Friday, 14 February 2014

क्यों नहीं होता मलाल

क्यों नहीं होता मलाल
..............................

हर साल इस देश की गलियों से निकलकर
हजारों लोग जाते हैं विदेश रंगीन सपने लिए
किसी भारतीय को अगर किसी गोरे ने मार दी चाकू
मानवता चीखती है अपने देश के हर कोने से
देशभक्ति की लहू टपकती है इस देश के सीने से
छिड़ जाती है बहस भारतीयों की सुरक्षा पर
हर कोई टिप्पणी करता है गोरों के नस्लभेदी रवैये पर,

हमारे गांव से निकलकर फूलो भी जाती है
अपने ही देश के किसी शहर में, जहां
चाकू से गोद दिया जाता है उसका चेहरा
बिगाड़ दिया जाता है इंसानी शरीर का नक्शा
इसी देश में नस्लभेदी, संवेदनहीन लोगों द्वारा,
मसल दिया जाता है उन पलाश के फूलों को
जो बिखरी होती है महानगर के हर घर में
जंगल से निकल कर मेहनत के रंग से
उनके घर की चारदिवारियेां को रंगती हुई,

खरीद लिया जाता है उसका कोख
एक ही घर के सारे मर्दो द्वारा
जलाने को चिराग अपने वंश का
उस फूलो की जिंदगी की लौ बुझाकर
लौट आती है वो अपने घर वापस
जब नुचे-खुरचे, चिथड़े-चिथड़े हो चुके
अपनी आत्मा के टुकड़ों को समटते हुए
किसी जिंदा लाश की तरह चलती हुई
तब देश के कोने-कोने से नहीं उठता
ऐसी ही हजारो फूलो की सुरक्षा पर सवाल
नस्लभेदी, संवेदनहीन देश के लोगों को
क्यों नहीं होता अपनी करतूतों पर मलाल।।

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 01.02.2014

No comments:

Post a Comment