Wednesday, 18 June 2014

एक अभ्यारण्य इंसानों का



एक अभ्यारण्य इंसानों का
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दिन भर की दिहाड़ी के बाद
थक कर सोता हुआ सलगु पहाड़िया
भोर की ओस में
और गहरी हो चुकी नींद में
जबरन देह से चादर खिंच जाने की तरह
देखता है अपने पहाड़ों को
अपने हाथ से खिसकते हुए,
एक क्रूर सपना जो
सूरज उगने से पहले
और गहरे हो चुके अंधेरे में
पलकर, भोर के उजाले के साथ
सच्चाई की चादर ओढ़ लेने को है,

हां यही क्रूर सपना अब
सच्चाई का रूप धर रही है
हरियाली की चादर छिनते जंगलों में,
बेगुनाह पहाड़ों के सिर मुंड रहे
उनकी देह पर हजारो घाव पड़ रहे
कई सालों के लीज की मशीन से
रेते जाने से धीरे-धीरे
अपने वंशजों की लंबी श्रृंख्ला से
काटकर अलग किए गए
अस्तित्व खोते पहाड़ों पर,

लुप्त होती प्रजातियां हैं
जंगल - पहाड़ छीनकर
कंक्रीट के शहर में खदेड़ दिए गए
किसी डरते, सकपकाते, गुर्राते तेंदूए की तरह
जिनके छोटे बच्चे ही.. ही.. ही.. करते
सियारों की शोर के बीच
भेड़ियों के झुंड द्वारा
झाड़ियों में खींच लिए जा रहे हैं,

लुप्त होती प्रजातियों के लिए
एक दिन रंगे सियार
कोई बड़ा स्पेशल पैकेज लाएंगें
और बनाने की कोशिश करेंगे
कोई इंसानी अभ्यारण्य.....
और इसे भी दुनिया को दिखाएंगें
कहकर
यह है विकास का नया माॅडल ।।

नदी का अस्तित्व



          
नदी का अस्तित्व
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वो कलकल करती पुसारो नदी
जिसकी गोद में
कभी अठखेलियां की थी हमने
देखती हूं अब
बढ़ती आबादी की प्यासी राक्षसी
लपलपाती जीभ ने जैसे
चूस लिया हो सारा पानी,

उसके तन पर लिपटी
दूर तक पसरी
उजली साड़ी रेत की
आहिस्ता-आहिस्ता जैसे
उसकी देह से किसी ने
खींच ली हो बेहयायी से
हो गई है वो बिल्कुल नंगी,

अब भी चैन नहीं लूटने वालों को
उसके सीने पर दिन-दोपहर
चला रहे हैं बेरहमी से फावड़े
उखाड़ लेने को उसकी देह से
लाल मांस सी मिट्टी के लोंधे,

इस निर्दयता के बाद उसकी
सूखी खोखली देह पर
जैसे डाल दिया गया है
कोई चिथड़े का टुकड़ा
एक पुल बनाकर
जो उसके लुटे अस्तित्व पर
हंसता रहता है दिन-रात।।

तुम्हारे योद्धा होने की कहानी



तुम्हारे योद्धा होने की कहानी
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ओ सांवरी,
तुम्हारे माथे पर ये जख्म कैसा
कोई गाढ़ा लाल सा
जैसे जम गया हो रक्त
माथे पर तुम्हारे न जाने
कई सदियों से पुराने घाव सा
और तुम उसपर डाले फिरती हो
डहडहाता लाल रंग का सिंदूर
जिससे छुपा सको जख्म अपने
और तुम खुश हो जमाने को
देकर अपने सुहागन होने का प्रमाण,

देखो न गौर से सांवरी
उनके बदन पर तुम्हारे लिए
कौन-कौन से और कितने प्रमाण हंै ?
क्या कोई पुरानी निशानी
रख छोड़ी है उसने ?
जिसपर जमे परतो को खुरचकर
तुम्हारी नई पीढि़यां पढ़ सके, कभी
तुम्हारे योद्धा होने की कहानी,

ओ सांवरी,
उनके कई गुनाहों की
आड़ी-तिरछी हजार लकीरें
अपने बदन पर लिए तुमने
क्यों सीख लिया उसपर
रेशमी टुकड़े डालकर उन्हें छुपाना,

देखो इन सफेद कपड़ों के पीछे
तुम्हारे बदन पर हिंसा की खरोंचें हैं
उन खरोंचों से निकलते लाल खून को
तुम अपने मन के चुल्हे का अंगार बना लो
जिसपर खुद को तपाकर गढ़ सको एक खंजर
जिससे भविष्य की पहाड़ों पर खोद सको़
तुम्हारे जीवन जंग के मैदान में
हमेशा से एक योद्धा होने की कहानी.................।।

आदिवासी गोत्रो का अपमान



आदिवासी गोत्रो का अपमान
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जो दावा करते हैं
झारखंड की जमीन से
जुड़े होने का
बिफर उठते हैं
भितरी-बाहरी के सवाल पर
ताल ठोंक कर कहते हैं
यहां की मिट्टी
संस्कृति से उनका जुड़ाव है,

बेच-बेचकर झारखंडी
जमीन के मुद्दे,
आदिवासियों की जिंदगी
के किस्से, जिन्होंने यहां
रोटी के अलावा भी
बहुत कुछ हासिल किया,

वो समीक्षा करें
जो उड़ाते हैं मखौल
आदिवासी गोत्रो का
किड़ो को हेगड़े,
खाखा को शाखा
कच्छप को कश्यप
लिखकर कहते हैं
भई गलती हो गई,

क्या ऐसे ही भविष्य में
तैयार होगा आदिवासियों का
जातिप्रमाण पत्र ????