Sunday, 16 November 2014

मेरे हाथों का हथियार


मेरे हाथों का हथियार
.............................


मैं देख रहा हूं
हर दिन...

मां जाती है
पर
हाथों में उसके
खुरपी और डलिया की जगह
तीर और कमान है,

भागता हुआ मां के पीछे
पगडंडी तक पहुंच
देखता हूं
दूर तक आदमियों का झुंड
जाकर उस भीड़ में
गुम हो जाती है मां,

बदहवाश दौड़ता हुआ मैं
पगडंडी की गीली मिट्टी में
फंस जाता हूं
भीड़ नारे लगाते हुए
मेरी नजरों से दूर निकल जाती है,

उस रात मां लौट आती है
सफेद पट्टी बंधे उसके सिर से
रींस रहा था गाढ़ा लाल खून
मैं टुटूर-टुटूर ताकता उसे
छूकर देखता हूं सिर से रीसता लाल खून
और
मेरी आंखों में भी लहू उतर आता है,

मुझे अपने गोद में लेकर उस दिन
मां ने बस इतना कहा था
हम लड़ रहे हैं
अपनी जमीन बचाने
अपने आप को बचाने के लिए
मेरे बाद तुम्हें भी लड़ना होगा,

अगले दिन मां तीर कमान लिए
निकल पड़ी थी फिर
देर रात घर न लौटने पर
सिसकता हुआ मैं रात भर
अंधेरे और उजाले की चौखट पर
खड़ा उसका इंतजार करता रहा
तब भी जाने क्यों मां नहीं आई,

कई साल बाद
जाना मैंने लेकर वो तीर कमान
घर लौटने के लिए
नहीं निकली थी
आज मैं लड़ रहा हूं
मां के सपनों को बचाने के लिए
मैं लड़ रहा हूं उन सारे दर्दो के साथ
जो मेरे सीने में कहीं गहरे गड़े हंै
लड़ रहा हूं कई सदियों से.....,

लोगों को ये बस लड़ाई लगती है
नहीं दिखता
मेरा सदियों पुराना दर्द
नहीं दिखता
मेरा सदियों पुराना जख्म
नहीं दिखता
सदियों से दूसरों द्वारा
लूटते-खसोटते वक्त
मेरी देह पर गढ़ गए
जहरीले नाखूनों के दाग,

उन्हें दिखता है
सिर्फ मेरी जमीन, जंगल
और
मेरे हाथों का हथियार ं........।।
......................................


- जसिन्ता केरकेट्टा
 

No comments:

Post a Comment