Friday, 14 February 2014

टूटते पहाड़ और टूटती जिंदगियां


टूटते पहाड़ और टूटती जिंदगियां

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पहाड़ के पहाड़ दे दिए जाते हैं
यहां लीज पर
लीज मिले पहाड़ों के सीने पर
होता है हर रोज विस्फोट
एक पहाड़ अब बन जाता है कोई खंडहर
उन खंडहरों में एक उम्र गुजारती हैं
परित्यक्त, विधवा, एकल, गरीब महिलाएं
पत्थर तोड़ती हुई धूल-कणों को सूंघते हुए
खंडहर के अंदर रिसते पानी को पीते हुए
किसी कालेपानी की सजा सी, धीमी मौत मरने को,

हर धमाके के साथ पहाड़ों के बीच टूटती हैं
उन महिलाओं की जिंदगी भी, जो जानती हैं
लंबे अरसे से वहां काम करते-करते
चंद पैसे और एक गंभीर बीमारी के सिवा
अंततः कुछ भी उनके हाथ नहीं बचेगा
महिलाएं जो करती हैं परिवार व बच्चों के लिए
चंद पैसे के बदले फेफड़े में धूल भरने का सौदा
महसूस करती हैं पहाड़ और उनकी स्थिति
एक सी हो गई है जैसे दोनो बेजुबां से,

पहाड़ टूटते हैं पर कुछ बोल नहीं सकते
जो बोल सकते हैं वो अपना मुंह नहीं खोलते
बस देखते हैं टुकुर-टुकुर कैसे कोई
पहाड़, जंगल, जमीन को ट्रकों पर लादकर
ले जा रहा एक मजबूत घर जमाने को
जो कहते हैं खुद को रखवाले, कैसे वो लोग
इन जंगलों-पहाड़ों की खूबसूती देकर किसी गैर को
देखो हाथ हिलाते हुए निकल जाते हैं हर साल
देश के दूसरे भागों में पहाड़ी सैर को ।।

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 6.2.2014

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