Sunday, 16 November 2014





काली खेतें कोड़ता बचपन
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बचपन बचाने के
हजार दावों की खेतों में ...

भूखा बचपन काले सोने कोड़ रहा
और सोते हुए भी माथे पर शिकन है
जरूरत से ज्यादा खाए हुओं के कि
कौन कम्बख्त उनकी नींदें तोड़ रहा ,

उनके घर के पिछवाड़े
बेपरवाह बचपन
अंधेरी राहों में बिखरी कालिखों से
अपना चेहरा पोत रहा
गुनाह की फसलें उगाने को
विकास के नाम उनकी
तैयार काली खेतें जोत रहा,

जब हो चुके हों
काले सोने की चमक से वो अंधे
कहां दिखेगा
दौड़ती हुई विकास की गाडि़यों पर
बचपन कैसे बढ़ रहा है बनकर " गुंडे "
जश्न है अचानक जागकर देख
अपनी छत पर लहरते ‘नोबल’ के झंडे ,

बिक रहा है बचपन बाजारों में
कोयले की चंद बोरियों के साथ
कौड़ी के दाम
और दुनिया कर रही सलाम
उस बचपन के नाम.......।।
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जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक. 21.10.2014



(" गुंडे " किसी ने ये फिल्म देखी होगी तो स्पष्ट होगा कि जरूरत से ज्यादा खाकर डकारते लोगों की भीड़ में कैसे बचपन अपनी भूख मिटाने को दौड़ती कोयले की गाडि़यों में बनकर निकलता है "गुंडे".
पैनम के रास्तों पर दिखा ऐसा ही बचपन और तकलीफ की कुछ गाढ़ी परतें रात कागज पर उतरती गई।)

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