Sunday, 16 November 2014


बांध से बंधी धान की बालियां
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तप रहा है आज फिर
मंगरी के मन का मरूस्थल...

जलने लगा है मन गर्म रेत में
जब देखती है हल्की बारीश के बाद
छींटे जा रहे हैं बीज खेत में,

चंद कागज के टुकड़े थामे हाथों में
बांध के किनारे खड़ी बेतहाशा
अपने खतों को लगती है तलाशने
कंदरी की मां पागलों सी बरसात में
शहर चकाचौंध है बांध के बन जाने से
और वह चौंक-चौंक उठती है देखकर
डिबरी की रोशनी में बनती
अपनी ही परछाई को अंधेरी रात में,

कुछ नहीं है बिरजु के पास आज खाने को
अब खेतों के बदले हैं बड़ी-बड़ी बांध
दिख रही है मंगरू की देह की हड्डी
और सिकुड़ कर सिमटती पेट की आंत,

अब बंध रहा है एक बांध आशुंओं का
अब बंध रहा है एक बांध आक्रोशों का
अब टूटेंगे ये बांध एक दिन
जब भरेंगी उलगुलान की हुंकार
पहाडि़यों पर से साखू की डालियां
तब मिटेंगी विस्थापित करती शक्तियां
और फिर से लहलहा उठेंगी खुलकर
सरजु के खेतों में
बांध से बंधी धान की बालियां........।।
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जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 1.07.2014



( सिमडेगा में केलाघाघ स्थित बांध के आस-पास घूमते हुए और गांव के लोगों से बात करते हुए एक हूक सी उठी सीने में । शायद उनके सीने में उठती हूक उतर आई कागज पर।। उनकी आंखों में भी एक बांध बन रहा है आंशुओं का, आक्रोशों का।
साखू की डालियां एक दिन देंगी संकेत इन बांधों के टूटने का......फिर शायद किसी को समझ में आए कि हर बरसात खेत खो चुके किसानों के दिल में कैसी हूक उठती है। )

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