Sunday, 16 November 2014

Jacinta Kerketta की फ़ोटो.


उठो, तुम्हारे सिरहाने है सूरज
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ओ गांगु पहाडि़या
तुम सफेद कुर्ता पहन डुलमुल ...

नशे में घूम रहे हो मंगर बाजार
और वहां उपर पहाड़ पर
तुम्हारी बेटी पड़ी है खाट पर
देकर एक बच्चे को जन्म
अधमरी सी बीमार,

तुम अपनी बेटी के दर्द बेच रहे
बिहान से ही आकर बाजार
सौ, दो सौ, पांच सौ मदद की
लगा रहे परिचितों से गुहार
कुछ पैसे लोगों ने तुम्हें दिए भी
देखकर तुम्हें लाचार
तुम सांझ झौंक आए सब भट्टी में
नहीं याद आई बेटी, तुम्हें एक भी बार,

ओ पहाड़ों के राजा
क्यों नहीं तुम्हें सुनाई पड़ती
अपनी ही लड़कियों की चित्कार
तुम सोते रहते हो नशे की नींद में उपर
और मेला देखने आई तुम्हारी बेटियों का
शहरी भेडि़यों के हाथों हो रहा बलात्कार,

ओ मईसा पहाडि़या
तुमने ही उठाया था भार
हर पहाडि़या को दिलाने "भोजन का अधिकार"
अनाज बांटने का जिम्मा लेकर तुम
क्यों पहाड़ से भागकर नीचे तराई में
बस गए उन्हीं लूटेरों के साथ, सपरिवार,

कैसे भेदकर तुम्हारी आजादी की दीवारें
तुम्हारे पहाड़ों पर लोग मशीनें चला रहे
अपना पहाड़ बेचकर कौड़ी के भाव
तुम उनके दरवाजे पर भीख मांग रहे,

उठो, पहाड़ों के राजा
बचाने अपने पहाड़ों को कटने से
अपनी बेटियों को गैरों के हाथों बिकने से
देखो, इतिहास का पन्ना फिर से फड़फड़ा रहा
उठो कि तुम्हारे सिरहाने से सूरज निकल रहा ।
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जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 8.10.2014

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