Friday, 14 March 2014

कान्हा के डोंडियाटोला में दम तोड़ती सरकारी योजनाएं

डोंडियाटोला गांव

- बेबसी में बन रहे बंधुआ मजदूर
- आर्थिक व समाजिक तरक्की से महिलाएं कोसों दूर
- शिक्षा, विकास और संचार क्रांति की पड़ती धुंधली किरणें


डोंडियाटोला 11 ंमार्च 14 :  देश का प्रसिद्ध अभ्यारण्य कान्हा, जहां हजारो वर्ग फीट जंगल के दायरे में विभिन्न प्रजातियों के दुर्लभ वन्यजीव बसे हुए हैं। यहां से सरकार को करोड़ों रूपये का राजस्व भी मिलता है,
लेकिन डोंडियाटोला को ख्यातिलब्ध अभ्यारण्य कान्हा का पड़ोसी गांव होने का कोर्इ फायदा न मिला । विकास से कोसों दूर इस गांव में रोजगार का आभाव, सरकारी योजनाओं का सही प्रचार-प्रसार न होना सहित ऐसी दर्जनों परेशानियां हैं, जो अपनी उपेक्षा की दास्तान खुद ही बयां कर रही  है।  गांव में प्रवेश करते ही हमारी मुलाकात धुर्वे परिवार के तीन सदस्यों से हुर्इ। जिसमें परिवार की एक ज्येष्ठतम मुखिया महिला फूलोबार्इ धुर्वे, उसकी बड़ी बहु दसवंती, जो सालों पहले विधवा हो चुकी है और उसके छोटे बेटे चंदन से हुर्इ, जिसे एक स्थायी रोजगार की तलाश  है। रोजी मजदूरी और आंगनबाड़ी से होने वाले आय पर आश्रित 9 सदस्य के इस परिवार से बात करने पर गांव के लगभग 70 परिवारों में रहने वाले करीब 450 लोगों की जिंदगी और तकलीफों का प्रारंभिक ज्ञान हुआ।
डोंडियाटोला की फूलोबार्इ
 फूलोबार्इ धुर्वे आंगनबाड़ी के करीब 25 बच्चों के लिए खाना पकाती है और उनका ख्याल रखती हैं। बड़ी बहु दसवंती विधवा हैं जो कि शादी के महज डेढ़ साल बाद और आज से करीब 20 साल पहले अपना सुहाग खो चुकी है। वो घर और खेत का सामान्य काम करती हैं। इसी परिवार का चंदन धुर्वे अपने परिवार का भरण-पोषण  लकड़ी काटकर, निजी ठेकेदारों के यहां मिटटी खोदने का काम कर करता  है, लेकिन उसके चेहरे पर दिखने वाली चिंता की लकीरें इस बात को साफ बयां करती हैं कि वह अपने उम्र के चौथे दशक में पहुंचने के बाद भी स्थायी रोजगार की तलाश कर रहा है। 9 सदस्यों वाले इस परिवार के पास रियायती दर पर खादयान्न उपलब्ध कराने वाला सिर्फ एक ही राशन कार्ड है जिसपर हर महिने दो रूपये प्रतिकिलो की दर से 15 किलो चावल, एक रूपये प्रतिकिलो के दर से पांच किलो गेहूं, 17 रूपये लीटर की दर से दो लीटर मिटटी तेल और 14.50 रूपये किलो की दर से डेढ़ किलो शक्कर प्रतिमाह मिलता है। जाहिर है 9 सदस्यों के इस परिवार के लिए इतना खादयान्न उंट के मुंह में जीरा के बराबर होगा। फिर भी संघर्ष का रास्ता अखितयार कर यह परिवार अपना गुजारा कर रहा है। चर्चा के दौरान पता चला कि गांव में सरकारी योजनाओं का व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं किया गया है। दसवंती धुर्वे 20 साल पहले विधवा हो चुकी है लेकिन आज तक उसे विधवा पेंशन के बारे में कोर्इ जानकारी नहीं है। हर महीने ग्राम पंचायत की बैठक भी होती है, लेकिन वहां इसका जिक्र भी नहीं किया जाता है। हो सकता है यह योजना गांव में संचालित हो लेकिन अशिक्षित होने के कारण इसका लाभ दसवंती की जगह दलाल उठा रहे हैं। बातचीत से पता चला कि बिचौलिए किस्म के लोग गांव के गरीब परिवार और ग्रामपंचायत के बीच मध्यस्थता करने का काम करते हैं। 
फूलोबार्इ धुर्वे की ही एक बेटी श्यामवती धुर्वे  जिसका पति सालों पहले बिना बताए उसे छोड़कर चला गया। उसका एक बेटा है जो उसके साथ ही रहता है। दोनों मां-बेटे गांव में मजदूरी का काम करते हैं। मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत भारतीय स्टेट बैंक से 70,000 रूपये का ऋण लेकर श्यामवती अपना घर बनवा रही है। श्यामवती को शासन से एक राहत मिली है कि उसे ऋण की राशि का 50 फीसदी ही किस्तों में अदा करना है, लेकिन उसे मिलने वाला हक अभी भी उसे नहीं मिला। श्यामवती जैसी महिलाओं को शासन की तरफ से परित्यक्ता पेंशन देने का प्रावधान है। श्यामवती की मां फूलोबार्इ से पता चला कि उसे भी कोर्इ पेंशन नहीं मिला है। 

अपने घर की कच्ची दिवारें तोड़ता श्यामलाल
योजनाओं से हैं अनजान
डोंडियाटोला के करीब दर्जनभर लोगों से बात करने पर पता चला कि गांव के लोग सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से आज भी अनजान हैं। वार्ड सदस्य श्यामलाल धुर्वे ने बताया पंचायती राज की योजना के तहत गांव में सड़क निर्माण, खेतों का मेड़ बंधन, तालाब का गहरीकरण का काम होता है, लेकिन डोंडियाटोला में इन सभी कार्यो का कुछ प्रतिशत ही मूर्त रूप ले सका है। नतीजा यह हुआ कि गांव के लोग दूसरे शहरों की ओर रूख कर रहें हैं और महिलाएं घर संभालने के साथ ही मजदूरी करने को मजबूर है। महिलाओं की समाजिक व आर्थिक सिथति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि निर्मल ग्राम योजना का कागजों में कि्रयान्यवंन भी हो गया और महिलाएं आज भी खुद को शर्मिंदा महसूस करवाने पर मजबूर हैं। निर्मल ग्राम योजना के तहत घर-घर शौचालय निर्माण किया जाना था। तीन साल पहले इस योजना की सुगबुगाहट भी हुर्इ लेकिन इस योजना को पूरा नहीं किया जा सका। कुछ घरों में शौचालयों के नाम पर तीन दिवारें उठा दी गर्इ और न तो उसमें दरवाजा लगा और न ही सर पर शीट। इस कारण घर में शौचालय बनने के बाद भी वह बेकार साबित हो रहा है। और कुछ घरों की सिथति यह है कि वहां पर शौचालय निर्माण का सर्वे हुआ लेकिन काम नहीं हो सका। आज भी महिलाएं शौच के लिए खेतों में जाने के लिए मजबूर हैं। स्वास्थ्य संबंधी योजना का भी इस गांव में बहुत बुरा हाल है। गांव में एक तख्ती टंगी है जिसमें द कार्बेट फाउंडेशन द्वारा सप्ताह के हर शुक्रवार को निश्शुलक चिकित्सा और जांच शिविर का उल्लेख है लेकिन गांव की पदमा उर्इके बताती है कि ऐसा कोर्इ शिविर गांव में नहीं लगता। कभी कोर्इ बीमारी होने पर उन्हें बैहर के निजी डाक्टरों के पास जाना पड़ता है या फिर अंधविश्वास से वशीभूत होकर गांव के बैगा से झाड़-फूंक का सहारा लेना पड़ता है।


अज्ञानता से बन रहे बंधुआ 
कभी घर न लौटने वाले मंजुलाल की विधवा दसवंती

बंधुआ मजदूरी जैसी कुप्रथा के अंत के लिए वर्ष 1976 में कानून तो बन गया, लेकिन उसका असर समाज पर अभी तक धरातल पर पूरी तरह से नहीं हो पाया है। डोंडियाटोला के लोग अनजाने में ही बंधुआ मजदूरी की भेंट चढ़ रहे हैं। दसवंती का पति मंजुलाल धुर्वे 20 साल पहले गांव के लोगों के साथ किसी ठेकेदार के माध्यम से किसी चांदा शहर में निर्माणाधीन सीमेंट फैक्ट्री में काम करने गया। जहां रहस्यमय तरीके से उसकी मौत हो जाती है। उसके परिवार तक सिर्फ उसके मौत की खबर आती है। मौत का कारण और मंजुलाल की लाश परिवार के लोगों को लाख कोशिशों के बाद नहीं मिल सकी। मंजुलाल की विधवा दसवंती और उसकी मां फुलोबार्इ धुर्वे कहती है कि गांव के जो लोग मंजुलाल के साथ काम करने गए, वे लोग आज भी न जाने किस डर या कौन सी लालच के कारण मंजुलाल की मौत का कारण नहीं बताते हैं। परिवार के कर्इ बार प्रयास के कारण कंपनी ने मुआवजे के तौर पर दस हजार रूपये दिए थे। उसके अलावा कोर्इ भी जानकारी धुर्वे परिवार को नहीं मिली। मंजुलाल की मौत के बाद गांव के लोग दोबारा उस कंपनी में काम करने के लिए नहीं गए। इससे सिथति स्पष्ट होती है कि बंधुआ मजदूरी की बेदी पर ही  मंजुलाल की बली चढ़ी और जान बचाकर वहां से वापस लौटे लोग दोबारा नहीं गए। समय के साथ लोग इस घटना को भूले और फिर से ठेकेदारों के माध्यम से बाहर जाकर काम करने का सिलसिला शुरू हो गया। आज भी यहां के लोगों को तय मजदूरी कीमत के हिसाब से मजदूरी नहीं मिलती, उनसे घंटों काम लिया जाता है और ठेकेदारों का डर उनकी बातों से ही साफ होता है।


पहुंच रही शिक्षा और संचार की धुंधली किरणें

 आज समूचे भारत में लोग शिक्षा की दौड़ में एक दूसरे से रेस लगा रहे हैं। संचारक्रांति का ऐसा असर है कि रिक्सा चलाने वाले व्यकित के हाथ में भी मोबार्इल है। कि्रकेट में धौनी छक्का लगाता है और बाउंड्री पर पहुंचने वाले गेंद को हर व्यकित अपने पास महसूस करता है। लेकिन डोंडियाटोला में शिक्षा और संचारक्रांति का भी व्यापक असर नहीं दिखा। युवाओं का देश कहे जाने वाले भारत के इस गांव में युवाओं की अधिकतम शैक्षणिक शिक्षा बारहवीं पास तक की ही है और जिनमें शिक्षा पाने की ललक है वो करीब 15 किलोमीटर की दूरी तय कर कर बर्इहर के कालेज में जाते हैं। गांव के आने-जाने का रास्ता भी ऐसा है कि राष्ट्रीय वन कहे जाने वाले कान्हा के पड़ोसी होने पर भी डोंडियाटोला को शर्म ही महसूस होगा। केंद्रीय वनमंत्रालय को इस वन से सालाना करीब 20 करोड़ का राजस्व प्राप्त होता है। इसके साथ ही यहां संचालित दर्जनों छोटे-बड़े होटलों को भी अच्छी आमदनी होती है। बावजूद इसके डोंडियाहाल पहुंचने वाली खास्ताहाल सड़के राज्य ही नहीं केंद्र सरकार को भी मुंह चिढ़ाती नजर आती है। गांव के कुछ लोगों के पास मोबार्इल तो आ गया है लेकिन इसे देशव्यापी संचार क्रांति का दस फीसदी भी नहीं माना जा सकता। 70 घरों वाले इस गांव के करीब दस घरों में ही लोग टीवी देख पाते हैं। खैर सिथति जैसी भी हो लेकिन डोंडियाटोला के लोग शिक्षा और संचार की इस धुंधली किरण में ही अपने भविष्य को उज्जवल महसूस करने की कोशिश कर रहे हैं। यहां पर युवा पत्रकार रविश कुमार की इन लाइनों को दोहराना लाजिमी है कि वल्र्ड कप कि्रकेट में धोनी का लगाया हुआ अंतिम छक्का काश डोंडियाटोला में गिरता तो लोगों के साथ ही सरकार की नजर भी इस गांव में पड़ती और शायद यह गांव कान्हा वन का पड़ोसी गांव होने का गौरव महसूस कर पाता। 



रिपोर्ट राइटिंग - रमाकांत चतुर्वेदी, जसिन्ता केरकेटटा
फोटो - सैकत चटटोपाध्याय।।

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