Friday, 14 February 2014

हमदर्दी

हमदर्दी
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ओ री चंपु
तुम्हारे आंगन में वो शक्स कौन है
जो आकर बैठता है घंटों और
तुम चाय-नाश्ता रसोई में बनाती हो
जो बेखबर होता है इस बात से कि
कैसे तुम बगल वालों के घर के चुल्हे से
अपने घर का चुल्हा जलाती हो,

ओ री चंपु
वो जो तुम्हारे संघर्ष पर बतियाता है
कैसे तुम अंतरद्वंद्व की नदी में अकेले
नाव लेकर आंधी तूफां झेलती हुई चलती हो
अपने ही मानसिक समय के चक्र में फंसी
तुम भूत और भविष्य के फंदों के बीच डोलती हो
होगा कुछ नहीं हासिल यूं बोलकर फिर भी
दिल की बात खुलकर बोलती हो,

ओ री चंपु
अपने ही घर में
जन्म लेने के बाद त्याग दिए गए
उन आधे बच्चों को अपनी पीठ पर बांधकर
कच्ची उम्र में बादलों से भरे आकाश में अकेली
उड़ने की कोशिश में अपने डैने फड़फड़ाती हो
पीठ पर बंधे उन चूजों को दाने खिलाने को
आर्थिक तंगी की अंधेरी रात में उजाले के लिए
अपने सपनों को तुम आग लगाती हो
उस आग से अपनी गांठ में बचे-खुचे अधजले
चंद कागज के रूपयों को
उन चूजों के भविष्य के लिए जबरन बचाती हो
तुम्हारे संघर्ष की इन्हीं कहानियों पर
कायल खुद को वो शक्स बताता है
फिर भी तुम्हारी गांठ से चंद रूपये
चालाकी से निकाल कर अपना काम बनाता है
और तुम्हें लगता है
तुमसे कोर्इ हमदर्दी जताता है।।

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 13.2.2014

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