Friday, 14 February 2014

स्त्री देह की खूबसूरती के मायने

स्त्री देह की खूबसूरती के मायने
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जीवन संघर्ष में उब - डूब होती
तुम्हारी मजबूत, सशक्त काया की
नहीं होगी कहीं चर्चा
क्योंकि तुम्हारा यौवन अब
समर्पण नहीं, संघर्ष करता है मझधार से,

तुम्हारी जुल्फें उलझी हुई हैं विपरीत
परिस्थिति रूपी वृ़क्ष की टहनियों से
और तुम रचे गए इस परिस्थितियों से
अपनी उलझी लटें छुड़ाने को
काट डालती हो उन टहनियों को
इसलिए नहीं होगी अब चर्चा तुम्हारे जुल्फों की,

तुम अपनी आंखों में काजल रूपी रात
के बाद भोर की लालिमा लिए हर दिन
एक सूरज लेकर उगती हो क्षितिज से
तेज किरणों सा अंगार लिए फिरती हो
जिसके ताप से पास आने वाले झुलसते हैं, इसलिए
अब नहीं होगा तुम्हारे नैनों के सौंदर्य का जिक्र,

तुम विरोध करती हो समाज की उन तमाम
हथकंडों का जो तुम्हें सजा-संवार कर
देवी की भांति रखना चाहते हैं मंदिरों में
क्योंकि अब तुम सड़कों पर उतरती हो
नंगे पांव चलती हो नकार कर
तुम्हारे लिए बनाए फूलों की कोमल सेज को
इसलिए अब नहीं होगा तुम्हारे नख-शिख का वर्णन,

तुम मशालें जलाती हो समाज के सोए लोगों के लिए
नीदें खराब करती हो रह-रहकर
रौद्र रूप लिए दहाड़ती हो शहरों में, जंगलों में
ऐसे में मुश्किल है अब तुम्हारी बलखाती कमर
सुनहरी रंगत, उड़ती हुई जुल्फों की तारीफ करना,

अब तक जो भी था तुम्हारे सौंदर्य का चित्रण
तुमने स्त्री देह की खूबसूरती के सारे मायने बदलकर
संघर्ष से अपनी खूबसूरती के किस्से खुद गढ़ लिए हैं।।

जसिन्ता केरकेट्टा
दिनांक - 12.2.2014

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