Sunday, 16 November 2014

रगों के सरहदों के पार


रगों के सरहदों के पार
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तुमने कब मुझे "इंसान" समझा?
हां, इसलिए मैं जहां में बसती हूं बनकर...

अब मिट्टी, हवा, बारिश और धूप,

मेरी आत्मा तलाश रही है
"बड़ा सूरज" यह सुनकर कि
बड़ी संस्कृति का सूरज भी बड़ा होता है
और तुम्हारी बड़ी संस्कृति को तलाशते हुए
मेरी देह लहरों की मानिंद उस वक्त
थरथरा उठी जब मैंने तुम्हारे
ग्रंथों के सागर में अनायास ही
झांककर अपना अक्स देख लिया
और लगा
मैं इस सागर में किसी दिशाहीन
खानाबदोश नाव की तरह हूं
जिसे किनारेां ने उठवा लिया है
या जैसे मैं हूं सांस लेती हुई
उस नाव पर रखी कोई जिंदा लाश
नींद में डूबी हुई सी....,
रास्ते भर हर पड़ाव पर जिसके
कफन का रंग भी बदल जाता है
क्योंकि यहां हर रंग रंगा होता है
तुम्हारे ही हिसाब के रंगों से
आह!
इसलिए मैंने उतार कर तुम्हारे सारे रंग
रंग लिया है खुद को मिट्टी के रंग से,

तुम क्या जानो कि
पिरामिडों के इतिहास से भी
पुराना और रहस्यमय है
स्त्री की पीड़ा और प्रेम का इतिहास
मेरी मुंदी आंखों के पलकों के नीचे
गहन अंधेरे में छिपी पीड़ा और
उस रहस्यमय प्रेम को जो
मेरी डायरी के पन्नों में जिंदा
कहीं सांस ले रहा है चुपचाप
प्रेम के लिए बनाए
तुम्हारी रंगों के सरहदों के पार...।।

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जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 21.08.2014
 

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