Sunday, 16 November 2014

बेडि़यों से जकड़ा जश्न
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जब देश की सीमाओं पर
आजादी के लहलहाते फसलों को ...

कोई रौंद रहा था
गांव जल रहे थे धुआं-धुआं
कोहराम मच रहा था
हर कत्लेआम पर
तब धर्म और संस्कृति के
अश्वमेघ के लिए
तुम कर रहे थे
शास्त्रो की रचना
आदमी-आदमी के बीच का
भेद मिटाने के बदले
सगुण व निर्गुण का भेद
मिटाने में तुम जुटे थे
तुम्हारी देह पर युद्धप्रिय जातियों के
खूनी पंजे गड़ते रहे कई वर्षो तक
और उसकी कैद में छटपटाती रही
"सोने की चिड़िया"
तुम्हारी बनायी जात-पांत की
उन सुरक्षा दीवारों ने
जिन्हें तुमने सुरक्षाकवच समझा
तुम्हारी आत्मा को
जर्जर और अशक्त कर डाला
और वही दीवारें आज भी तुम्हें
अपने ही घर में गुलामों की तरह
कैद कर मुस्कुराती है
और किसी कैदी की भांति
"आजादी के नाम पर"
तुम मनाते हो
अपने स्वतंत्र होने का जश्न........।

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जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक 15.08.2014

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