Wednesday, 18 June 2014

पेड़ों पर लटकते तुम्हारे सपने



पेड़ों पर लटकते तुम्हारे सपने


                  
पेड़ों पर लटकते तुम्हारे सपने
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उम्मीदों के वट वृक्षों पर
तुम जिनके लिए
धागे, चूडि़यां और
मन्नतों के रूमाल टांगती रहीं,

देख लो आज वो
कैसे तुम्हारे ही कोख का
लेकर आश्रय
पालकर अपने वंश का अंश
उन अंशों में से
किसी कचड़े की तरह
छांटते हैं कन्या भ्रूणों को,
फिर भी बचकर जो
गाहे-बगाहे जबरन
उग आती हैं
पुरानी हवेली के दीवारों को
चीरकर रास्ता बनाती हुई
किसी विशाल वृक्ष की तरह
तुम्हारे इस विरोध से
तिलमिलाकर लटका रहे हैं
तुम्हारे कोख से
तुम्हारी ही शक्लो सूरत में
जन्म लेने वाले तुम्हारे
मासूम अस्तित्व को...............,

किस हद तक
और
कब तक
तुम चुप रहोगी ?
उठो और रोक लो
अपने सपनों को
पेड़ों पर इस कदर टंगने से।।

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