Friday, 14 February 2014

आग तो लगानी होगी

आग तो लगानी होगी
----------------------
वो हर दिन निकल जाता है
नरभक्षी कंक्रीट के जंगल में खटने को
बदले में मिल जाता है उसे
कुछ भ्रम के सुनहरे सिक्के
जिसकी चमक में लौटकर घर
वो देखता है.........
अपने बदन की हड्डियों से
मांस को गायब होते हुए
रफ्ता-रफ्ता अपने मस्तिष्क से
रचनाशीलता को छटपटा कर मरते हुए
चुंकि उन्हीं सिक्कों से मिल रहा एक विश्वास
उसे अपने पेट में अन्न डाल सकने को
इसलिए हर रोज वो जाता है
नरभक्षी कंक्रीट के जंगल में खटने को,

नरभक्षी जड़े चूसती हैं उसकी सारी शक्ति
ताकि निर्बाध....
फलने-फुलने और फैलने का
निरंतर चलता उसका यह धंधा रहे
एक झीना जाल सा बिछा होता है
भ्रम की विशाल रोशनियों का वहां
ताकि मजबूरी की हथेलियों पर गिरे
भ्रम के सिक्कों की चमक के नीचे ही
अपने शोषण के प्रति वो ताउम्र अंधा रहे
उस रोशनी के पीछे होती है
एक षडयंत्रकारी व्यवस्था, जिसमें
रोटी के टुकड़ों का इतना निवाला भर उसे
मिलता रहता है एक निष्चित समय तक
जिससे वो
कल फिर काम पर आने को जिंदा रहे।।

नरभक्षी कंक्रीट के जंगल का विस्तार देखो
इस छोर से उस छोर तक फैल रहा है
उस विस्तार का खुद को भी हिस्सा मानकर
वो भ्रम में अंधा मुस्कुराता है
अंदर ही अंदर मगर छटपटाता है
अपने बदन पर लिपटे शिंकजे की तरह
उन मजबूत जड़ों को काटने को
उसे कभी तो हिम्मत जुटानी होगी
अंगार जो जल रहा है उसके अंदर कहीं
उसी अंगार से इस नरभक्षी जंगल में
अब आग तो लगानी होगी।।
-------------------------------
जसिन्ता केरके्टा
दिनांक 15.1.2014

No comments:

Post a Comment