Sunday, 16 November 2014

अपने घर के बाहर

अपने घर के बाहर
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कितनी आसानी से तलाश लेते हो
अपने जर्जर मन के टूटे मकान में...

खींच लाने को खुशी की रोशनी
एक गुमनाम सा गलियारा
और
किसी की देह की दीवारों पर
ओठंग कर, प्रेम की नशीली घूंट
हलक के नीचे उतारते रहने की
एक खामोश जगह ,

एक वह भी है तुम्हारी जिंदगी में
जिसने उसी दिन मन की गलियारों के
बदं कर लिए थे सारे रास्ते
जिस दिन पिता के घर से
निकलकर धूप-छांव सहने को
सारी उम्र तुम्हारे ही साथ भर को
अपनी नियती मान लिया था,

रोटी का निवाला भर निश्चित कर
तुम्हें लगता है उसकी जिंदगी
तुम्हारे हाथों सुरक्षित हो गई
मगर तुम्हे उसकी देह से
अरसा बीतते-बीतते
घिन्न सी क्यों होने लगती है?
बर्तन बासन धोने को, आंगन
तुम्हारा हमेशा साफ रखने को
और
तुम्हारे नाम को जिंदा रखने को
तुम्हें ताउम्र किसी की जरूरत है
वह पूरी कर रही है चुपचाप उसे
और
खुश है दिखावा करते हुए
कि वह भी किसी की बीवी है,

रोटी के लिए
खुद पर निर्भर बनाकर उसे
कितनी आसानी से तलाश लेते हो
अपनी जर्जर मन के टूटे मकान में
खींच लाने को खुशी की रोशनी
एक गुमनाम सा गलियारा
और
किसी की देह की दीवारों पर
ओठंग कर प्रेम की नशीली घूंट
हलक के नीचे उतारते रहने की
एक खामोश जगह
अपने घर के बाहर ।।
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जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 10.5.2014

नदी और लाल पानी


नदी और लाल पानी
..............................
कोका-कोला बनाकर
तुमने उसे ''ठंडा का मतलब'' बताया
तो अब दुनियां को भी बताओ...

सारंडा के नदी-नालों में बहते
लाल पानी का मतलब क्या है?
नदी के तट पर चुंआ बनाकर, पानी
छानते-छानते थक चुकी जुंबईबुरू की
सुकुरमुनी को तुम क्या समझाओगे?
कौन सी उपमा देकर
नदी के इस लाल पानी की ओट में
अपने गुनाहों के रंग छुपाओगे,
पीकर जिसे मौत को गले लगा रही सोमारी
उसकी लाल आंखें सवाल पूछती हंैं तुमसे
कादो से सना लाल पानी
उतार देने को उसके हलक में
और कितने साल की लीज तुमने ले रखी है?
वो लोग भी कहां चले गए, जो कल तक
खूब करते थे लाल पानी की राजनीति
कितनी सशक्त थी वो रणनीति कि
आज तक रंग पीकर बह रही नदी
सवाल पूछ रही है उस शक्स से भी
जो सारंडा के विकास का दावा ठोक रहे,
देवियों की नग्न कलाकृति देखकर हुसैन को
तुम देश निकाले की सजा सुनाना चाहते थे
तो इंसानों की जिंदगी विकृत कर देने वाली
ऐसी हरकतों के लिए क्या दे सकोगे
सारंडा निकाले की सजा?
............................................
जसिन्ता केरकेट्टा, रांची
दिनांक - 17.2.2014

भेड़ों के हक में


भेड़ों के हक में
..........................
भेड़ों के बीच भेडि़या आया
मुंह में घास डाली
आंखों में मासूमियम लिए उसने...

भेड़ों के हक की बात बोली
उनकी ही भाषा में
और
आ गई भेड़ें झांसा में,

भेड़ों की मासूम आंखों ने
नहीं देखा उसकी दो आंखें
कुछ और कहती थी
छुप-छुपकर जो
दिन-रात जलती रहती थी,

भेडि़ए को कांधे पर उठाए
उधर रंगे सियारों के झुंड का
प्रचार-प्रसार था बड़े जोर में
रह-रहकर बीच में उठती
भेडि़ए की गुर्राहट
छुप जाती थी
ह ुंआ-हुंआ के शोर में,

ताजी भेड़ें देख
मुंह के कोने से
रूक-रूक कर
भेडि़ए की टपकती थी लार
छिपाने को उसका सच
झट चाट लेते थे सारे सियार,

आखिर भेड़ों ने चुन लिया
भेडि़ए को अपना राजा
और दे दिया सिंहासन
भेडि़ए ने कहा अब दूर होगा
भेड़ों पर भेडि़यों का शोषण
चिल्लाकर किया सबने समर्थन
तब बनकर आया
भेड़ों के हक में एक नया नियम

सुबह आधा भेड़ नाश्ते में,
दोपहर पूरा भेड़ लंच में
और रात अपने हिसाब से
हर भेडि़या करेगा
भेड़ों का हल्का भोजन ।।
......................................
जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 26.6.2014



 

हूल जोहार


हूल जोहार
.......................

आकाश से कोई प्रकाश पुंज
पहाडि़यों पर आज कौंधा है...

देख अपने महुआ के फूलों को
जिन्हें बुलडोजरों ने रौंदा है

देखो, पहाडि़यों पर वह प्रकाश पुंज
धीरे-धीरे ले रहा है इंसानी आकार
उठ रही है नगाड़ों के बीच आज फिर
जंगलों में हूल - हूल की पुकार

हल्दी चावल नहीं आज
घर-घर साखू के पत्तो में लपेटकर
गुपचुप तीर भेजवाए जाते हैं
गहन निंद्रा से जाग उठो, देखो
सिद्धो-कान्हो,चांद-भैरव चले आते हैं

आवाजें तेज होने लगी हैं घर-घर में
पुराने तीरों को धार करने की
कोने-कोने में हो रही तैयारिंयां
अस्तित्व की लड़ाई आर या पार करने की

देख बिगड़ता जीवन का संतुलन
बुरूबोंगा भी रोते हैं बार-बार
सुनकर उनका रोना गुस्से में
धरती तपकर हो रही अंगार

आकाश भी कर रहा उन अंगारों पर
टूटकर गिरते तारों के तीरों को धार
गुलाम बनाने वाली नरभक्षी ताकतों पर
बरसेंगी अब आसमानी तीरों की बौछार

मत पूछो अब हाल कैसा किसका है?
बस दौड़ पड़ो सुनकर अपनों की चित्कार
नरभक्षी ताकतो के खिलाफ खड़े होने को
कहते चलो
हूल जोहार - हूल जोहार...................।।
.................................................................
दिनांक -29.06.14

(30 जून को हूल दिवस के मौके पर - झारख्ंाड के कई जिलों में घूमते हुए रह- रहकर उठते भावों और दृश्यों को समेटते हुए " हूल जोहार" )
 

बांध से बंधी धान की बालियां
......................................

तप रहा है आज फिर
मंगरी के मन का मरूस्थल...

जलने लगा है मन गर्म रेत में
जब देखती है हल्की बारीश के बाद
छींटे जा रहे हैं बीज खेत में,

चंद कागज के टुकड़े थामे हाथों में
बांध के किनारे खड़ी बेतहाशा
अपने खतों को लगती है तलाशने
कंदरी की मां पागलों सी बरसात में
शहर चकाचौंध है बांध के बन जाने से
और वह चौंक-चौंक उठती है देखकर
डिबरी की रोशनी में बनती
अपनी ही परछाई को अंधेरी रात में,

कुछ नहीं है बिरजु के पास आज खाने को
अब खेतों के बदले हैं बड़ी-बड़ी बांध
दिख रही है मंगरू की देह की हड्डी
और सिकुड़ कर सिमटती पेट की आंत,

अब बंध रहा है एक बांध आशुंओं का
अब बंध रहा है एक बांध आक्रोशों का
अब टूटेंगे ये बांध एक दिन
जब भरेंगी उलगुलान की हुंकार
पहाडि़यों पर से साखू की डालियां
तब मिटेंगी विस्थापित करती शक्तियां
और फिर से लहलहा उठेंगी खुलकर
सरजु के खेतों में
बांध से बंधी धान की बालियां........।।
...................................................

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 1.07.2014



( सिमडेगा में केलाघाघ स्थित बांध के आस-पास घूमते हुए और गांव के लोगों से बात करते हुए एक हूक सी उठी सीने में । शायद उनके सीने में उठती हूक उतर आई कागज पर।। उनकी आंखों में भी एक बांध बन रहा है आंशुओं का, आक्रोशों का।
साखू की डालियां एक दिन देंगी संकेत इन बांधों के टूटने का......फिर शायद किसी को समझ में आए कि हर बरसात खेत खो चुके किसानों के दिल में कैसी हूक उठती है। )

मेरे हाथों का हथियार


मेरे हाथों का हथियार
.............................


मैं देख रहा हूं
हर दिन...

मां जाती है
पर
हाथों में उसके
खुरपी और डलिया की जगह
तीर और कमान है,

भागता हुआ मां के पीछे
पगडंडी तक पहुंच
देखता हूं
दूर तक आदमियों का झुंड
जाकर उस भीड़ में
गुम हो जाती है मां,

बदहवाश दौड़ता हुआ मैं
पगडंडी की गीली मिट्टी में
फंस जाता हूं
भीड़ नारे लगाते हुए
मेरी नजरों से दूर निकल जाती है,

उस रात मां लौट आती है
सफेद पट्टी बंधे उसके सिर से
रींस रहा था गाढ़ा लाल खून
मैं टुटूर-टुटूर ताकता उसे
छूकर देखता हूं सिर से रीसता लाल खून
और
मेरी आंखों में भी लहू उतर आता है,

मुझे अपने गोद में लेकर उस दिन
मां ने बस इतना कहा था
हम लड़ रहे हैं
अपनी जमीन बचाने
अपने आप को बचाने के लिए
मेरे बाद तुम्हें भी लड़ना होगा,

अगले दिन मां तीर कमान लिए
निकल पड़ी थी फिर
देर रात घर न लौटने पर
सिसकता हुआ मैं रात भर
अंधेरे और उजाले की चौखट पर
खड़ा उसका इंतजार करता रहा
तब भी जाने क्यों मां नहीं आई,

कई साल बाद
जाना मैंने लेकर वो तीर कमान
घर लौटने के लिए
नहीं निकली थी
आज मैं लड़ रहा हूं
मां के सपनों को बचाने के लिए
मैं लड़ रहा हूं उन सारे दर्दो के साथ
जो मेरे सीने में कहीं गहरे गड़े हंै
लड़ रहा हूं कई सदियों से.....,

लोगों को ये बस लड़ाई लगती है
नहीं दिखता
मेरा सदियों पुराना दर्द
नहीं दिखता
मेरा सदियों पुराना जख्म
नहीं दिखता
सदियों से दूसरों द्वारा
लूटते-खसोटते वक्त
मेरी देह पर गढ़ गए
जहरीले नाखूनों के दाग,

उन्हें दिखता है
सिर्फ मेरी जमीन, जंगल
और
मेरे हाथों का हथियार ं........।।
......................................


- जसिन्ता केरकेट्टा
 

साजिशों की सिक्स लेन




साजिशों की सिक्स लेन
.................................

सारंडा के जंगलों से निकलकर लोग
जमा हो रहे हैं किसी गांव में...

महिलाएं चली आ रही बच्चों को बेतराकर
बूढ़े लाठियों से नापते आ रहे घाटी
जवान फलांगते पहुंच रहे पहाड़ों को
और
बच्चे गिनते आ रहे सखुआ के पेड़
यह सभा किसी उलगुलान के लिए नहीं
यह जुटान है
देखने फुटबाॅल का खस्सी टुर्नामेंट,
गांव में बच्चा जैसे ही छोड़ता है
मां का दूध पीना
वो बना दिया जाता है सारंडा के
किसी युवा-क्लब का हिस्सा
इन क्लबों के पीछे है एक अलग ही किस्सा
अपनी जमीन पर अवैध खनन के खिलाफ
उठ सकने वाली हर आवाज के हाथों में
थमा दिया जाता है किताब की जगह फुटबाॅल
और इन खस्सी टूर्नामेंटों में
उनकी सारी पढ़ाई हो जाती है गोल,

रफ्ता-रफ्ता सूंघता रहता है वह
फूटबाल की अफीम
और उसकी पथराती आंखें नहीं देख पाती
इस खेल के हार-जीत के आगे
अपने अस्तित्व का संघर्ष
मैदान में पूरी तरह निचुड़ चुकी उसकी उर्जा
अंत में देखती है अपनी देह में
जोंक की तरह चिपकी भूख को
कुलबुलाती हुई
तब उसके हाथों में
थमा दिया जाता है फावड़ा
और वह पेले, मराडोना, नेमार या मेसी
बनने के सपने लिए बन जाता है
अपनी ही मां को छलकर
उसका गर्भ खोदने वाला बेबस मजदूर,

बिना नागा किए हर माह गांव के हर दरवाजे पर
पहुंचते हैं खनन के पैरोकार
भूख, बीमारी, बेरोजगारी व लाचारी से
तड़पकर जैसे ही ग्रामीण आह भरते हैं
उनके मुंह में ठूंस देते हैं
अनाज, दवाईयां, बासन और कपड़े
और चंद पैसों में ही
खरीद लेते हैं मजदूरों का कुनबा,

विकास के नाम पर अब वहां
बनेंगी फोर से सिक्स लेन की सड़कें
और न जाने कितनी लेन साजिशों की
उन रास्तों पर मजदूरी करते लोग
नहीं जानते
सारंडा में साजिशों की और कितनी लेनें हैं ।।
...........................................................................

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 6.08.2014



( मैं किसी खेल के खिलाफ नहीं हूं लेकिन जिस तरह इसके पीछे रणनीति के तहत साजिशों का ताना बाना बुना जा रहा है, बस उसी सच को बयां कर रहीं है मेरी कविता। )
बेडि़यों से जकड़ा जश्न
.........................



जब देश की सीमाओं पर
आजादी के लहलहाते फसलों को ...

कोई रौंद रहा था
गांव जल रहे थे धुआं-धुआं
कोहराम मच रहा था
हर कत्लेआम पर
तब धर्म और संस्कृति के
अश्वमेघ के लिए
तुम कर रहे थे
शास्त्रो की रचना
आदमी-आदमी के बीच का
भेद मिटाने के बदले
सगुण व निर्गुण का भेद
मिटाने में तुम जुटे थे
तुम्हारी देह पर युद्धप्रिय जातियों के
खूनी पंजे गड़ते रहे कई वर्षो तक
और उसकी कैद में छटपटाती रही
"सोने की चिड़िया"
तुम्हारी बनायी जात-पांत की
उन सुरक्षा दीवारों ने
जिन्हें तुमने सुरक्षाकवच समझा
तुम्हारी आत्मा को
जर्जर और अशक्त कर डाला
और वही दीवारें आज भी तुम्हें
अपने ही घर में गुलामों की तरह
कैद कर मुस्कुराती है
और किसी कैदी की भांति
"आजादी के नाम पर"
तुम मनाते हो
अपने स्वतंत्र होने का जश्न........।

................................................

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक 15.08.2014

हर स्त्री मांग रही जवाब


सूर्पनखा संग हर स्त्री मांग रही जवाब
.................................................

लंकेश रक्षेंद्र रावण की बहन और
दंडकारण्य की साम्राज्ञी सूर्पनखा आज...

मांग रही है अपने सवालों का जवाब
उत्तर दो राम !

ऋषि गौतम ने तो
अहिल्या को पाषाणी बनाकर
सिद्ध कर दिया स्त्रियां शूद्रों से भी नीचे हैं
और " पुरूषोत्तम " तुमने पैरों की ठोकर से
मुक्त कर पाषाण बनी अहिल्या को
पीढि़यों के लिए कर दिया स्थापित कि
स्त्रियों की जगह " पुरूषों के पैरों के नीचे है "
यही दायित्व अगर मिल जाता स्त्री को
क्या वो हाथों की जगह पैरों से कभी
खोल पाती अहिल्या के श्राप का बंधन?
आह! मगर तुम्हारे आदर्शो का शत-प्रतिशत
देखो, सदियों से जग कर रहा है पालन
खुश हो न.....................?,

वन में मुझे अकेली देखते ही तुम ठिठके थे
एक पल को, पीछे हटकर तुमने कहा मुझसे
"नारी अकेली वन में क्यों घूमती हो?"
और आज तक बिना किसी पुरूष सहारे के
स्त्रियों का अकेला चलना किसी को गवारा नहीं
दूसरे ही क्षण तुम चौके थे यह देखकर
मैं अकेली ही गहन अंधकार में तुम्हारे सम्मुख थी
तुमने कहा
"अवश्य ही तुम कोई राक्षसी या दानवी होगी"
और देखो तब से आज तक रात्रि में दिख जाने वाली
हर स्त्री को
तुम्हारी पीढि़यों ने कुचरित्र घोषित कर रखा है,
खुश हो न..................................?

अपना दोहरा चरित्र छुपाने को
कर दिया प्रचारित "मैं सीता को खाने दौड़ पड़ी थी"
उफ! सदियों से आज तक किसी ने नहीं पूछा
लंका में मेरे सम्मुख पड़ी सीता को
खाना तो दूर क्यों मैंने छुआ तक नहीं
क्यों यह नहीं बताते कि इससे पूर्व तुमने
अपने भाई लक्ष्मण के समक्ष मुझे परोसना चाहा?
और देखो तब से आज तक हर पुरूष
स्त्री को देख रहा एक भोग्या की भांति
धन के लिए, वंश के लिए हर तरह से
कर रहा स्त्री देहों का व्यापार
खुश हो न............................?,

"भगवान" कहलाने वाले राम
क्या तुम्हारा ह्दय भक्त के भाव मात्र देखता है?
या भाव के सिवा और भी कुछ?
फिर प्रेम से विकल किसी स्त्री का
भाव देखे बिना, उसका
राक्षसी, दानवी या मानवी होना
तुमने कैसे देख लिया?
कैसे तुमने कटवाकर मेरे नाक-कान
समस्त स्त्री जाति का उपहास उड़ाया
स्त्री शरीर की गरिमा को क्षत-विक्षत कर
दे दी पीढि़यों को एक अनकही आज्ञा कि
स्त्रियों को अपने नियंत्रण में रखने को
हर कोई फेंक सके स्त्री शरीर पर एसिड
ताकि होता रहे हर सदी में
कई सूर्पनखा के चेहरे विकृत,
खुश हो न...........................?

चुप क्यों हो, मेरे सवालों का जवाब दो
पुरूषों में आदर्श राम, मांग रही तुमसे
आज हर स्त्री इन सवालों का जवाब ।।
.................................................

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक -17.08.2014

(मैं गहन अंधेरे वन में तलाश रही थी स्त्रियों की वर्तमान दशा की ऐतिहासिक जड़े और अचानक "वैश्रवणी" से टकरा गई । "वैश्रवणी" से मिलने के बाद मन में उभर आए विचारों का परिणाम है मेरी यह कविता ।
डा. ममतामयी चौधरी की लिखी किताब "वैश्रवणी" में सूर्पनखा सदियों से समाज में स्त्रियों की स्थिति के राज खोलती नजर आई । और उनके राम से किए प्रत्येक सवाल का जवाब आज भी हर स्त्री मांग रही है। उडि़या भाषा में लिखी गई किताब "वैश्रवणी" को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त है।)

रगों के सरहदों के पार


रगों के सरहदों के पार
..............................

तुमने कब मुझे "इंसान" समझा?
हां, इसलिए मैं जहां में बसती हूं बनकर...

अब मिट्टी, हवा, बारिश और धूप,

मेरी आत्मा तलाश रही है
"बड़ा सूरज" यह सुनकर कि
बड़ी संस्कृति का सूरज भी बड़ा होता है
और तुम्हारी बड़ी संस्कृति को तलाशते हुए
मेरी देह लहरों की मानिंद उस वक्त
थरथरा उठी जब मैंने तुम्हारे
ग्रंथों के सागर में अनायास ही
झांककर अपना अक्स देख लिया
और लगा
मैं इस सागर में किसी दिशाहीन
खानाबदोश नाव की तरह हूं
जिसे किनारेां ने उठवा लिया है
या जैसे मैं हूं सांस लेती हुई
उस नाव पर रखी कोई जिंदा लाश
नींद में डूबी हुई सी....,
रास्ते भर हर पड़ाव पर जिसके
कफन का रंग भी बदल जाता है
क्योंकि यहां हर रंग रंगा होता है
तुम्हारे ही हिसाब के रंगों से
आह!
इसलिए मैंने उतार कर तुम्हारे सारे रंग
रंग लिया है खुद को मिट्टी के रंग से,

तुम क्या जानो कि
पिरामिडों के इतिहास से भी
पुराना और रहस्यमय है
स्त्री की पीड़ा और प्रेम का इतिहास
मेरी मुंदी आंखों के पलकों के नीचे
गहन अंधेरे में छिपी पीड़ा और
उस रहस्यमय प्रेम को जो
मेरी डायरी के पन्नों में जिंदा
कहीं सांस ले रहा है चुपचाप
प्रेम के लिए बनाए
तुम्हारी रंगों के सरहदों के पार...।।

............................................

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 21.08.2014
 
Jacinta Kerketta की फ़ोटो.


नई परिभाषा गढ़ता जावा का फूल
...............................................

करम की डालियों के चारों ओर
नाचती हुई...

करम की डलिया को
सामने रखकर कुंवारियां
करम राजा से
एक ही साथ मांगती हैं इस दिन
एक अच्छा जीवन साथी और
बच्चे रूपी, घर के दीये की नई बाती,

कुंवारियां रंग देती हैं
करम पर्व के पूर्व
करम डलिया की कोख में पलते
जावा फूलों के सारे भ्रूणों को
सोने की चमक वाले
सुनहरे पीले रंगों में
ताकि करम डलिया रूपी गर्भ में
पल रही कोई कन्या भ्रूण फिर
न बिंध सके सभ्य समाज में
लिंग भेद की तीरों से,

सहेजती हैं कुंवारियां नौ दिनों तक
करम की डलिया को
मानो संभाल रही हों
अपने ही गर्भ में
पलते किसी बच्चे को
करम डलिया के चारो ओर
नौ दिनों तक नाचती गाती हैं
दुनिया की सारी बातें भूल
जो बन जाता है
करम के दिन जावा का फूल,

यह नई सृष्टि अखड़ा में
मंद-मंद मुस्कुराती है
जिसे हर आदिवासी जन
अपने सिर पर लगता है
और हर आदिवासी बाला
अपने बालों में सजाती हैं,

और करम का यह डलिया
करम का यह जावा का फूल
करम की वो कुंवारियां
बतलाती हैं नई सृष्टि रूपी शिशुओं को
सड़कों पर लावारिस फेंक आने वाले
तथाकथित सभ्य समाज को कि
नई सृष्टि को जन्म देने
और सहेजने की प्रक्रिया, प्रकृति में
समाज की बनायी परिभाषाओं से परे है।।
......................................................


जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक . 30.8.2014



( करम पर्व के पूर्व इस दिन को समर्पित कविता। )
Jacinta Kerketta की फ़ोटो.


करम डाली और एक आदिवासी गांव
.................................................

सोचती हूं
क्या सोचता होगा...

करम का पर्व मनाने शहर से लौटा
करम के गीतों में मदमस्त
पढ़ा-लिखा एक आदिवासी लड़का
जब कोई उससे पूछता है अचानक
पढ-लिख गए, अब कहां बसोगे?
लौटोगे शहर या फिर लौट आओगे गांव
और वो देखता है
सामने से आती बाढ
शहरों से गांवों की ओर बढ़ती हुई,

वह बाढ़ शहरों की
जो लील रही है गांवों को
और वो आदिवासी लड़का
गांव के किसी टीले पर बैठा
सोचता है अब वह जाएगा कहां ?
कैसे संभलेगा इस बाढ़ में,

उसके पास नही है
अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए
बनायी गई, पूर्वजों द्वारा
शास्त्रो की कोई नाव
बाढ़ से बरबाद होती फसलों को देख
भाग कर बचे गांवों को लूटने की प्रवृति
या ऐसे किसी भी कर्म की जब
हिमायती नहीं रही है उसकी संस्कृति
सोचता है
तब कैसे बचेगी उसकी प्रकृति?
फिर .कैसे बचेगा उसका अस्तित्व?

तभी उसे मिल जाता है
बाढ़ में बहकर आती
करम की एक डाली
जिसके सहारे वह पहुंचता है
अपने अस्तित्व के घर तक
जहां नई शुरूआत की प्रेरणा देता है
शीत से भींगा कोई जावा का फूल,

करम डाली से नापता है हर दिन
वह बाढ़ का पानी
और बाढ़ के बीचो-बीच
गाड़ कर करम डाली
फिर बसा लेता है कोई गांव
शहर की बाढ़ पर बसा, जीवित
एक आदिवासी गांव।।
...........................................


जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक . 30.08.2014
Jacinta Kerketta की फ़ोटो.


उठो, तुम्हारे सिरहाने है सूरज
.........................................

ओ गांगु पहाडि़या
तुम सफेद कुर्ता पहन डुलमुल ...

नशे में घूम रहे हो मंगर बाजार
और वहां उपर पहाड़ पर
तुम्हारी बेटी पड़ी है खाट पर
देकर एक बच्चे को जन्म
अधमरी सी बीमार,

तुम अपनी बेटी के दर्द बेच रहे
बिहान से ही आकर बाजार
सौ, दो सौ, पांच सौ मदद की
लगा रहे परिचितों से गुहार
कुछ पैसे लोगों ने तुम्हें दिए भी
देखकर तुम्हें लाचार
तुम सांझ झौंक आए सब भट्टी में
नहीं याद आई बेटी, तुम्हें एक भी बार,

ओ पहाड़ों के राजा
क्यों नहीं तुम्हें सुनाई पड़ती
अपनी ही लड़कियों की चित्कार
तुम सोते रहते हो नशे की नींद में उपर
और मेला देखने आई तुम्हारी बेटियों का
शहरी भेडि़यों के हाथों हो रहा बलात्कार,

ओ मईसा पहाडि़या
तुमने ही उठाया था भार
हर पहाडि़या को दिलाने "भोजन का अधिकार"
अनाज बांटने का जिम्मा लेकर तुम
क्यों पहाड़ से भागकर नीचे तराई में
बस गए उन्हीं लूटेरों के साथ, सपरिवार,

कैसे भेदकर तुम्हारी आजादी की दीवारें
तुम्हारे पहाड़ों पर लोग मशीनें चला रहे
अपना पहाड़ बेचकर कौड़ी के भाव
तुम उनके दरवाजे पर भीख मांग रहे,

उठो, पहाड़ों के राजा
बचाने अपने पहाड़ों को कटने से
अपनी बेटियों को गैरों के हाथों बिकने से
देखो, इतिहास का पन्ना फिर से फड़फड़ा रहा
उठो कि तुम्हारे सिरहाने से सूरज निकल रहा ।
...........................................................




जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 8.10.2014
Jacinta Kerketta की फ़ोटो.


पहाड़ों पर उगे असंख्य बांसों का रहस्य
......................................................

मैं कुरूआ में सो रहा था
अचानक जमीन हिलने लगी...

देखा जमीन का एक टुकड़ा
जेसीबी मशीन के पंजों पर था
अपनी जमीन के टुकड़े के साथ
मैं भी लटका था मशीन पर
तब महसूस हुआ मुझे
अपनी जमीन सहित उखड़ जाने का दर्द,

मैंने देखा मेरे पूर्वजों की देह
कैसे टुकड़े-टुकड़े में
काटी जा रही थी और
उसका हर टुकड़ा
करोड़ों में बिक रहा था
खरीदारों की भीड़
नीचे शहर बन गई थी
और लगा जैसे मेरे ही शरीर का
हर हिस्सा कट-कट कर बिक रहा हो
मेरी आंखें, मेरा हृदय और सबकुछ,

मैंने पहाड़ों की चोटी पर से देखा
अपनी पीढि़यों का भविष्य
बांस बाजार लेकर बेचता भविष्य
और मैंने छुटते ही मशीन के पंजों से
उठा लिया बांस
इस बार ये बांस बाजार नहीं जाएंगे
जंगलों के अंदर अब बांस
बनेंगे हर हाथ का तीर-धनुष
और तब
पहली बार समझ में आया
मेरे पूर्वजों के रक्त से सिंचित
पहाड़ों पर उगे
असंख्य बांसों का रहस्य............।।
.............................................................
- जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 10.10.2014



(कुरूआ - पहाड़ पर खेती के लिए घेरी गई जमीन - बाड़ी)

विकास की पटरी पर एक सुबह
.........................................
अपने जीवन के 
अतीत की पटरी पर
चलते हुए लगा 
अतीत का अतीत ही रहना 
शायद अच्छा होता है 

जैसे ठहरे वक्त के 
ठहरी स्मृतियों की बाइस्कोप में
चटखदार आकृतियों को
घुमा-घुमा कर देखते रहना
और हर बार उसे वैसा ही पाना

पर अचानक नजर आता है
हकीकत की जमीं पर
उन खूबसूरत आकृतियों का
एक दिन गायब हो जाना 
मानो अतीत की पटरी पर
किसी धड़धड़ाती रेल की तरह
बदले वक्त का आना 
और काटते हुए निकल जाना.
अतीत-वर्तमान को दो हिस्सों में

तब यह और भी 
वीभत्स हो जाता है  जब 
उस अतीत को अपने अंदर 
वर्षो से विरासतों की तरह 
पाला-पोसा, सहेजा गया हो
और उन अतीतों का वर्तमान 
विकास की पटरियों पर
एक सुबह कटा मिले
बेजान, निष्प्राण.....

.........................................
जसिन्ता केरकेट्टा, 
दिनांक . 16.10.2014


विकास की पटरी पर एक सुबह
.........................................
अपने जीवन के
अतीत की पटरी पर
चलते हुए लगा ...

अतीत का अतीत ही रहना
शायद अच्छा होता है

जैसे ठहरे वक्त के
ठहरी स्मृतियों की बाइस्कोप में
चटखदार आकृतियों को
घुमा-घुमा कर देखते रहना
और हर बार उसे वैसा ही पाना

पर अचानक नजर आता है
हकीकत की जमीं पर
उन खूबसूरत आकृतियों का
एक दिन गायब हो जाना
मानो अतीत की पटरी पर
किसी धड़धड़ाती रेल की तरह
बदले वक्त का आना
और काटते हुए निकल जाना.
अतीत-वर्तमान को दो हिस्सों में

तब यह और भी
वीभत्स हो जाता है जब
उस अतीत को अपने अंदर
वर्षो से विरासतों की तरह
पाला-पोसा, सहेजा गया हो
और उन अतीतों का वर्तमान
विकास की पटरियों पर
एक सुबह कटा मिले
बेजान, निष्प्राण.....

.........................................

जसिन्ता केरकेट्टा,
दिनांक . 16.10.2014




काली खेतें कोड़ता बचपन
......................................

बचपन बचाने के
हजार दावों की खेतों में ...

भूखा बचपन काले सोने कोड़ रहा
और सोते हुए भी माथे पर शिकन है
जरूरत से ज्यादा खाए हुओं के कि
कौन कम्बख्त उनकी नींदें तोड़ रहा ,

उनके घर के पिछवाड़े
बेपरवाह बचपन
अंधेरी राहों में बिखरी कालिखों से
अपना चेहरा पोत रहा
गुनाह की फसलें उगाने को
विकास के नाम उनकी
तैयार काली खेतें जोत रहा,

जब हो चुके हों
काले सोने की चमक से वो अंधे
कहां दिखेगा
दौड़ती हुई विकास की गाडि़यों पर
बचपन कैसे बढ़ रहा है बनकर " गुंडे "
जश्न है अचानक जागकर देख
अपनी छत पर लहरते ‘नोबल’ के झंडे ,

बिक रहा है बचपन बाजारों में
कोयले की चंद बोरियों के साथ
कौड़ी के दाम
और दुनिया कर रही सलाम
उस बचपन के नाम.......।।
..............................................
जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक. 21.10.2014



(" गुंडे " किसी ने ये फिल्म देखी होगी तो स्पष्ट होगा कि जरूरत से ज्यादा खाकर डकारते लोगों की भीड़ में कैसे बचपन अपनी भूख मिटाने को दौड़ती कोयले की गाडि़यों में बनकर निकलता है "गुंडे".
पैनम के रास्तों पर दिखा ऐसा ही बचपन और तकलीफ की कुछ गाढ़ी परतें रात कागज पर उतरती गई।)
आक्रोशित संथाल के जंगल
.......................................

जब-जब अपमान की आंच ने
 अस्तित्व की आत्मा को जलाया है
उसके होने पर प्रश्नचिन्ह लगाया है
 हूल के हजारों वंशजों ने 
 जले हुए जंगल में तब-तब
" लो बीर बैसी " बुलाया है,

" लो बीर बैसी " में बैठ
 आज विचार रहीं हैं चारो दिशाएं
 कैसे रूकेंगी उनके सीमानेां पर
 सेंधमारी की बढ़ती तेज हवाएं,

चारो दिशाओं से
 जलते जंगल में 
 शब्द बज रहे नगाड़ों से
 जिसकी अनुगूंज जैसे
 लौट रही टकराकर
 हर शब्द के पीछे खड़ी 
 दूर कहीं 
 इतिहास की दीवारों से
 पूर्वजों की  रक्त से लाल आंखें 
 देख रही हैं आज कैसे 
 दामिन-इ-कोह जल रहा है
 प्रहरियों के दोहरे व्यवहारों से,

" लो बीर बैसी " में आकर 
 वो कारण बताएंगे 
 जिसने दामिन-इ-कोह की 
 सीमाओं को लांघना चाहा है 
 खून बहाकर बचाए अस्तित्व की 
 उपज खाते हूल वंशजों को 
 अपने नए कायदों की 
 जंजीरों से बांधना चाहा है,

जल रहे जंगल की 
 लपटें रही हैं आज पुकार
 जो नहीं माना किसी ने इस बार 
" लो बीर बैसी " का फरमान 
 आक्रोशित जंगल कर उठेगा 
 फिर एक बार " हूल का आह्वान "।।
.................................................

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक- 26.10.2014

( लो बीर बैसी - ये शब्द संथाली के हैं, जिसका अर्थ है "जला हुआ जंगल"। जब अस्तित्व व अधिकारों के सेंधमार सीमाएं लांघने लगते हैं, तब संताल लो बीर बैसी अर्थात एक बड़ी बैठक बुलाते हैं। इसके तहत उनके अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले को बुलाकर स्पष्टीकरण मांगा जाता है। लो बीर बैसी की शर्तो को न मानने वाले पर सीधे तीर चलाने और आक्रमण करने का नियम है। 
 आज संताल के जंगल आक्रोशित हैं क्योंकि केंद्र सरकार ने एसपीटी एक्ट में फेरबदल की मंशा जाहिर की है। संताल मानते हैं कि यह फेरबदल उनके अस्तित्व पर अपमान की आंच है।)

( दामिन-इ-कोह - पर्षियन शब्द हैं। 1824 से 1833 तक अंग्रेजों ने संताल-परगना के जिस इलाके का सीमांकन किया वह दामिन-इ-कोह कहलाता है। इसे बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त रखा गया जहां संथाल परगना काश्तकारी कानून प्रभावी है। यहां आज भी उनकी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था सशक्त है। )


आक्रोशित संथाल के जंगल
.......................................

जब-जब अपमान की आंच ने
अस्तित्व की आत्मा को जलाया है...

उसके होने पर प्रश्नचिन्ह लगाया है
हूल के हजारों वंशजों ने
जले हुए जंगल में तब-तब
" लो बीर बैसी " बुलाया है,

" लो बीर बैसी " में बैठ
आज विचार रहीं हैं चारो दिशाएं
कैसे रूकेंगी उनके सीमानेां पर
सेंधमारी की बढ़ती तेज हवाएं,

चारो दिशाओं से
जलते जंगल में
शब्द बज रहे नगाड़ों से
जिसकी अनुगूंज जैसे
लौट रही टकराकर
हर शब्द के पीछे खड़ी
दूर कहीं
इतिहास की दीवारों से
पूर्वजों की रक्त से लाल आंखें
देख रही हैं आज कैसे
दामिन-इ-कोह जल रहा है
प्रहरियों के दोहरे व्यवहारों से,

" लो बीर बैसी " में आकर
वो कारण बताएंगे
जिसने दामिन-इ-कोह की
सीमाओं को लांघना चाहा है
खून बहाकर बचाए अस्तित्व की
उपज खाते हूल वंशजों को
अपने नए कायदों की
जंजीरों से बांधना चाहा है,

जल रहे जंगल की
लपटें रही हैं आज पुकार
जो नहीं माना किसी ने इस बार
" लो बीर बैसी " का फरमान
आक्रोशित जंगल कर उठेगा
फिर एक बार " हूल का आह्वान "।।
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जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक- 26.10.2014



( लो बीर बैसी - ये शब्द संथाली के हैं, जिसका अर्थ है "जला हुआ जंगल"। जब अस्तित्व व अधिकारों के सेंधमार सीमाएं लांघने लगते हैं, तब संताल लो बीर बैसी अर्थात एक बड़ी बैठक बुलाते हैं। इसके तहत उनके अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले को बुलाकर स्पष्टीकरण मांगा जाता है। लो बीर बैसी की शर्तो को न मानने वाले पर सीधे तीर चलाने और आक्रमण करने का नियम है।
आज संताल के जंगल आक्रोशित हैं क्योंकि केंद्र सरकार ने एसपीटी एक्ट में फेरबदल की मंशा जाहिर की है। संताल मानते हैं कि यह फेरबदल उनके अस्तित्व पर अपमान की आंच है।)



( दामिन-इ-कोह - पर्षियन शब्द हैं। 1824 से 1833 तक अंग्रेजों ने संताल-परगना के जिस इलाके का सीमांकन किया वह दामिन-इ-कोह कहलाता है। इसे बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त रखा गया जहां संथाल परगना काश्तकारी कानून प्रभावी है। यहां आज भी उनकी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था सशक्त है। )
बागी बचपन
.....................
वहां उजाले के झूठे वादे के पीछे
अंधरे दरवाजे की फांक से
बचपन की जिंदगी...

जैसे चुपके से रात भागी हो
कुहासों की चादर ओढे खड़ी
दरवाजे पर उम्मीदों की भोर
अपने बच्चों की
उजली सांसों को देखती है
बचपन के वजूद का साथ छोड
असमय जवान होते हुए
और महसूसती है जाने कब
अपने अंदर अपना ही कोई हिस्सा
जैसे अनजाने में हो गया बागी हो।।
...............................................
जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक . 11.11.2014