Wednesday, 18 June 2014

नदी का अस्तित्व



          
नदी का अस्तित्व
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वो कलकल करती पुसारो नदी
जिसकी गोद में
कभी अठखेलियां की थी हमने
देखती हूं अब
बढ़ती आबादी की प्यासी राक्षसी
लपलपाती जीभ ने जैसे
चूस लिया हो सारा पानी,

उसके तन पर लिपटी
दूर तक पसरी
उजली साड़ी रेत की
आहिस्ता-आहिस्ता जैसे
उसकी देह से किसी ने
खींच ली हो बेहयायी से
हो गई है वो बिल्कुल नंगी,

अब भी चैन नहीं लूटने वालों को
उसके सीने पर दिन-दोपहर
चला रहे हैं बेरहमी से फावड़े
उखाड़ लेने को उसकी देह से
लाल मांस सी मिट्टी के लोंधे,

इस निर्दयता के बाद उसकी
सूखी खोखली देह पर
जैसे डाल दिया गया है
कोई चिथड़े का टुकड़ा
एक पुल बनाकर
जो उसके लुटे अस्तित्व पर
हंसता रहता है दिन-रात।।

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