एक शोषण मुक्त झारखंड की कल्पना की थी। वे गलत नहीं थे कि यदि वर्ग संघर्ष पीछे पड़ा तो संप्रदायिक संघर्ष आगे आ जाएगा। तब बाहरी और भीतरी, मजदूर व किसान, आदिवासी-गैरआदिवासी और अंततः आदिवासियों के बीच भी ईसाई और गैरईसाई के नाम पर विभाजन होगा और संघर्ष का रूख बदलेगा। आज वही हो रहा है जिसका डर उन्हें झारखंड बनने के पूर्व से था।
" समर शेष है" जिन अलग-अलग आदिवासी स्त्रियों की मनोदशा व जीवन को सामने रखता है, अचानक उनको " रेड जोन " में हम दुर्गा के रूप में देखते हैं। रेड जोन को ठीक से समझने के लिए विनोद कुमार के उपन्यास " समर शेष है " से भी गुजरना बेहद जरूरी लगता है। इसके तार उपन्यास " रेड जोन " तक बिछे हुए हैं।
" समर शेष है " से लेकर " रेड जोन " तक का सफर महज किसी कहानी से गुजरना नहीं है। ये सिर्फ उपन्यास नहीं है। ये एक ऐतिहासिक दास्तावेज हैं। छोटानागपुर की धरती पर संघर्षो और आंदोलनों की जड़ों में कैसी गंध छिपी हुई है। आने वाली पीढ़ियों को अपने पूर्वजों के उसी गंध से रू-ब-रू कराते हैं ये उपन्यास। इनकी खासियत ऐसी जड़ों की तरह है जो मिट्टी को बांधे रखती हैं। जड़ों के साथ उसी मिट्टी के बंधन सा उपन्यास पाठक को पूरी तरह बांधकर रखता है। शुरू से अंत तक। जीवन में कई झटके होने के बावजूद भी उपन्यास के साथ जीवन के तमाम झटकों के बीच स्मृतियों के पहिये तेजी से भागते हैं। एक यथार्थ जो उपन्यास के रूप में तेजी से सांसों में चढता-उतरता है, खून में गर्माहट पैदा करता है और अचानक मुट्ठियां भिंचने लगती हैं। किसी सपने में चलते हुए, उसका वास्तविक महसूस होना। नींद में आदमी का पसीना-पसीना हो जाना। सांसे सपने को हकीकत के रूप में महसूसते हुए कहीं न रूक जाए। इसलिए विनोद कुमार के उपन्यास पाठक को झकझोर कर उठाते हैं।
उनका उपन्यास " रेड जोन " गांवों की जमीन से सूरज की मानिंद उगता है। बिल्कुल लाल। जैसे कोई पृथ्वी के छोर पर किसी ने मिट्टी के घड़े उबड़ाकर रख दिए हो। लाल, तपी हुई पेंदी पूरे आकाश में सूरज बन गया हो। इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाएं जिसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को सुनाने की जिम्मेदारी जब कोई नहीं निभा रहा तब उनका उपन्यास उस जिम्मेदारी को उठा रहा है। एक संघर्षशील पत्रकारिता के दौरान कलम को छिल-छिलकर तीर की तरह पैना बनाने वाले उपन्यासकार विनोद कुमार के उपन्यास " रेड जोन " आपको कब, कहां, कैसे भेदता है, गड़ता है पता नहीं चलेगा। हां लेकिन कुछ तो कहीं जेहन में धंस गया है, यह जरूर महसूस होगा।
" समर शेष है " में आदिवासी स्त्रियां विभिन्न त्रासदी व पहलुओं को सामने लाती हैं। " रेड जोन " उन स्त्रियों से अलग पहलुओं को जीती स्त्रियों को भी सामने लाकर खड़ा करता है। नेमरा गांव की रामेश्वरी जहां शहर के किसी ईट-भट्ठे के मुंशी के द्वारा शोषित होकर अंततः विक्षिप्त अवस्था में भटकती है। रामेश्वरी के कई अनकहे सवाल वर्तमान को भी मथते हैं। सड़कों में इतनी स्त्रियां आखिरकार कैसे विक्षिप्त हो रहीं हैं? कैसे बिन बाप के बच्चे कटोरा पकड़कर भटक रहे हैं? समाज का कोई न कोई पुरूष उनके इन हालातों का कारण तो जरूर होगा। नेमरा गांव की जिरन धनबाद के कोलियरी इलाकों का संघर्ष देखती है और अपने पति के अंदर थोड़ा-थोड़ा अंगोर डालती रहती है कि अन्याय के खिलाफ हम क्यों मुंह बांधे खड़े रहते हैं। महाजनी गुलामी के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपने प्राण देने वाले सोबरन मांझी की पत्नी सोनामणि कैसे इस पूरे संघर्ष के आगे का रास्ता तैयार करती है। इन सारी घटनाओं के ताने-बाने के बीच एक सबसे बड़ा क्षेत्र जो रेड जोन के रूप में घोषित है, उसके पीछे की वास्तविकता उपन्यास " रेड जोन " कहता है। एक ' लड़ाई ' जो जिस मकसद से शुरू हुई और कई कारणों से जिसमें भटकाव आया, वह भटकाव अब कौन सा रास्ता अख्तियार करेगा? यह सवाल भी खड़ा करता है उपन्यास।
उपन्यास " रेड जोन " इस कथित सभ्य समाज की सोच कि बेहतर कल की चिंता और कामना से ही समाज के आगे बढ़ने और मानव जाति के विकास की बात पर बहस खड़ा करता है। बेहतर कल की कामना से जिस मानव जाति के विकास की बात की दलीलें कथित सभ्य समाज देता रहा है। । उपन्यासकार सवाल उठाते हैं कि वहां किस मानव जाति का विकास हो रहा है? इसी सोच से महाजनी सभ्यता का उदय हुआ है। आदिवासी समाज सरप्लस उत्पादन नहीं करता इसलिए वह विकास के एक मोड़ पर आकर रूक गया है ऐसा मानने वालों को उपन्यासकार यह भी याद दिलाते हैं कि सरप्लस उत्पादन के बाद से ही मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण शुरू हुआ। एक मनुष्य द्वारा दूसरे के श्रम के शोषण की शुरूआत हुई।
वे बहस करते हैं कि सरप्लस उत्पादन को सभ्यता-संस्कृती के विकास और श्रम विभाजन को विकास का पैमाना मानने वालों ने किसी काम को श्रेष्ठ और निम्न के दर्जे में किस तरह विभाजित किया। इसके साथ एक अंहकार को भी किसी भेड़िए की तरह पाला-पोसा। और यह तय कर दिया कि वह किसी को भी नोंच खाने का हक रखता है। शारीरिक श्रम को दोयम दर्जे का माना और प्रतिष्ठा को उन लोगों की गोद में बिठा दिया जो काम कम करते हों। समाज में किसी के कम शारीरिक श्रम को बडप्पन का पैमाना स्थापित करने में लगे हैं।
उपन्यास " रेड जोन " माओवाद के उदय और धीरे-धीरे उसके बदलते स्वरूप को स्पष्ट करता है। इसके पीछे के राजनीतिक कारणों, समाजिक कारणों को उजागर करता है। छोटानागपुर की राजनीतिक जमीन के उपर और अंदर होने वाले उथल-पुथल को बेहतरीन तरीके से सामने रखता है। यह उपन्यास नई पीढ़ियों में राजनीतिक चेतना लाने का काम करता है। इस उपन्यास को पढ़ने के बाद झारखंड बनने के पूर्व और झारखंड बनने के बाद के राजनीतिक षडयंत्र और संघर्षो का सारा कच्चा-चिट्ठा खुलता है। एक पत्रकार जो अपने काम को मिशन की तरह लेता है, वह किन परिस्थितियों से दफ्तर के अंदर और बाहर अपने अधिकारियों से, फिर अपने आप से जूझता है, उलझता है। पत्रकारिता की नब्ज टटोलते हुए " रेड जोन " उसकी नसों पर सीधे कलम की निभ गड़ा देता है।
एक गांव की साधारण सी लड़की जिसका एक सीधा-साधा सपना जो बहुत बड़ा भी नहीं होता। शाम को घर से सटे पिंडा में बैठ भुना मकई चबाने वाली गांव की लड़कियों के सपने उसी मुट्टी -भर दानों की तरह है। लेकिन कौन उन्हें मजबूर करता है दरोगा की जेब से पिस्तौल निकाल लेने को? समाज की वह कौन सी गंदी व्यवस्था है जो शाम होते ही किसी भी गांव की ओर लडखड़ाते हुए बढ़ती है? अपनी हवस मिटाने। कितना हवस भरा हुआ है इस समाज में? दुर्गा की हंसिया समाज के इसी हवस का गला रेतती है। माओवाद के नाम पर आज जितने विवाह मंडप बनाए जा रहे हैं झारखंड में, उस मंडप में कितने गांवों की सीधी-साधी दुर्गाओं को जबरन घसीटा जा रहा है इसका हिसाब कौन देगा? रेड जोन के अंदर एक ' लड़ाई ' कब और कैसे ' लेवी ' में बदल जाती है? वे कौन हैं जो आज तक हर लड़ाई को लेवी में बदल देने की कोशिश में लगे हैं? इन सवालों के गले पर चाकू रखने वाले पत्रकार कहां हैं? अपनी दो जून की रोटी के लिए काॅरपोरेट हाउस के इशारे पर शहर में आग लगाने और उस पर रोटी पकाने वाली पत्रकारिता को छोड़कर जिस पत्रकार ने बाहर निकल आने की हिम्मत जुटाई, उसी हिम्मत का परिणाम है " रेड जोन।"
" रेड जोन " माओवाद के नाम पर हिंसात्मक घटनाओं के शुरू से ही खिलाफ दिखता है। अंत तक एक आवाज गूंजती है " यह रास्ता जनता के शासन की ओर नहीं मुट्ठी भर हथियारबंद लोगों की तानाशाही की ओर ले जाता है। "
माओवादी ग्रुपों के साथ कई साल भटकती गांव की दुर्गा पार्टी के अंदर ही अंततः सवाल उठाती है कि उनके गांव-घरों में तो सभी साथ लड़ते-मरते हैं, सभी साथ निर्णय लेते हैं। फिर पार्टी के अंदर लड़े-मरे कोई और निर्णय सुनाए कोई और ऐसा क्यों? ओदश का पालन करने वाले पुतलों के हाथों बंदूक थमाकर उन्हें मंत्र दे दिया कि वे क्रांति कर रहे हैं। अचानक वर्षो पहले किसी की कही बात उसके दिमाग में गूंज उठती है। " सिद्धो-कान्हू, बिरसा मुंडा ने अपने दुश्मनों से लड़ने के लिए हथियारबंद सेना नहीं बनायी थी। वे समाज के साथ मिल-जुलकर लड़े थे। उनके गांव का हर आदमी, औरत-मर्द, बच्चे-वृद्ध, सभी उस सेना के सिपाही थे। यह रास्ता जनता के शासन की ओर नहीं मुट्ठी भर हथियारबंद लोगों की तानाशाही की ओर ले जाता है। "
आखिरकार दुर्गा जंगलों से लौटती हुई अपने गांव की ओर उसी स्थान पर पहुंचती है जहां से उसने रेड जोन की यात्रा शुरू की थी। यह माओवाद के बाहर और भीतर के संघर्षो का दिखाता है। एक भटकाव को फिर पुराने रास्तों पर लौटते देखते हैं लेकिन फिर नए सवाल खड़े होते हैं कि क्या पुराने रास्ते इतने दुरूस्त हो गए हैं कि रेड जोन की ओर गए लोग वापस आ सके?
उपन्यास " रेड जोन " पूर्व की घटनाओं को नई पीढ़ी के सामने रखते हुए उन्हें आगाह करने का काम भी करता है । आने वाली पीढ़ी उन गलतियों से समय रहते बच सके, जिनको उनके संघर्षकर्ताओं ने दोहराया। नई पीढ़ी के लिए यह उपन्यास नई रणनीति गढ़ने के लिए अनायास ही मार्गदर्शक का काम करता है। यह झारखंड के आंदोलनों व संघर्षो का हस्र दिखाता है।
वह बूढ़ा शेर जिसकी उनींदी आंखें अब सामने वाले को चमत्कृत नहीं करती। जिसने छोटानागपुर की जमीन पर महाजनी प्रथा के खिलाफ लड़ते हुए एक ऐतिहासिक जीवन जिया। आज भी गांव के बूढ़े-बुजुर्ग उन दिनों को नहीं भूलते। जिनके संघर्ष से महाजनी गुलामी से छूड़ाई जमीन पर पीढ़ियां खेती कर रही हैं। उसकी कहानी सिर्फ कहानी नहीं हो सकती। वह तपे हथौड़े की आवाज है जिसकी आवाज शताब्दियों के पहाड़ों से टकराकर वापस आती रहेगी। वह आग है जिसे हर हाथ को तुफान के बीच बचाकर आने वाले कल के हाथों सरका देना है। वह आंखों की ऐसी नमी है जिसका फिर से कोई सारंडा उगाने के लिए बचा रहना जरूरी है। जंगल में किसी जानवर की उठती आवाज है जो खतरों से पहले ही आगाह कर देता है। उन सारी बातों को उपन्यास बखूबी अपने अंदर जज्ब कर सका है। किसी बूढ़े शेर के पहाड़ी पर चढ़कर दहाड़ने और फिर किसी लंबी उदासी की थकान से अपनी मांद में चले जाने, फिर न निकलने के लिए। उस दहाड़ के कंक्रीट के जंगल में कहीं गुम हो जाने की कहानी कहता है रेड जोन।
झारखंड की जमीन पर इतने संघर्षो का परिणाम क्या है? अंततः उपन्यास सवाल पूछता है आने वाले कल से। वह सवाल पूछता है नई पीढ़ियों से। वह सवाल पूछता है रेड जोन की गलियों में भागती परछाईयों से। वह सवाल पूछता है हर एक शक्स से जो अपने पूर्वजों के संघर्षो की जमीन पर आज चैन की नींद सो रहा है और गर्म-सोंधी रोटी खा रहा है। वह पूछता है हर उस आवाज से जो बस देखती है पर अपनी जुबान नहीं खोलती । पूछता है उन हाथों से जहां हंसिया गायब हो गया है, झंडा ढोने का काम कर रहा। हर उस दिन से जो सूरज के उठते ही घर से निकलता है और हर शाम घर के पिछवाड़े उल्टे डुभनी-ग्लास के बगल में औंधे मूंह पड़ा रहता है। हर तारीख से जो बार-बार फिर से उठने की कोशिश में लड़खड़ा रहा है। हर उस रात से जो कहीं कोई मशाल न जलने के कारण नींद में उंघती है। वह पूछता है एक ही सवाल।
" क्यों आज भेड़ियों के नाखुन और तेज हो रहे हैं? क्यों आज सियारों की आंखें चमक रही है? क्यों आज लकड़बग्घे हंस रहे हैं?"

उपन्यास - रेड जोन
उपन्यासकार - विनोद कुमार
मूल्य - 695
प्रकाशन - अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली।



- जसिन्ता केरकेट्टा

एक आदिवासी मैराथन धावक का संघर्ष





" दौड़ " जिसके लिए एक जुनून है। जिसने इस " जुनून " के लिए कभी किसी की परवाह न की। एक जमाने में वो मैराथन रेस दौड़ते थे और पहली बार उन्होंने मैराथन रेस महाराणा प्रताप सिंह के गढ़ आरा में 21 दिसंबर 1974 को दौड़ा था। जिसमें पटना, गया, आरा, रोहतास के धावकों ने हिस्सा लिया था। 1974 में पहली बार एक आदिवासी युवक ने मैराथन में प्रथम स्थान हासिल कर सबको चैकाया था।
1973 में जमशेदपुर के टेल्को ग्राउंड में गोलमोरी बिशप्स हाउस में दरबानी करने वाले महज 20 साल के उस आदिवासी लड़के की दौड़ की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी थी। टाटा एसपी उस पांच फीट एक इंच के लड़के की लंबाई दो इंच और बढ़ा कर पुलिस विभाग में लेना चाहते थे। उस लड़के ने पुलिस की नौकरी करने से इंकार कर दिया। उस आदिवासी लड़के की चर्चा जमशेदपुर से लेकर रोहतासगढ़ तक होने लगी थी। तब रोहतास के तत्कालीन पुलिस अधिक्षक बलजीत सिंह ने पुलिस की नौकरी स्वीकार करने के लिए उनके पास सिपाही की वर्दी भेजवाई। तब भी वह पुलिस की नौकरी करना नहीं चाहता था लेकिन गोलमोरी में उन दिनों फादर सी.आर प्रभु, अमेरिकन फादर जोसफ करी, फादर राॅबर्ट करी के प्रोत्साहन से उसने पुलिस की नौकरी अंततः स्वीकार कर ली लेकिन पुलिस में रहकर भी वे एक खिलाड़ी ही रहे।
पुलिस विभाग में रहते हुए उन्होंने हर उस क्षेत्र को ठुकरा दिया जहां बहुत अधिक उपरी आय की संभावनाएं थी। उपरी आय वाले क्षेत्रों में रहकर भी उन्होंने कभी थाना में बैठना स्वीकार नहीं किया। पूरी जिंदगी उन्होंने एक पैसा कभी किसी गरीब से नहीं लिया। शायद यही वजह थी, प्रोमोशन मिलने के बावजूद भी उनकी हालत वही रही जो एक ईमानदार अधिकारी की होती है। विभाग के अंदर भी चलती राजनीति और उनके साथ हाते षडयंत्र से तंग आकर सब इंस्पेक्टर पद से त्यागपत्र देकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी। ताउम्र एक पैसा किसी से न लेने वाले उस आदिवासी पुलिस अधिकारी ने अपना ही पेंशन निकालने के लिए पैसे की मांग किए जाने पर इस बात का भी विरोध किया। फलस्वरूप चार साल से उनका पेंशन भी अटका पड़ा है।
युवावस्था में मैराथन रेस दौड़ने के बाद अब वृद्धाव्स्था में भी उन्होंने अपनी दौड़ बरकरार रखी है। बैंगलूरू में आयोजित नेशनल मास्टर एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2012 में उन्होंने 70 प्लस के वर्ग से पांच किलोमीटर की रेस में द्वितीय, 1500 मीटर की रेस में तृतीय और 2013 में इसी चैंपियनशिप में 10 किलोमीटर की रेस में तृतीय स्थान प्राप्त किया है। बैंगलूरू में नेशनल मास्टर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में द्वितीय स्थान प्राप्त करने के बाद उनका चुनाव एशियाड मास्टर चैंपियनशिप के लिए भी हुआ, जिसके लिए उन्हें ताईवान (चीन) जाना था। इसके लिए उन्होंने खेल विभाग से सहयोग भी मांगा था लेकिन किसी ने उन्हें सहयोग नहीं दिया।
2014 में गोवा में आयोजित नेशनल मास्टर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने अपने वर्ग में गोल्ड मेडल हासिल किया। उनके नक्शे कदम पर चलने वाले दो बेटों ने जिला, राज्य, राष्ट्रीय स्तर पर मेडल तो खूब बटोरे, नाम तो खूब कमाया लेकिन रोजगार नहीं पा सके। घर की हालत उस दिन की तरह ही रही जिस दिन उन्होंने गांव से पोटली पकड़ शहर का रूख किया था। आर्थिक तंगी की मार और बेरोजगारी से टूटते बेटे धीरे-धीरे शराब की चपेट में आने लगे थे। फिर इस नशे ने जैसे पूरे परिवार को तितर-बितर कर दिया। टूटते, बिखरते परिवार को किसी ने जिंदा रखा तो सिर्फ उनकी पत्नी पुष्पा अनिमा ने। पत्नी पुष्पा घर की तंगी दूर करने के लिए यहां-वहां काम करने लगी, गांव वापस लौटकर खेती-बारी संभाल लिया। इस बीच तीन बेटियां पिता, भाई के इन नामों के बीच हमेशा गुमनाम और उपेक्षित रहीं। पुष्पा ने इतना जरूर किया कि जमीन बंधक रख बच्चियों को पढ़ा दिया। लेकिन मां के कांधे से कुछ जिम्मेवारियां निकलकर 7-8 साल की कच्ची उम्र की बड़ी बेटी के कांधे पर भी अनायास ही आ पड़ा था। जिसने कभी अपना बचपना बच्चे की तरह नहीं जिया । गांव से दूर बहनों की जिम्मेदारी मां बनकर उठाती रहीं और गांव में मां भाईयों की जिम्मेदारी। शायद इसलिए रिश्तों में दरार पड़े और परिवारिक ताना-बाना बिखर गया। जिसने इन सारी परिस्थितियों के बीच खुद को संभाल लिया वो बाहर निकल आए और आज भी छूटे हुए बाकी टूट गए सदस्यों को बाहर निकालने की जद्ोजह्द में लगे हैं।
इन सबसे परे कोई विश्व मास्टर एथलीट बनने का वहीं बचपन का जुनून लिए आज भी 72 साल की उम्र में मनोहरपुर की सड़कों पर दौड़ रहा है। उनकी ईमानदारी, संघर्ष, मेहनत और जीवटपन को सलाम।
http://www.bhaskar.com/…/JHA-JAMS-athlete-jayprakash-run-20…

(वो आदिवासी मैराथन धावक ............ कोई और नहीं मेरे पिता जयप्रकाश केरकेट्टा हैं। मां पुष्पा अनिमा जो मेरी कविताओं और लेखन की हमेशा से प्रेरणा रही है। )

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 14.8.2015

Wednesday, 12 August 2015

स्त्री देह ही निशाने पर क्यों ?





                                                      स्त्री देह ही निशाने पर क्यों ?
                                                        ...................................
                            http://www.imdb.com/title/tt3786270/combined
अमेरिका में रह रही डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर अनामिका बंधोपाध्याय इन दिनों सेक्स टैबू पर आधारित अपनी नई फिल्म " द थर्ड ब्रेस्ट " के निर्माण को लेकर काफी व्यस्त हैं। Chhayabajee Motion Pickchars के बैनर तले बन रहीं उनकी फिल्म की विषयवस्तु पर काफी चर्चा हो रही है। अनामिका ने इससे पहले लालगढ़ व सिंगूर की घटनाओं पर भी फिल्में बनायी हैं। इनके कारण वे न सिर्फ गिरफ्तार हुई, बल्कि परिस्थितियों ने ऐसा मजबूर किया कि कोलकाता यूनिवर्सिटी की अपने लेक्चरर की नौकरी से हाथ भी धोना पड़ा है।
लीक से हटकर ज्वलंत मुद्दों पर बनी उनकी फिल्मों की देश - विदेश में अपनी एक अलग पहचान है। अनामिका ने अपने काम से लोगों का विश्वास जीता है। उनकी नई डाॅक्यूमेंट्री फिल्म " द थर्ड ब्रेस्ट " के नाम का चयन उन्होंने दक्षिण भारत की एक पुरानी कहानी से लिया है।
महिलाओं पर हिंसा के लिए उनके शरीर को लक्ष्य बनाया जाता है। चाहे वह दुष्कर्म हो या चाहे घरेलू हिंसा। इस संबंध में जब अनामिका ने एक मंत्री से इसके पीछे की मानसिकता, यौन शिक्षा के माध्यम से बीमार मानसिकता को स्वस्थ बनाने, एक समझ पैदा करने की पहल की बाबत पूछी, तो उन्हें पता चला कि यहां कोई इसपर बात नहीं करना चाहता। उनका कहना था कि इस तरह की बातें तो " अनइंडियन" है!!

फिल्म यह सवाल उठाती है कि यदि इस तरह की बातें " अनइंडियन " है, तो अजन्ता, एलोरा की नक्काशियां, राधा-कृष्ण की पूजा, अर्धनारिश्वर व शिवलिंग की पूजा के पीछे कौन सी सोच है? आखिर, महिलाओं को हिंसा व दुष्कर्म का शिकार बनाने वाले लोग कौन हैं और कहां के हैं?
इसी देश में ंरहने वाले आदिवासी समाज की सोच इतर क्यों है? आदिवासी समाज में आज भी स्त्री -पुरूष का संबंध सहज -सरल है। उनकी मान्यताएं, परंपराएं, संस्कृति, उनका धूमकुडि़या और अखड़ा मुख्यधारा के समाज को आज भी कई नई बातें सिखाने में सक्षम है। जबकि, खुद को मुख्यधारा बताने वाला समाज उनके शिक्षण केंद्र घोटुल और धुमकुडि़या को यौन क्रिया का अड्डा बताने से गुरेज नहीं करता। अखड़ा में स्त्री-पुरूषों के एक साथ एक-दूसरे की कमर में हाथ डाले नृत्य करता देख निगाहें चुराता है।

लेकिन आदिवासी समाज में भी धीरे धीरे स्थितियां बदलने लगी हैं। मुख्यधारा के प्रभाव में आते आदिवासी समाज की महिलाएं अब अकेली जंगल जाने से डरने लगी हैं। बाजार भी अकेली नहीं जाना चाहतीं। अब उन्हें लगता है कि साड़ी का पल्लू खिसक जाने से दिख रहे उसके मांस पर भूखे भेडि़ए की निगाहें अटकती हंै।
अनामिका यह कहने का प्रयास कर रही है कि पुरूषों का वर्चस्व कायम रखने के क्रम में बदला लेने, अपमानित करने, तोड़ने, नीचा दिखाने, जलील करने और महिलाओं के उठते सिर को कुचलने के लिए स्त्री देह ही निशाने पर क्यों? दुष्कर्म का खंजर हर दिन किसी न किसी गली - कुचे में स्त्री देह को लहूलुहान करता हुआ रूह तक को चीरता हुआ निकल जाता है और पुरूष वर्चस्व को बरकरार रखने को बेताब लोग इस विषय पर बात करने से कतराते हुए इस विषय को ही सिरे से खारीज करते हैं। इसे " अनइंडियन " बताते हैं।
इस दिशा में लोगों को मंथन करना चाहिए और ऐसी बीमार मानसिकता को स्वस्थ बनाने की दिशा में नई सोच, नई पहल की जरूरत है। इस फिल्म का प्रदर्शन भारत समेत विश्व के कई देशों में होगा। इस डाॅक्यूमेंट्री में मेरी चंद कविताएं भी गूंजेगी। इसके लिए मैं शुक्रगुजार हूं। अनामिका को मेरी ढेरों शुभकामनाए।

(अनामिका बंधोपाध्याय की फिल्म द थर्ड ब्रेस्ट 15 जनवरी 2015 को यूएस में प्रदर्शित की गई। प्रोडक्शन, रिसर्च में सहयोग के लिए उन्होंने अपनी फिल्म की टीम में मेरा नाम शामिल किया है। मैं उनकी शुक्रगुजार हूं।)

प्रतिरोध का "एक बैजनी रंग"



प्रतिरोध का "एक बैजनी रंग"
........................................
वो ठिठकी
उसके ठिठकने से
एकपल को सन्नाटा भी ठिठका
जाने क्यों लगा
दबे पांव कोई चल रहा है संग
पलटकर देखा
उसके वजूद से निकलकर
साए की तरह चल रहा था
"एक बैजनी रंग"

उपन्यास गायब होता देश कई रंगों में रंगा नजर आता है, लाल रंग के खून के छींटे हों या रियल स्टेट के पीछे का कोई काला रंग लेकिन इन सबसे परे कोई रंग यदि पाठकों को बांधता है तो वह है बैजनी रंग। जब-जब बैजनी रंग का जिक्र आता है ऐसा लगता है, कहने को तो रंगों का भेद मिट रहा है, लेकिन रंगभेद की दुनिया आज भी जीवित है सांस लेती हुई, कई रूपों में । और यह अपनी पूरी ताकत हर रंग को गौरवर्ण में परिवर्तित कर देने के लिए झोंक रहीं है । ऐसे में कोई रंग जैसे पूरे परिवेश को अपने रंग में रंगने लगता है तो वह है बैजनी रंग। आदिवासियों का रंग सांवला है और जो समाज गौरवर्ण को सबसे श्रेष्ठ समझता है वही समाज अपने देवी देवताओं में से अधिकांश ऐसे देवताओं की शक्ति को श्रेष्ठ मानता है जो सचमुच बैजनी रंग से रंगे हुए हैं। चाहे वे कृष्ण हांे या शिव।
गायब होता देश में उसी बैजनी रंग से रंगी है अनुजा पाहन भी। उपन्यास में आदिवासी स्त्रियों की पीड़ा, चाहे वह महानगर जाकर अपने सपनों के टूटने का दर्द हो या लौटकर अपने गांव-घर वापस आकर चुप्पी की चादर ओढ़कर टूटे सपनों को फिर से जोड़ने की जद्दोजहद हो, बड़ी बारीकी से उनके मनोभावों को अभिव्यक्त किया है उपन्यासकार ने। इतना ही नहीं इसके पात्र किषन विद्रोही के उपर यह बैजनी रंग किस तरह रह-रहकर हावी होता है और उसके पूरे मनोभाव को जिस तरह चित्रित किया गया है वह भी एक वास्तविकता ही है। बैजनी रंग के जादू से कौन बच सका है लेकिन यह बैजनी रंग का उसका अपना जादू भी आदिवासी बालाओं को बचा पाने में असमर्थ है। बैजनी रंग के ये पहलु भी स्पष्ट नजर आते हैं।

सिर्फ आदिवासी स्त्रियों की ही नहीं उपान्यासकार उस वर्ग की स्त्रियों के अंदर उठते प्रतिरोध को भी प्रस्तुत करते हैं जहां पुरूषो ने अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए हर कायदे अपने ही हित के हिसाब से गढ़े हैं। जब किशन विद्रोही की पत्नी कमला यह कहती हैं - "वह प्रेमी था या रूपलोभी, यहां-वहां भटकता रहता। कभी इसके मन-देह के द्वार पर तो कभी उसके। मेरे अंदर आग सी सुलगती रहती। इस एकनिस्ठा की चाह केवल स्त्रियों से ही क्यों? उससे ही एक ठौर स्थिर रहने की कामना क्यों? और पुरूस समूहभोग के लिए आजाद। एक चतुर शिकार जो शिकाररगाह में अपने पैने हथियारों के साथ हमेशा शिकार के लिए चैकस-चैकन्ना। मेरे अंदर हमेश कुछ खदबदाता रहता। कुछ खौलता सा।"
उपन्यासकार इन शब्दों में सिर्फ कमला की मनोदशा को ही नहीं पूरी स्त्री समाज द्वारा पुरूष सत्ता से पूछते सवालों को उठाते हैं। समाज के लिए आंदोलनों में हिस्सा लेती स्त्रियां उन चिन्हों को भी सिरे से नकार रहीं जो जबरन उनके सौभाग्य के प्रतीक बना दिए गए हैं। इन चंद पंतियों में -" गुलामी के जिन-जिन चिन्हों को सौभाग्य का प्रतीक बता थोपने की कोषिष, हजार-हजार सालों में की गई थी, उसे आंदोलन की साथिनों ने एक झटके में बिलगा दिया था। न सिंदूर, न मंगलसूत्र, न चूड़ी-कंगन, न पायल-बिछिया, न नथनी-नकबेसर। कथित सौभाग्य और सजावट की कोई भी निषानी नहीं।" इन शब्दों में वे हजार-हजार सालों से अपनी गुलामी के प्रतिरूपों को नई परिभाषाएं देकर ढोने को मजबूर हैं, उन प्रतिरूपों पर वार करते हुए स्त्री स्वतंत्रता को मजबूती से रखते हैं। जब कि पुरूष सत्ता ने अपने को इन प्रमाणों से दूर रखा है ताकि समूहभोग के लिए आजाद रहे। जिसका विरोध कहीं न कहीं आज हर स्त्री कर रही है।

इन सबके परे कमला किशन विद्रोही को गहराई से समझने का प्रयत्न करती है। मां के प्रेम से महरूम एक इंसान अपनी मौसी के लाड-प्यार में जिन परिस्थितियो में बढ़ता है। वह ताउम्र हर स्त्री में उसी प्रेम की तलाश में भटकता है और स्वयं को एक बच्चा समझकर प्रेम पाना अपना अधिकार समझता है , प्रेम देने की परवाह किए बगैर। और मुझे अनायास ही कमला की जगह मेरी मां की तस्वीर आंखों में उभर आती है। एक स्त्री की देह और आत्मा देानों पर हिंसा की पराकाष्ठा और बदले में स्त्री के प्रेम की पराकास्ठा मैंने देख षायद कच्ची उम्र में देख ली थी।
अपनी कविता की चंद पंतियां याद आ रही है जब मां को बाजार जाने से पहले अपने माथे के जख्म को सिंदुर से ढकते हुए देखा था मैंने एक दिन।

"ओ सांवरी
तुम्हारे माथे पर यह जख्म कैसा
कोई गाढ़ा लाल सा
जैसे जम गया हो रक्त
माथे पर तुम्हारे न जाने
कई सदियों से पुराने घाव सा
और तुम उसपर डाले फिरती हो
डहडहाता लाल रंग का सिंदूर
जिससे छुपा सको जख्म अपने
और खुष हो जमाने को देकर
अपने सुहागन होने का प्रमाण।। "

उपन्यासकार रणेंद्र चाहते तो किशन विद्रोही जो प्रमुख पात्र है, अनुजा पाहन के प्रति उठते उनके मनोभावों को छुपा लेते और उसका एक आर्दश रूप प्रस्तुत कर सकते थे लेकिन वे उस सच्चाई को सामने उजागर करते हैं जो आज भी अनुजा पाहन की तरह बैजनी रंग से रंगी कई स्त्रियों के इर्द-गिर्द मंडराता हुआ सच है। मुख्य पात्र के अंदर चलती दोहरी मनोदशा को भी वे बड़ी ईमानदारी से रख देते हैं। किशन विद्रोही की मनोदशा आज भी बाह्य जगत में बैजनी रंग के प्रति कईयों के अंदर उठते मनोभावों को प्रदर्शित करता है। अनुजा के कांधे से ढलके आंचल को देखकर देह की परिभाषा कोई आदिवासी पुरूष शायद नहीं गढ़ पाता हां किशन विद्रोही के रूप में उन्होंने उस पूरे समाज के मनोभाव को खड़ा कर दिया है जो सर पर आंचल ढंकने के कट्टर हिमायती हुआ करते हैं। लेकिन आंचल सरकते ही देह के एक टुकड़े पर कई परिभाषाएं गढ़ते दिखते हैं। किसी ने यह भी खूब कहा है जिस देश में स्त्री के पैर देखकर प्रेम हो जाता है वहां पूरी स्त्री दिख जाए तो फिर क्या होगा। और इसके विभत्स रूप समाज में हर दिन दिख रहे हैं। इन सबके बाद भी वे बैजनी रंगों वाली उस स्त्री को अंत तक अपने निर्णय पर अडिग दिखाते हैं और अचानक वह बैजनी रंगों वाली स्त्री पूरी आदिवासी नई पीढ़ी की प्रेरणा बनकर खड़ी नजर आती है।
उपन्यास पाठकों को किशन विद्रोही की रहस्यमय मौत से बांधने की कोशिश प्रारंभ से ही करता नजर आता है लेकिन पाठक इस कोशिश से परे तब खुद ब खुद बंधने लगता हैं जब वे लेमुरिया की दुनिया में कदम रखता है और सचमुच मेगालिथ की शक्तियों को कहीं अपने अंदर प्रस्फुटित होता हुआ महसूस करता है। उपन्यासकार जमीन के आंदोलनों में सोनामुनी का संघर्ष, पत्रकारिता की दुनिया में अनुजा पाहन का जुझारू तेवर, जद्दोजहद व मेहनत, आदिवासी स्त्रियों की शक्ति, पुरूषो के साथ कदम से कदम मिलाकर अपने अस्तित्व के लिए लड़ने की इच्छा व क्षमता को प्रदर्शित करते हुए पूरे आदिवासी समाज की स्त्रियों की ताकत को ही रेखांकित करते हैं।
इसके साथ ही पात्र सोमेश्वर बाबा की जीवन कहानी और मेगालिथ के उर्जा -पुंज से जुड़े उनके तजुर्बे से पाठक वर्ग भी वाकिफ होता है। जो उन्हें अपनी जड़ों से और गहरे जोड़ता है। सोमेश्वर बाबा के अनुभव ससनदीरी को लेकर न सिर्फ नई आदिवासी पीढ़ी को को अपनी परंपराओं के पीछे छिपे पूर्वजों के विचारों से वाकिफ करवाता है बल्कि मुख्यधारा के सामने भी आदिवासियों के रीति रिवाज, परंपराओं के पीछे छिपे वैज्ञानिक सोच व उसके महत्व को दर्शाता है।
आज आदिवासी समाज के समक्ष सबसे बड़ा संकट आर्थिक संकट है। आर्थिक संकट से उबारने के प्रयत्नों के बिना इस समाज को मजबूत बनाए रखना मुश्किल है। आजीविका के तरीके जैसे-जैसे बदल रहे हैं आदिवासी अपनी संस्कृति, अपने समाज से कट रहा है। हमें कटता हुआ वह समाज दिख रहा है लेकिन आजीविका की उनकी अपनी संस्कृति को कैसे बचा सके, इसपर कोई बहस नहीं हो रही। उसके जीने की अपनी संस्कृति को बचाए बिना आदिवासियों के देस को गायब होने से नहीं बचाया जा सकता। उनका अस्तित्व जल-जंगल-जमीन से जुड़ा है और गायब होता देश इसी संकट की ओर इशारा करता है। यह न सिर्फ उनकी आजीविका के संसाधनों को बचाए रखने बल्कि उनकी आजीविका की एक पूरी आदिवासी संस्कृति को कैसे बचाया और बनाया रखा जा सके, इस पर गंभीरता से चिंतन करने के लिए एक बहस के नए दरवाजे खोलता है।
इतना ही नहीं मीडिया पर भी उपन्यासकार की कलम वार करती है। आंदोलनों से निकला एक विद्रोही और पत्रकार पर काॅरपोरेट कैसे हावी हो जाता है। दबाव बढ़ता ही जाता है लेकिन मन तो विद्रोही ही होता है अंत तक। दिन-भर की थकान के बाद घर लौटकर वह अपने अंदर ही कहीं अपना एक कोना तलाशने की कोष करता है और इसी तलाश में रात कट जाती है और वह छटपटाता रहता है। तब अनायास ही वह अपने कमरे के कैनवास पर बैजनी रंग रंगने लगता है। बाहरी दबाव और अंदर की छटपटाहट बढ़ती जाती है और ऐसे में नशा साथी बनने लगता है और फिर एक दिन दुनिया से कैसे , किसके द्वारा और कब कूच कर जाता है। किसी को पता नहीं चलता। यह तब पता चलता है जब उनके कमरे की दिवार पर टंगी कोई पेंटिग नजर आ जाती है। " पीछे दीवार पर सेमल के छतनार गाछ की पेंटिग टंगी हुई। टहटह सुर्ख फूलों से लहू टपकता हुआ। चेहरे पर भयानक दर्द की लकीरें, छाती पर एक तीर धंसा हुआ, लहू बहता हुआ, सामने बहेलिए के वेष में हूबहू विद्रोही सर जैसा ही एक शक्स। " शायद इन पंतियों से उनके जाने के बाद उनकी मनःस्थिति का पता चलता है पाठकों को। इसके साथ ही विजन के साथ अपनी कलम को तलवार बनाकर लड़ने वाले पत्रकारों की बदलती परिस्थितियेां में बदलता मनोभाव व मनःस्थिति समझने के लिए ये चंद पंतियां काफी हैं।
उपन्यास सदियों से हो रहे आदिवासियों के संघर्ष के कारणों की ओर भी सबका ध्यान आकर्षित करता है। कोई क्यों हथियार उठा लेता है? इस सवाल के जवाब में इसके कारणों का समाधान की जगह हर किसी को दिखता है उनके हाथों का हथियार। और इसी के साथ मेरी कविता " मेरे हाथों का हथियार की अंतिम चंद पंतियां मैं दोहरना चाहूंगी।"

"मैं लड़ रहा हूं उन सारे दर्दो के साथ
जो मेरे सीने में कहीं गहरे गड़े हंै
लड़ रहा हूं सदियों से
लोगों को ये बस लड़ाई लगती है
नहीं दिखता
मेरा सदियों पुराना दर्द
नहीं दिखता
मेरा सदियों पुराना जख्म
नहीं दिखता
सदियों से दूसरों द्वारा
लूटते.खसोटते वक्त
मेरी देह पर गढ़ गए
जहरीले नाखूनों के दाग
उन्हें दिखता है
सिर्फ मेरी जमीन, जंगल
और मेरे हाथों का हथियार ..........।।


मंच पर वरिष्ठ पत्रकार डा. रामशरण जोशी, डा. आनंद तेलतुम्बडे, डा. अजय वर्मा, पंकज मित्र, तिलक बारी, उपस्थित थे। कार्यक्रम में दयामनी बारला, महादेव टोप्पो, डा. रविभूषण, डा. प्रणय कृष्ण, डा. केदार प्रसाद मिणा, डा. हितेंद्र, डा. मनमोहन पाठक, डा. खगेंद्र ठाकुर सहित कई लोग उपस्थित थे।
@ जसिन्ता केरकेट्टा