Friday, 14 February 2014

पंचायत प्रतिनिधि बनकर क्यों हैं शर्मिंदा....

जसिन्ता केरकेट्टा, रांची

खूंटी जिले के कर्रा प्रखंड का जंगलों के भीतर छोटा सा गांव बिलसेरेंग
झारखंड राज्य में पंचायत चुनाव के तीन साल पूरे हो चुके हंै। लेकिन आज जो जनप्रतिनिधि बनकर पंचायतों में काम कर रहे हैं वो खुद पर शर्मिंदा हैं। पंचायत प्रतिनिधि कहते हैं कारण कुछ भी हो लेकिन चुनाव जीतने के बाद जिस उत्साह से हमने गांव-गांव घूम कर गांव के विकास के सपने ग्रामीणों को दिखाए थे। उनका हौसला बढ़ाया था। आज हमें उनके सामने शर्मिंदा होना पड़ता है। राज्य में 32 सालों के बाद यह पंचायत चुनाव करवाया गया लेकिन आज धरातल पर विकास के नाम पर पंचायतों में अफसरशाही हावी है। राज्य  में पंचायत चुनाव 2010 में संपन्न हुआ और पंचायत प्रतिनिधि बनाये गए। लेकिन हकीकत यह है कि भ्रष्टाचार के कीड़ों से पंचायतों में विकास की जमीन खोखली हो रही है।
  इस चुनाव के बाद पंचायतों में ग्रामसभा को पूरी शक्ति दी जानी थी। पर ग्रामसभा सरकारी पदाधिकारियों के हाथ की कठपुतली बन गई। चुनाव के बाद मुखिया, उपमुखिया बनने वालों ने उत्साह में घूम-घूम कर लोगों को आश्वासन दिया कि अब गांवों में विकास की लहर आ जाएगी। लेकिन तीन सालों में ही उन्हें पंचायती राज व्यवस्था की हकीकत पता चल गई। आज मुखिया, उपमुखिया खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
ग्रामसभा पंचायत की समस्याओं के बारे में अधिकारियों से कहीं अधिक जानकारियां रखती हैं। पर जब ग्रामसभा ने अपनी ओर से योजनाएं बनाकर सरकार के पास भेजी, तो सरकारी स्तर से उन योजनाओं को सिरे से खारिज कर दिया गया। इसके बदले सरकार ने अपने हिसाब से योजनाएं बनाकर पंचायतों में भेजनी शुरू की। ग्रामसभा का काम सिर्फ इतना रह गया कि सरकार की ओर से आयी योजनाओं का अनुपालन कराये। जनप्रतिनिधियों का सवाल है गांव की वास्तविक जरूरतों को नजरअंदाज कर अपने अनुसार विकास के मायने गढ़ने थे और योजनाओं को लागू करना था तो फिर हमारी भूमिका क्या रह जाती है।  यदि यही करना था, तो पंचायत चुनाव किसके लिए कराए गए ? पंचायतों के विकास के नाम पर केंद्र से राज्य तक राशि लाने और उस राशि का योजनाओं के नाम पर बंदरबांट करने के लिए ? अब लोगों को संदेह होता है कि क्या सचमुच पंचायातों के विकास के लिए ही पंचायत चुनाव कराए गए थे? यदि विकास के नाम पर पंचायत चुनाव हुए, तो पंचायतों में विकास के नाम पर क्या है? वहां अधूरे काम, बेरोजगार युवा, निराश पंचायत प्रतिनिधि भर रह गए हैं।
खूंटी जिला परिषद अध्यक्ष मायालीना टोपनो कहती हैं कि कृषि विभाग का हस्तक्षेप रोकने के लिए गत साल ही डीसी को पत्र दिया गया था कि पंचायत के कार्यो में हस्तक्षेप रोका जाए। पर डीसी ने अब तक कोई निर्णय नहीं लिया न इस बाबत उनका कोई पत्र अब जिला परिषद अध्यक्षों को मिला है। पंचायतों को सरकारी विभागों के हस्तक्षेप से मुक्त कर पूरी शक्ति सौंपनी जरूरी है। लेकिन इस राह में बाधा उत्पन्न करने की कोशिशें लगातार की गयी हैं।
खूंटी जिले के कर्रा प्रखंड की प्रमुख मंजुला कहती हैं कि एक योजना की पूरी राशि लाभुकों को दिये बिना नई योजनाओं की राशि का वितरण किया जाता है। पहली योजना की बाकि राशि कहां चली जाती है इसका हिसाब देने वाला कोई नहीं। वो कहती हैं कि हर योजना को पर पूरा किया जाये उसके बाद ही नई योजनाओं पर काम शुरू हो। कई योजनाएं सिर्फ कागजों पर पूरी दिखा दी जाती हैं।
कच्चाबारी पंचायत के उपमुखिया हाबिल कच्छप कहते हैं कि गांव की ओर से भेेजी गयी योजनाओं को खारिज कर दिया गया। पंचायतों पर अफसरशाही हावी है। हमारी योजनाएं उन्हें पसंद नहीं। सरकारी स्तर की योजनाओं को ग्रामीणों पर लादा जा रहा। वैसी योजनाओं का गांव के वास्तविक विकास से कोई लेना-देना नहीं है। मसलन पंचायत में एक गांव से दूसरे गांव को जोड़ने के लिए सड़कें चाहिए थी। पुरानी सड़कों का मरम्मत होना था। आवागमन की सुविधा बेहतर होने से ग्रामीण बाजार से जुड़ते। अब कुंआ बनाने का काम तेजी से चल रहा है। सब्जियां तो उगाई जा रहीं हैं, लेकिन उन्हें बाजार तक पहुंचाने के लिए एक अदद दुरूस्त सड़क तक नहीं। एक योजना दी जा रही है, वहीं कोई दूसरी योजना रोक कर कहीं न कहीं विकास भी बाधित किया जा रहा है। इससे प्रतीत होता है कि पंचायती राज व्यवस्था में पंचायतों का सर्वांगीण विकास मुख्य मकसद नहीं है।
वार्ड सदस्य संतोष परधिया कहते हैं कि सरकारी स्तर पर फंड के पैसों का बंदरबांट हो रहा और गांव वाले पंचायत प्रतिनिधियों पर आरोप मढ़ते हैं कि पैसा हम खा रहे हैं। हमारे लिए तो जन प्रतिनिधि होना अपमान का विषय बन गया है। इससे बेहतर था कि हम एक आम व्यक्ति की तरह इज्जत की रोटी खाते थे। गांव में सिर्फ चौपाल, चबूतरा बनाने का काम चल रहा, जो गांव वालों की पहली प्राथमिकता नहीं है। कृषि, पशुपालन, सड़क की व्यवस्था जैसी जरूरी बातों की जगह भूमि समतलीकरण, चबूतरा, चौपाल बनाकर विकास का दावा किया जा रहा।
वहीं दूसरी ओर एक नजारा यह भी है कि सुदूर इलाकों में लोग चंद योजनाओं को भी ''वरदान'' की तरह देख रहे। जहां इससे पहले कभी विकास की रोशनी नहीं पड़ी थी। कर्रा प्रखंड के छाता पंचायत के बिलसेरेंग गांव में उपमुखिया जकरियस रहते हैं- यह गांव पूरी तरह जंगल के अंदर है। गांव पूरी तरह से नक्सलप्रभावित क्षेत्र में आता है। यहां करीब 536 की आबादी है। पंचायत चुनाव से पहले इस गांव तक कभी विकास की रोशनी नहीं पड़ी। गांव से शहर तक जाने के लिए बेहतर रास्ता नहीं था। लोग खेतों की पगडंडियों से होकर ही जाते थे। कुंआ, तालाब आदि के न होने से सिंचाई की समस्या थी। लेकिन आज कम से कम कुंआ बनने, तालाब बन जाने से लोगों को खेती करने में काफी सुविधा मिल रही है।
वहीं उसी पंचायत में कुरसे गांव ऐसा है, जहां सरकार के अनुसार एक ही परिवार गरीब है और बाकी संपन्न। क्योंकि इस गांव से भेजे गए कई आवेदनों में सिर्फ एक को ही बीपीएल कार्ड मिला है। जिसके कारण गांव के कई लोगों को इंदिरा आवास, राशन कार्ड, वृद्धा पेंशन, परिवारिक लाभ नहीं मिल पा रहा है। हर योजना में बीपीएल होना जरूरी माना जाता है। ऐसे में सिर्फ और सिर्फ बीपीएल कार्ड नहीं होने के कारण लोग न तो राशन कार्ड बन पा रहा है और न ही कोई अन्य सुविधाएं लोगों को मिल रही है। यही स्थिति इस पंचायत के सावड़ा गांव में भी है। वहां भी सौ-दो सौ लोगों के बीच मात्र छह को ही बीपीएल कार्ड प्राप्त हुआ है।
पंचायत चुनाव में फिर बतौर मुखिया, वार्ड सदस्य के रूप में खड़े होने की बात पूछने पर आधे से अधिक मुखिया कहते हैं कि जनप्रतिनिधि बनकर गांववालों के सामने हम शर्मिंदा हैं। हमने जो वादा किया था उन वादों पर हम खरा नहीं उतर पा रहे ऐसे में प्रतिनिधि बनकर फिर से ग्रामीणों को झूठे सपने दिखाना कहां तक सही है? लेकिन कुछ मायूस होकर कहते हैं कि लेकिन अधूरे कामों को पूरा करने की जिम्मेवारी कौन लेगा। इसलिए पंचायत प्रतिनिधियों को विवेकपूर्ण निर्णय लेना होगा।

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