Sunday, 16 November 2014

बागी बचपन
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वहां उजाले के झूठे वादे के पीछे
अंधरे दरवाजे की फांक से
बचपन की जिंदगी...

जैसे चुपके से रात भागी हो
कुहासों की चादर ओढे खड़ी
दरवाजे पर उम्मीदों की भोर
अपने बच्चों की
उजली सांसों को देखती है
बचपन के वजूद का साथ छोड
असमय जवान होते हुए
और महसूसती है जाने कब
अपने अंदर अपना ही कोई हिस्सा
जैसे अनजाने में हो गया बागी हो।।
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जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक . 11.11.2014

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