Sunday, 16 November 2014

भेड़ों के हक में


भेड़ों के हक में
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भेड़ों के बीच भेडि़या आया
मुंह में घास डाली
आंखों में मासूमियम लिए उसने...

भेड़ों के हक की बात बोली
उनकी ही भाषा में
और
आ गई भेड़ें झांसा में,

भेड़ों की मासूम आंखों ने
नहीं देखा उसकी दो आंखें
कुछ और कहती थी
छुप-छुपकर जो
दिन-रात जलती रहती थी,

भेडि़ए को कांधे पर उठाए
उधर रंगे सियारों के झुंड का
प्रचार-प्रसार था बड़े जोर में
रह-रहकर बीच में उठती
भेडि़ए की गुर्राहट
छुप जाती थी
ह ुंआ-हुंआ के शोर में,

ताजी भेड़ें देख
मुंह के कोने से
रूक-रूक कर
भेडि़ए की टपकती थी लार
छिपाने को उसका सच
झट चाट लेते थे सारे सियार,

आखिर भेड़ों ने चुन लिया
भेडि़ए को अपना राजा
और दे दिया सिंहासन
भेडि़ए ने कहा अब दूर होगा
भेड़ों पर भेडि़यों का शोषण
चिल्लाकर किया सबने समर्थन
तब बनकर आया
भेड़ों के हक में एक नया नियम

सुबह आधा भेड़ नाश्ते में,
दोपहर पूरा भेड़ लंच में
और रात अपने हिसाब से
हर भेडि़या करेगा
भेड़ों का हल्का भोजन ।।
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जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 26.6.2014



 

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