Friday, 14 February 2014

सुगना की कब्र और मड़ुआ का अंकुर

सुगना की कब्र और मड़ुआ का अंकुर
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गांव के किसी मिट्टी के टीले पर
कोई अंकुर निकला है मडुआ का
वो सिर्फ मिट्टी का टीला नहीं है
भूख से मर गये गांव के
सुगना की कब्र है वो
उसी मिट्टी की गोद में
डर कर छिपा मडुआ का बीज
अब उग आया है शीत पानी से भींग कर,

उसके अनाथ बच्चे छटपटाते हैं
गोबर पानी से लिपे आंगन में
कच्ची मिटटी के ठंडे चुल्हे पर
उग आए धान के अंकुरों को देखकर,
विधवा पत्नी उसके जाने के बाद
उबड़ाकर रखे खाली डेकची के
काले पेंदे को देखती है जैसे
भूख की आग में झुलसकर,

लेकिन इस बार सुगना की पत्नी और बच्चे
भूख से नहीं मरेंगे पर आत्महत्या जरूर करेंगे
क्योंकि जानते हैं वो भूख से मरना
किसी के लिए बहस का कोई मुद्दा नहीं
आत्महत्या से कम से कम इतनी गारंटी तो है
कि उनकी लाशें छपेंगी सभी अखबारों में
मौत के कारणों की पड़ताल के लिए
उसके घर के साथ होगी और भी
गांव के कई ठंडे चुल्हों की तलाशी
उनकी लाशें दुनियां को बता सकेंगी
उन चंद खास भूखे लोगों की दास्तान
जो लाखों वोट और करोड़ो नोट डकारकर
अब भी जीते हैं चुनाव में नई जीत के लिए
और अंधेरे कमरे में तड़पकर कैसे
मर जाता है सुगना भूख से

सुगना की आवाज कब्र से निकल कर
बाहर दुनियां तक पहुंचेगी जरूर
यही कहने को उग आया है
कब्र पर, वो मड़ुआ का अंकुर ।।
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- जसिन्ता केरकेट्टा
Date -25.1.2014

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