Friday, 7 February 2014

झारखंड : नाबालिग मुखबीरियों की आड़ में नक्सलवाद से लड़ती पुलिस

खूंटी  का बुधडीह गांव जहां सरयू पाहन सहित करीब 40 परिवार रहा रहा।
बुधडीह में रास्ते किनारे उन एसपीओ की ससनदिरी जो नक्सलियों द्वारा मारे गए।
जसिन्ता केरकेट्टा, रांची

झारखंड में नक्सलवाद से निपटने के लिए राज्य ही नहीं केंद्र सरकार भी कई तरह के तरीके अपना रही है, जिसमें ग्रीनहंट प्रोजेक्ट, आईपीए प्रोजेक्ट सहित कई आॅपरेशन शामिल हैं। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को पुरस्कार और पैसे का लालच भी दिया जाता है। इसके अतिरिक्त नक्सलियों का पता लगाने, उनकी गतिविधियेां पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर उनकी हत्या कराने के लिए इन दिनों गांवों के नाबालिग बच्चों का इस्तेमाल भी बतौर मुखबीर या कहें एसपीओ किया जा रहा है। ऐसे एसपीओ में 14 साल से लेकर 16 साल के वैसे बच्चे भी शामिल हैं, जिनकी मदद से नक्सलियों के कुछ जोनल कमांडर पकड़े गए और उनसे कुछ की हत्या भी करवा दी गई है। झारख्ंाड के सभी 24 जिले नक्सलवाद की समस्या से प्रभावित हैं। खूंटी का अड़की प्रखंड नक्सलियों का गढ़ माना जाता है। इस इलाके में नक्सलियों के सबसे प्रमुख व्यक्ति, कुंदन पाहन का दस्ता सक्रिय है। कुंदन पाहन कैसा दिखता है, आज तक किसी को नहीं मालूम। झारखंड पुलिस उसे पकड़ने के लिए अब भी जी जान से जुटी है।

नक्सली और पुलिस दोनों कर रहे बच्चों का इस्तेमाल

इस क्षेत्र में एक ओर नक्सली गांवों से कच्ची उम्र के बच्चों को अपने संगठन में शामिल करने के लिए ले जाते हंै, वहीं पुलिस भी गांवों के बेकार घूमते व विकल्पहीन नाबालिगों को एसपीओ बना कर उनका इस्तेमाल करती है। फर्क सिर्फ इतना ही है कि नक्सली उन्हें जो हथियार देते हैं, वह गैरलाइसेंसी होता है, वहीं पुलिस जो हथियार थमाती है, वह लाइसेंसी। जबकि, सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्ट आदेश है कि खतरनाक कामों के लिए विद्यार्थियों व नाबालिगों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी इस मामले में चुप्पी साध रखी है।
नक्सल प्रभावित क्षेत्र में नक्सली और पुलिस मुखबीर, एसपीओ आमने सामने हैं। पुलिस प्रशासन का संरक्षण पाने वाले नाबालिग एसपीओ के हाथों में रिवाल्वर है, जो उनके निर्देश पर नक्सलियों की हत्या तक करते हैं, वहीं मौका मिलते ही नक्सली भी पुलिस की मदद करने वाले इन एसपीओ को अपने निशाने पर लेते हैं। काम निकल जाने पर पुलिस ऐसे बच्चों को एसपीओ मानने से इंकार कर देती है। तब एसपीओ बने बच्चे न घर के रह जाते हैं न घाट के। उनकी पढ़ायी छूट चुकी होती है। नक्सलियों से बचने को मारे-मारे फिरते हैं और अंत में मारे जाते हैं।

मजबूरी का फायदा उठाती पुलिस

ग्रामीण जब नक्सलियेां से प्रताडि़त हो कर पुलिस की शरण में जाते हैं, तब ग्रमीणों को सुरक्षा देने के बजाय पुलिस कहती है कि यदि हमारी मदद करोगे तभी हम तुम्हारी मदद करेंगे। विकल्प नहीं होने के कारण कई बार ग्रामीण पुलिस की मदद करना स्वीकार कर लेते हैं। माता-पिता कुछ कहने की स्थिति में नहीं होते। पढ़ने -लिखने वाले ये लड़के- लड़कियां देखते ही देखते एसपीओ बना लिए जाते हैं। पैसे के साथ उनके हाथों में हथियार थमा दिये जाते हैं।

16 साल के काना को बना लिया एसपीओ

राज्य के खूंटी जिले के खूंटी प्रखंड से 20 किलोमीटर दूर एक गांव चिंचल है। इस गांव के रहने वाले सरजू पहान  जड़ी-बुटियों से लोगों का र्इलाज करते हैं। नक्सली गतिविधियों द्वारा गांव के लोग भी परेशान रहते थे। इसी के खिलाफ सरजू पाहन ने आवाज उठार्इ थी। गांव के लोग दो भागों में बंट रहे थे। उनका आरोप था कि नक्सली गतिविधियों से गांव तक विकास के कार्य नहीं पहुंच पा रहे। उनका मानना है कि नक्सली हिंसा में सबसे ज्यादा ग्रामीण पिसते हैं। सरजू के अनुसार उसका इस तरह बैठकों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना ही कुछ लोगों की आंखों में खटका पैदा करने लगा था।
दो साल पहले गांव के लोग बैठक कर रहे थे अचानक नक्सलियों के झुंड ने आकर उन्हें घेर लिया। सरजू पहान और उसके बेटे काना मुंडा (बदला हुआ नामद्) के हाथ बांध कर वे उन्हें जंगल की ओर ले गये। काना मुंडा की उम्र 16 साल थी। रात होने पर उन्हें लापुंगडीह गांव में रखा गया। दूसरे दिन सुबह दोनों को पहाड़ पर ले गए। वहां नक्सलियों ने मशविरा किया, फिर उन्हें बारिगेड़ा जंगल ले गए। वहां पहुंच कर दो नक्सलियों ने उन्हें खूब पीटा। इसके बाद उन्हें मरंगहदा गांव स्थित शिशु मंदिर स्कूल की ओर ले जाने लगे। वहां उन्हें मार कर फेंकने की योजना थी। रास्ते में दोनों के आगे और पीछे नक्सलियों का दल चल रहा था। मौका पा कर अचानक दोनों जंगल के पेड़ों की ओट लेकर भाग निकले। नक्सलियों ने उनपर गोलियां चलाई लेकिन दोनो पिता-पुत्र झाडि़यों में छिपते हुए किसी तरह भाग निकलने में सफल रहे।
अपने गांव पहुंचने पर गांव के सभी लोग उनके साथ रात भर रहे। खूंटी में रहने वाले उनके परिजनों ने उन्हें शहर जा कर पुलिस को मामले की जानकारी देने की सलाह दी। वे लोग खूंटी गए और पूर्व खूंटी एसपी मनोज कौशिक से मदद मांगी। तब, एसपी मनोज कौशिक ने कहा " हमारी मदद करेंगे तभी हम आपकी मदद कर सकते हैं। " कोई विकल्प नहीं देख कर उन्होंने हामी भर दी।  देखते ही देखते उनका 16 वर्षीय बेटा काना मुंडा एसपीओ बन गया। सरजू कहते हैं " मजबूर नहीं होते तो हमारे बच्चे को एसपीओ बनने की कोई जरूरत नहीं थी।"
काना मुंडा बताता है कि उसे पूर्व खूंटी एसपी मनोज कौशिक ने एसपीओ के रूप में काम करने से पहले 5000 रूपया दिया था और मोबाईल भी। उसे हथियार भी दिया गया और नौकरी का आश्वासन भी मिला। उसने एसपी मनोज कौशिक के साथ दो माह तक काम किया। फिर उसे एडीजी रेजी डुंगडुंग के पास रांची लाया गया। काना मुंडा ने उनके साथ भी एक महीने तक काम किया। किस तरह का काम? पूछने पर उसने बताया कि पुलिस के नक्सल आॅपरेशन में वह साथ जाता था।
काना मुंडा के साथ दो और साथी मंगरा लोहरा और महेश मुंडा भी थे। तीनों ने रांची के एसएसपी प्रवीण कुमार के साथ भी दो-तीन महीने तक काम किया। तीनों लड़के नक्सली संगठनों की गतिविधियों की जानकारी पुलिस को देने लगे। तैमारा घाटी के दुर्दांत नक्सली राजेश मुंडा को पूर्व एसएसपी प्रवीण कुमार के आदेश पर उसने ही मारा था। बाद में पुलिस फोर्स ने आकर शव के सामने तीन-चार फायरिंग की और राजेश मुंडा के इनकाउंटर में मारे जाने की घोषणा कर दी। पूर्व एसएसपी प्रवीण कुमार के  निर्देश पर काना मुंडा ने पुलिस अधिकारी अनूप इंदवार के हत्यारे जोनल कमांडर संतोष मुंडा को भी पकड़वाया था। इस काम के लिए उसे 5000 और दूसरे सदस्यों को 3000 रूपये मिलते थे।

पुलिस के लिए बने दूध की मक्खी

खूंटी के पूर्व एसपी तमिल वाणन के प्रभार लेने पर जब काना मुंडा व उसके साथी उनके पास गए थे तब उन्होंने कहा कि इसका कोई प्रमाण नहीं है कि वे एसपीओ हैं। उनका कहना था अब एसपीओ की ओर से कोई रिपोर्ट नहीं मिलती। इसके बाद इन लड़कों को पैसा मिलना बंद हो गया। काना मुंडा ने इसकी शिकायत एडीजी रेजी डुंगडुंग से की, लेकिन इसके बावजूद बात नहीं बनी। इससे एसपीओ बनकर पुलिस की मदद करने वाले लड़कों में निराशा फैल गयी। काना मुंडा व इलाके के करीब 30-32 लड़के पुलिस की मदद करते थे। इनमें से कई की उम्र 10 से 16 साल की थी। कुछ 20 से 25 साल के युवा भी थे। आज यह पूरी टीम बिखर गयी है। वे अपने गांव नहीं लौट सकते। अब पुलिस को उनकी जरूरत नहीं है और उनका अपना गांव ही उनके लिए सुरक्षित नहीं रह गया। काना मुंडा के परिवार के साथ करीब 40 अन्य परिवारों ने भी अपना गांव चिंचल छोड़ दिया है। उस गांव की अपनी 40 एकड़ जमीन छोड़ कर खूंटी से 4 किलोमीटर दूर बुधडीह गांव में 4 डिसमिल जमीन लेकर रहते हैं।
काना मुंडा ने बताया कि एसपीओ का काम करने वाले कुछ लड़कों की हत्या नक्सलियों ने कर दी है। इनमें से एक रपु मुंडा था जिसे सोयको के सप्ताहिक बाजार में नक्सलियों ने मार डाला। उसके परिवार को सरकार की ओर से कोई मुआवजा नहीं मिला न ही घटना को अंजाम देने वालों को ही पकड़ा गया। उसके दल के  अन्य लड़के इश्वरी टूटी, विक्रम लोहरा व संजय पुर्ती भी नक्सलियों द्वारा मार दिये गये। ऐसे लड़कों की हत्या होने पर उल्टा उन्हें ही नक्सली बताकर पल्ला झाड़ने का काम हुआ है।
नक्सलियों के खिलाफ एसपीओ द्वारा कोई एक्शन लेने पर पुलिस कई बार एसपीओ पर ही कार्रवाई करती है। लेकिन नक्सलियों  द्वारा एसपीओ पर हमलों पर वह कोई कार्रवाई नहीं करती। एसपीओ के रूप में कार्यरत पांच छह युवकों को पुलिस ने खूंटी जेल में भी डाला था। वे एक साल तक जेल में रहे और अब जमानत पर बाहर हैं। काना मुंडा व उनके अन्य साथियों ने पिछले दो साल से एसपीओ का काम छोड़ दिया है। पुलिस ने उन्हें दिये हथियार भी वापस ले लिया है। खूंटी के सेरेंगडीह गांव के डाड़ु मुंडा की उम्र 15 साल की है। उसकी पढ़ाई छूट चुकी है। वह भी काना मुंडा के साथ एसपीओ के रूप में पुलिस की मदद करता था। अब उसने भी एसपीओ का काम छोड़ दिया है। दुलमी गांव के लोदरो पहान की उम्र 17 साल है। उसकी पढ़ाई भी छूट चुकी है। वह भी एसपीओ था और
काना मुंडा के साथ ही काम करता था। अब वह गाय-बैल चराता है।

हथियार देने का प्रावधान नहीं: पूर्व खूंटी एसपी

खूंटी के अड़की प्रखंड में वीरबंकी गांव है, जो ‘लाल कोरीडोर’ का इलाका है। इस इलाके से नक्सलियों के सफाये के लिए अभियान चलाया जा रहा है। अड़की प्रखंड कार्यालय से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर थाना है।  थाने से कुछ दूरी पर पंचायत भवन और मिलिट्री के जवानों का निवासस्थल है। लेकिन इस इलाके में राज्य और केंद्र सरकार के कानून नहीं चलते। पूरा इलाका नक्सलियों के कब्जे में है। वीरबंकी के विभिन्न गांवों से निकल कर अपनी पढ़ायी जारी रखने के लिए खूंटी आने वाली लड़कियों को पुलिस द्वारा पैसे और पुलिस में नौकरी का लालच दिया जाता है। तीन-चार हजार रूपये महीना देने की बात कहकर एसपीओ के रूप में उनका इस्तेमाल होता है। सिर्फ वीरबांकी इलाके में ही करीब छह हजार एसपीओ हैं,  जिनमें से ज्यादातर स्कूल बच्चे हैं।
इसके विपरीत एसपीओ बनाए जाने के संबंध में पूर्व ख्ूांटी एसपी डाॅ.एम तमिल वाणन से बात करने पर वे कहते हैं कि  किसी भी एसपीओ को हथियार देने का प्रावधान नहीं है। एसपीओ
ब्द को लोगों ने आज गलत तरीके से पेकिया है जबकि यह पुलिस के बराबर ही क्ति रखने वाला और समाज में शांति कायम करने में बराबरी का हिस्सेदारी निभाने वाला पोस्ट है। मध्यप्रदेष और छतीसगढ़ की घटनाएं झारखंड से अलग थी। लेकिन झारखंड में एसपीओ को हथियार नहीं दिए जाते। जहां तक एसपीओ बनाने के सवाल हैं पुलिस एक्ट - 17, 18, 19, 20 में इसका प्रावधान है कि हम विशेष परिस्थितियों में एसपीओ रख सकते हैं और उनकी मदद ली जा सकती है। खास कर पुलिस एक्ट 17 उनकी नियुक्ति का उचित करार देता है। जबकि 18,19, 20 उसी से संबंधित है। करीब 120-150 एसपीओ रखने के प्रावधान हैं जिले में। जिसके तहत खूंटी में करीब 70-80 एसपीओ हैं। उम्र के मामले में कहीं कुछ कहा नहीं गया है। उन्होंने कहा एक्ट की बातें ही सबसे महत्वपूर्ण और अह्म होती हैं।
सरयू पाहन, काना मुंडा और उसके साथियेां की पूरी कहानी पूर्व खूंटी एसपी की बातों को झूठलाने और हकीकत बताने के लिए काफी हैं।

 

1 comment:

  1. Sarju pahan ko naxali kyon utha kar le gaye the naxali , ye to clear kijiye ?

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