Sunday, 16 November 2014

Jacinta Kerketta की फ़ोटो.


नई परिभाषा गढ़ता जावा का फूल
...............................................

करम की डालियों के चारों ओर
नाचती हुई...

करम की डलिया को
सामने रखकर कुंवारियां
करम राजा से
एक ही साथ मांगती हैं इस दिन
एक अच्छा जीवन साथी और
बच्चे रूपी, घर के दीये की नई बाती,

कुंवारियां रंग देती हैं
करम पर्व के पूर्व
करम डलिया की कोख में पलते
जावा फूलों के सारे भ्रूणों को
सोने की चमक वाले
सुनहरे पीले रंगों में
ताकि करम डलिया रूपी गर्भ में
पल रही कोई कन्या भ्रूण फिर
न बिंध सके सभ्य समाज में
लिंग भेद की तीरों से,

सहेजती हैं कुंवारियां नौ दिनों तक
करम की डलिया को
मानो संभाल रही हों
अपने ही गर्भ में
पलते किसी बच्चे को
करम डलिया के चारो ओर
नौ दिनों तक नाचती गाती हैं
दुनिया की सारी बातें भूल
जो बन जाता है
करम के दिन जावा का फूल,

यह नई सृष्टि अखड़ा में
मंद-मंद मुस्कुराती है
जिसे हर आदिवासी जन
अपने सिर पर लगता है
और हर आदिवासी बाला
अपने बालों में सजाती हैं,

और करम का यह डलिया
करम का यह जावा का फूल
करम की वो कुंवारियां
बतलाती हैं नई सृष्टि रूपी शिशुओं को
सड़कों पर लावारिस फेंक आने वाले
तथाकथित सभ्य समाज को कि
नई सृष्टि को जन्म देने
और सहेजने की प्रक्रिया, प्रकृति में
समाज की बनायी परिभाषाओं से परे है।।
......................................................


जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक . 30.8.2014



( करम पर्व के पूर्व इस दिन को समर्पित कविता। )

No comments:

Post a Comment