Sunday, 16 November 2014


विकास की पटरी पर एक सुबह
.........................................
अपने जीवन के 
अतीत की पटरी पर
चलते हुए लगा 
अतीत का अतीत ही रहना 
शायद अच्छा होता है 

जैसे ठहरे वक्त के 
ठहरी स्मृतियों की बाइस्कोप में
चटखदार आकृतियों को
घुमा-घुमा कर देखते रहना
और हर बार उसे वैसा ही पाना

पर अचानक नजर आता है
हकीकत की जमीं पर
उन खूबसूरत आकृतियों का
एक दिन गायब हो जाना 
मानो अतीत की पटरी पर
किसी धड़धड़ाती रेल की तरह
बदले वक्त का आना 
और काटते हुए निकल जाना.
अतीत-वर्तमान को दो हिस्सों में

तब यह और भी 
वीभत्स हो जाता है  जब 
उस अतीत को अपने अंदर 
वर्षो से विरासतों की तरह 
पाला-पोसा, सहेजा गया हो
और उन अतीतों का वर्तमान 
विकास की पटरियों पर
एक सुबह कटा मिले
बेजान, निष्प्राण.....

.........................................
जसिन्ता केरकेट्टा, 
दिनांक . 16.10.2014


विकास की पटरी पर एक सुबह
.........................................
अपने जीवन के
अतीत की पटरी पर
चलते हुए लगा ...

अतीत का अतीत ही रहना
शायद अच्छा होता है

जैसे ठहरे वक्त के
ठहरी स्मृतियों की बाइस्कोप में
चटखदार आकृतियों को
घुमा-घुमा कर देखते रहना
और हर बार उसे वैसा ही पाना

पर अचानक नजर आता है
हकीकत की जमीं पर
उन खूबसूरत आकृतियों का
एक दिन गायब हो जाना
मानो अतीत की पटरी पर
किसी धड़धड़ाती रेल की तरह
बदले वक्त का आना
और काटते हुए निकल जाना.
अतीत-वर्तमान को दो हिस्सों में

तब यह और भी
वीभत्स हो जाता है जब
उस अतीत को अपने अंदर
वर्षो से विरासतों की तरह
पाला-पोसा, सहेजा गया हो
और उन अतीतों का वर्तमान
विकास की पटरियों पर
एक सुबह कटा मिले
बेजान, निष्प्राण.....

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जसिन्ता केरकेट्टा,
दिनांक . 16.10.2014

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