Sunday, 16 November 2014

अपने घर के बाहर

अपने घर के बाहर
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कितनी आसानी से तलाश लेते हो
अपने जर्जर मन के टूटे मकान में...

खींच लाने को खुशी की रोशनी
एक गुमनाम सा गलियारा
और
किसी की देह की दीवारों पर
ओठंग कर, प्रेम की नशीली घूंट
हलक के नीचे उतारते रहने की
एक खामोश जगह ,

एक वह भी है तुम्हारी जिंदगी में
जिसने उसी दिन मन की गलियारों के
बदं कर लिए थे सारे रास्ते
जिस दिन पिता के घर से
निकलकर धूप-छांव सहने को
सारी उम्र तुम्हारे ही साथ भर को
अपनी नियती मान लिया था,

रोटी का निवाला भर निश्चित कर
तुम्हें लगता है उसकी जिंदगी
तुम्हारे हाथों सुरक्षित हो गई
मगर तुम्हे उसकी देह से
अरसा बीतते-बीतते
घिन्न सी क्यों होने लगती है?
बर्तन बासन धोने को, आंगन
तुम्हारा हमेशा साफ रखने को
और
तुम्हारे नाम को जिंदा रखने को
तुम्हें ताउम्र किसी की जरूरत है
वह पूरी कर रही है चुपचाप उसे
और
खुश है दिखावा करते हुए
कि वह भी किसी की बीवी है,

रोटी के लिए
खुद पर निर्भर बनाकर उसे
कितनी आसानी से तलाश लेते हो
अपनी जर्जर मन के टूटे मकान में
खींच लाने को खुशी की रोशनी
एक गुमनाम सा गलियारा
और
किसी की देह की दीवारों पर
ओठंग कर प्रेम की नशीली घूंट
हलक के नीचे उतारते रहने की
एक खामोश जगह
अपने घर के बाहर ।।
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जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 10.5.2014

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