Sunday, 16 November 2014

हर स्त्री मांग रही जवाब


सूर्पनखा संग हर स्त्री मांग रही जवाब
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लंकेश रक्षेंद्र रावण की बहन और
दंडकारण्य की साम्राज्ञी सूर्पनखा आज...

मांग रही है अपने सवालों का जवाब
उत्तर दो राम !

ऋषि गौतम ने तो
अहिल्या को पाषाणी बनाकर
सिद्ध कर दिया स्त्रियां शूद्रों से भी नीचे हैं
और " पुरूषोत्तम " तुमने पैरों की ठोकर से
मुक्त कर पाषाण बनी अहिल्या को
पीढि़यों के लिए कर दिया स्थापित कि
स्त्रियों की जगह " पुरूषों के पैरों के नीचे है "
यही दायित्व अगर मिल जाता स्त्री को
क्या वो हाथों की जगह पैरों से कभी
खोल पाती अहिल्या के श्राप का बंधन?
आह! मगर तुम्हारे आदर्शो का शत-प्रतिशत
देखो, सदियों से जग कर रहा है पालन
खुश हो न.....................?,

वन में मुझे अकेली देखते ही तुम ठिठके थे
एक पल को, पीछे हटकर तुमने कहा मुझसे
"नारी अकेली वन में क्यों घूमती हो?"
और आज तक बिना किसी पुरूष सहारे के
स्त्रियों का अकेला चलना किसी को गवारा नहीं
दूसरे ही क्षण तुम चौके थे यह देखकर
मैं अकेली ही गहन अंधकार में तुम्हारे सम्मुख थी
तुमने कहा
"अवश्य ही तुम कोई राक्षसी या दानवी होगी"
और देखो तब से आज तक रात्रि में दिख जाने वाली
हर स्त्री को
तुम्हारी पीढि़यों ने कुचरित्र घोषित कर रखा है,
खुश हो न..................................?

अपना दोहरा चरित्र छुपाने को
कर दिया प्रचारित "मैं सीता को खाने दौड़ पड़ी थी"
उफ! सदियों से आज तक किसी ने नहीं पूछा
लंका में मेरे सम्मुख पड़ी सीता को
खाना तो दूर क्यों मैंने छुआ तक नहीं
क्यों यह नहीं बताते कि इससे पूर्व तुमने
अपने भाई लक्ष्मण के समक्ष मुझे परोसना चाहा?
और देखो तब से आज तक हर पुरूष
स्त्री को देख रहा एक भोग्या की भांति
धन के लिए, वंश के लिए हर तरह से
कर रहा स्त्री देहों का व्यापार
खुश हो न............................?,

"भगवान" कहलाने वाले राम
क्या तुम्हारा ह्दय भक्त के भाव मात्र देखता है?
या भाव के सिवा और भी कुछ?
फिर प्रेम से विकल किसी स्त्री का
भाव देखे बिना, उसका
राक्षसी, दानवी या मानवी होना
तुमने कैसे देख लिया?
कैसे तुमने कटवाकर मेरे नाक-कान
समस्त स्त्री जाति का उपहास उड़ाया
स्त्री शरीर की गरिमा को क्षत-विक्षत कर
दे दी पीढि़यों को एक अनकही आज्ञा कि
स्त्रियों को अपने नियंत्रण में रखने को
हर कोई फेंक सके स्त्री शरीर पर एसिड
ताकि होता रहे हर सदी में
कई सूर्पनखा के चेहरे विकृत,
खुश हो न...........................?

चुप क्यों हो, मेरे सवालों का जवाब दो
पुरूषों में आदर्श राम, मांग रही तुमसे
आज हर स्त्री इन सवालों का जवाब ।।
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जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक -17.08.2014

(मैं गहन अंधेरे वन में तलाश रही थी स्त्रियों की वर्तमान दशा की ऐतिहासिक जड़े और अचानक "वैश्रवणी" से टकरा गई । "वैश्रवणी" से मिलने के बाद मन में उभर आए विचारों का परिणाम है मेरी यह कविता ।
डा. ममतामयी चौधरी की लिखी किताब "वैश्रवणी" में सूर्पनखा सदियों से समाज में स्त्रियों की स्थिति के राज खोलती नजर आई । और उनके राम से किए प्रत्येक सवाल का जवाब आज भी हर स्त्री मांग रही है। उडि़या भाषा में लिखी गई किताब "वैश्रवणी" को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त है।)

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