Sunday, 16 November 2014

हूल जोहार


हूल जोहार
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आकाश से कोई प्रकाश पुंज
पहाडि़यों पर आज कौंधा है...

देख अपने महुआ के फूलों को
जिन्हें बुलडोजरों ने रौंदा है

देखो, पहाडि़यों पर वह प्रकाश पुंज
धीरे-धीरे ले रहा है इंसानी आकार
उठ रही है नगाड़ों के बीच आज फिर
जंगलों में हूल - हूल की पुकार

हल्दी चावल नहीं आज
घर-घर साखू के पत्तो में लपेटकर
गुपचुप तीर भेजवाए जाते हैं
गहन निंद्रा से जाग उठो, देखो
सिद्धो-कान्हो,चांद-भैरव चले आते हैं

आवाजें तेज होने लगी हैं घर-घर में
पुराने तीरों को धार करने की
कोने-कोने में हो रही तैयारिंयां
अस्तित्व की लड़ाई आर या पार करने की

देख बिगड़ता जीवन का संतुलन
बुरूबोंगा भी रोते हैं बार-बार
सुनकर उनका रोना गुस्से में
धरती तपकर हो रही अंगार

आकाश भी कर रहा उन अंगारों पर
टूटकर गिरते तारों के तीरों को धार
गुलाम बनाने वाली नरभक्षी ताकतों पर
बरसेंगी अब आसमानी तीरों की बौछार

मत पूछो अब हाल कैसा किसका है?
बस दौड़ पड़ो सुनकर अपनों की चित्कार
नरभक्षी ताकतो के खिलाफ खड़े होने को
कहते चलो
हूल जोहार - हूल जोहार...................।।
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दिनांक -29.06.14

(30 जून को हूल दिवस के मौके पर - झारख्ंाड के कई जिलों में घूमते हुए रह- रहकर उठते भावों और दृश्यों को समेटते हुए " हूल जोहार" )
 

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