Sunday, 16 November 2014

साजिशों की सिक्स लेन




साजिशों की सिक्स लेन
.................................

सारंडा के जंगलों से निकलकर लोग
जमा हो रहे हैं किसी गांव में...

महिलाएं चली आ रही बच्चों को बेतराकर
बूढ़े लाठियों से नापते आ रहे घाटी
जवान फलांगते पहुंच रहे पहाड़ों को
और
बच्चे गिनते आ रहे सखुआ के पेड़
यह सभा किसी उलगुलान के लिए नहीं
यह जुटान है
देखने फुटबाॅल का खस्सी टुर्नामेंट,
गांव में बच्चा जैसे ही छोड़ता है
मां का दूध पीना
वो बना दिया जाता है सारंडा के
किसी युवा-क्लब का हिस्सा
इन क्लबों के पीछे है एक अलग ही किस्सा
अपनी जमीन पर अवैध खनन के खिलाफ
उठ सकने वाली हर आवाज के हाथों में
थमा दिया जाता है किताब की जगह फुटबाॅल
और इन खस्सी टूर्नामेंटों में
उनकी सारी पढ़ाई हो जाती है गोल,

रफ्ता-रफ्ता सूंघता रहता है वह
फूटबाल की अफीम
और उसकी पथराती आंखें नहीं देख पाती
इस खेल के हार-जीत के आगे
अपने अस्तित्व का संघर्ष
मैदान में पूरी तरह निचुड़ चुकी उसकी उर्जा
अंत में देखती है अपनी देह में
जोंक की तरह चिपकी भूख को
कुलबुलाती हुई
तब उसके हाथों में
थमा दिया जाता है फावड़ा
और वह पेले, मराडोना, नेमार या मेसी
बनने के सपने लिए बन जाता है
अपनी ही मां को छलकर
उसका गर्भ खोदने वाला बेबस मजदूर,

बिना नागा किए हर माह गांव के हर दरवाजे पर
पहुंचते हैं खनन के पैरोकार
भूख, बीमारी, बेरोजगारी व लाचारी से
तड़पकर जैसे ही ग्रामीण आह भरते हैं
उनके मुंह में ठूंस देते हैं
अनाज, दवाईयां, बासन और कपड़े
और चंद पैसों में ही
खरीद लेते हैं मजदूरों का कुनबा,

विकास के नाम पर अब वहां
बनेंगी फोर से सिक्स लेन की सड़कें
और न जाने कितनी लेन साजिशों की
उन रास्तों पर मजदूरी करते लोग
नहीं जानते
सारंडा में साजिशों की और कितनी लेनें हैं ।।
...........................................................................

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 6.08.2014



( मैं किसी खेल के खिलाफ नहीं हूं लेकिन जिस तरह इसके पीछे रणनीति के तहत साजिशों का ताना बाना बुना जा रहा है, बस उसी सच को बयां कर रहीं है मेरी कविता। )

No comments:

Post a Comment