Sunday, 16 November 2014

आक्रोशित संथाल के जंगल
.......................................

जब-जब अपमान की आंच ने
 अस्तित्व की आत्मा को जलाया है
उसके होने पर प्रश्नचिन्ह लगाया है
 हूल के हजारों वंशजों ने 
 जले हुए जंगल में तब-तब
" लो बीर बैसी " बुलाया है,

" लो बीर बैसी " में बैठ
 आज विचार रहीं हैं चारो दिशाएं
 कैसे रूकेंगी उनके सीमानेां पर
 सेंधमारी की बढ़ती तेज हवाएं,

चारो दिशाओं से
 जलते जंगल में 
 शब्द बज रहे नगाड़ों से
 जिसकी अनुगूंज जैसे
 लौट रही टकराकर
 हर शब्द के पीछे खड़ी 
 दूर कहीं 
 इतिहास की दीवारों से
 पूर्वजों की  रक्त से लाल आंखें 
 देख रही हैं आज कैसे 
 दामिन-इ-कोह जल रहा है
 प्रहरियों के दोहरे व्यवहारों से,

" लो बीर बैसी " में आकर 
 वो कारण बताएंगे 
 जिसने दामिन-इ-कोह की 
 सीमाओं को लांघना चाहा है 
 खून बहाकर बचाए अस्तित्व की 
 उपज खाते हूल वंशजों को 
 अपने नए कायदों की 
 जंजीरों से बांधना चाहा है,

जल रहे जंगल की 
 लपटें रही हैं आज पुकार
 जो नहीं माना किसी ने इस बार 
" लो बीर बैसी " का फरमान 
 आक्रोशित जंगल कर उठेगा 
 फिर एक बार " हूल का आह्वान "।।
.................................................

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक- 26.10.2014

( लो बीर बैसी - ये शब्द संथाली के हैं, जिसका अर्थ है "जला हुआ जंगल"। जब अस्तित्व व अधिकारों के सेंधमार सीमाएं लांघने लगते हैं, तब संताल लो बीर बैसी अर्थात एक बड़ी बैठक बुलाते हैं। इसके तहत उनके अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले को बुलाकर स्पष्टीकरण मांगा जाता है। लो बीर बैसी की शर्तो को न मानने वाले पर सीधे तीर चलाने और आक्रमण करने का नियम है। 
 आज संताल के जंगल आक्रोशित हैं क्योंकि केंद्र सरकार ने एसपीटी एक्ट में फेरबदल की मंशा जाहिर की है। संताल मानते हैं कि यह फेरबदल उनके अस्तित्व पर अपमान की आंच है।)

( दामिन-इ-कोह - पर्षियन शब्द हैं। 1824 से 1833 तक अंग्रेजों ने संताल-परगना के जिस इलाके का सीमांकन किया वह दामिन-इ-कोह कहलाता है। इसे बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त रखा गया जहां संथाल परगना काश्तकारी कानून प्रभावी है। यहां आज भी उनकी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था सशक्त है। )


आक्रोशित संथाल के जंगल
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जब-जब अपमान की आंच ने
अस्तित्व की आत्मा को जलाया है...

उसके होने पर प्रश्नचिन्ह लगाया है
हूल के हजारों वंशजों ने
जले हुए जंगल में तब-तब
" लो बीर बैसी " बुलाया है,

" लो बीर बैसी " में बैठ
आज विचार रहीं हैं चारो दिशाएं
कैसे रूकेंगी उनके सीमानेां पर
सेंधमारी की बढ़ती तेज हवाएं,

चारो दिशाओं से
जलते जंगल में
शब्द बज रहे नगाड़ों से
जिसकी अनुगूंज जैसे
लौट रही टकराकर
हर शब्द के पीछे खड़ी
दूर कहीं
इतिहास की दीवारों से
पूर्वजों की रक्त से लाल आंखें
देख रही हैं आज कैसे
दामिन-इ-कोह जल रहा है
प्रहरियों के दोहरे व्यवहारों से,

" लो बीर बैसी " में आकर
वो कारण बताएंगे
जिसने दामिन-इ-कोह की
सीमाओं को लांघना चाहा है
खून बहाकर बचाए अस्तित्व की
उपज खाते हूल वंशजों को
अपने नए कायदों की
जंजीरों से बांधना चाहा है,

जल रहे जंगल की
लपटें रही हैं आज पुकार
जो नहीं माना किसी ने इस बार
" लो बीर बैसी " का फरमान
आक्रोशित जंगल कर उठेगा
फिर एक बार " हूल का आह्वान "।।
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जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक- 26.10.2014



( लो बीर बैसी - ये शब्द संथाली के हैं, जिसका अर्थ है "जला हुआ जंगल"। जब अस्तित्व व अधिकारों के सेंधमार सीमाएं लांघने लगते हैं, तब संताल लो बीर बैसी अर्थात एक बड़ी बैठक बुलाते हैं। इसके तहत उनके अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले को बुलाकर स्पष्टीकरण मांगा जाता है। लो बीर बैसी की शर्तो को न मानने वाले पर सीधे तीर चलाने और आक्रमण करने का नियम है।
आज संताल के जंगल आक्रोशित हैं क्योंकि केंद्र सरकार ने एसपीटी एक्ट में फेरबदल की मंशा जाहिर की है। संताल मानते हैं कि यह फेरबदल उनके अस्तित्व पर अपमान की आंच है।)



( दामिन-इ-कोह - पर्षियन शब्द हैं। 1824 से 1833 तक अंग्रेजों ने संताल-परगना के जिस इलाके का सीमांकन किया वह दामिन-इ-कोह कहलाता है। इसे बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त रखा गया जहां संथाल परगना काश्तकारी कानून प्रभावी है। यहां आज भी उनकी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था सशक्त है। )

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