Thursday, 13 February 2014

पत्थरों के बीच टूटती जिंदगी



जसिन्ता केरकेट्टा, रांची
                                     ’’ पहाड़ के पहाड़ दे दिए जाते हैं
                                                 यहां लीज पर
                                      लीज मिले पहाड़ों के सीने पर
                                        होता है हर रोज विस्फोट
                                एक पहाड़ अब बन जाता है कोई खंडहर
                                उन खंडहरों में एक उम्र गुजारती हैं
                             परित्यक्त, विधवा, एकल, गरीब महिलाएं
                             पत्थर तोड़ती हुई धूल-कणों को सूंघते हुए
                            खंडहर के अंदर रिसते पानी को पीते हुए
                         किसी कालेपानी की सजा सी, धीमी मौत मरने को ’’
ये चंद पंतियां हैं मेरी ’’ टूटते पहाड़ और टूटती जिंदगियां ’’ शीर्षक कविता की। जिसमें मैंने उन महिलाओं की स्थिति को स्पष्ट करने की कोशिश की है। जो बचपन से पत्थर खदानों में काम करने को मजबूर हैं। ऐसी महिलाएं प्रायः विधवा हो चुकी हैं, परित्यक्त हैं या जिनके परिवार में पुरूष बीमार हैं या काम पर नहीं जाते। झारखंड में कोई ऐसा जिला नहीं है जहां पत्थर खनन का काम नहीं चल रहा और खास कर अवैध तरीके से। इसमें राज्य के उच्च पदों में विराजमान परिवार के सदस्य तक शामिल हैं। पहाड़ के पहाड़ लीज पर दे दिए जा रहें हैं। और आस-पास की महिलाएं अपना पूरा जीवन इन खदानों में लगा रही हैं। इन स्थानों पर सबसे ज्यादा महिलाएं काम पर लगी हुई है। पत्थर खदानों में काम करने वाली इन महिलाओं की जिंदगी भी पत्थरों के साथ टुकड़ों में टूटती है हर रोज। बम के धमाके के बीच वे अपनी जिंदगी में भी एक धमाका सा महसूस करती है लेकिन इसके पीछे कई कारण हैं जिनके कारण वे पत्थर खदानों में काम करने को मजबूर हैं।
झारखंड में पत्थर खदानों में सबसे ज्यादा महिलाएं काम कर रही हैं। पत्थर खदान में जहां दो - तीन पुरूष नजर आएंगे वहीं 10 से 15 महिलाएं काम करती नजर आएंगी। इसके कारणों की पड़ताल करने की भी जरूरत है कि महिलाएं ही पत्थर खदानों में सबसे ज्यादा क्यों हैं? महिलाओं के खदान में आने से कई बार उनके स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे भी कार्यस्थल पर आ जाते हैं। महिलाएं कई बार अपने साथ अपने नन्हें बच्चों को भी लेकर आती हैं। पास ही बच्चों को लिटाकर वे काम करती हैं। जो कि न केवल एक मां के लिए बल्कि उसके बच्चे के लिए भी खतरनाक है। पत्थर की तुड़ाई जब मशीनों से होती है तो काफी मात्रा में धूल-गर्द उड़ता है। पूरा माहौल धूल-गर्द से भर जाता है। अनजाने ही इसके शिकार आस-पास लिटाए नन्हें बच्चें भी होते हैं। पत्थर खदानों में काम करने वाली महिलाएं जानती हैं कि धीरे-धीरे धूल-गर्द से उन्हें बीमारी हो सकती है लेकिन दूरस्थ परिणामों के बजाय उन्हें वर्तमान की आर्थिक तंगी नजर आती है। झारखंड में कई पत्थर खदान और क्रशर काफी लंबे समय से चल रहे। कई महिलाएं ऐसी हैं जिन्होंने बचपन से काम करते हुए अपनी जिंदगी का आधा पड़ाव पत्थर खदान में ही गुजार दिया। उन्हें लगता है रोज-रोज शहर जाकर वहां चैराहे पर खड़े होकर काम की तलाश करने से अच्छा है कि वे पत्थर खदानों में ही काम करंे। इससे कम से कम उन्हें परिवार चलाने के लिए पैसे तो मिल जाते हैं और दूर जाने की जरूरत भी नहीं पड़ती है। यही वजह है कि महिलाएं अपने गांव के आस-पास के पत्थर खदानों में सारी परेशानियों के बाद भी काम करने को तैयार हो जाती हैं।
यहां काम करने वाली महिलाएं शारीरिक, मानसिक, समाजिक और आर्थिक  रूप से कमजोर और असहाय नजर आती हंै। जहां महिलाएं स्टोन क्रशर में धूल के बादलों के बीच मुंह छुपा-छुपा कर चोरी-चोरी से धूल को अपने फेफड़े में डालते हुए जीती हैं। वहीं एक-एक पत्थर खदान के मालिक झारखंड से पूरे पहाड़ों को ही पत्थर खदान के रूप में तब्दील कर उसे खंडहर बना रहा है। स्वयं करोड़ों की कमाई कर रहे और ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी पत्थर खदानों के खंडहरों में ही दफन हो रही है।
                               ’’ हर धमाके के साथ पहाड़ों के बीच टूटती हैं
                                  उन महिलाओं की जिंदगी भी, जो जानती हैं
                                   लंबे अरसे से वहां काम करते-करते
                                  चंद पैसे और एक गंभीर बीमारी के सिवा
                                अंततः कुछ भी उनके हाथ नहीं बचेगा
                             महिलाएं जो करती हैं परिवार व बच्चों के लिए
                            चंद पैसे के बदले फेफड़े में धूल भरने का सौदा
                             महसूस करती हैं पहाड़ और उनकी स्थिति
                             एक सी हो गई है जैसे दोनो बेजुबां से ’’
अनगड़ा प्रखंड में लामकाबेड़ा में 20-25 सालों से चल रहे पत्थर खदान में लंबे समय तक काम करने वाली करमी कहती हैं कि पत्थर तोड़ने के लिए जब धमाके किए जाते हैं तो पहाड़ के पास ही बना उसका झोपड़ा हिल जाता है। घर बुरी तरह स्टाॅन क्रशर से उड़ते धूल-गर्द की सफेदी से पुता हुआ है। अतरी देवी कहती हैं कि जो हाजिरी में काम करती हैं उनको गुड़ मिलता है लेकिन जो ठेका में काम करती है उनको गुड़ नहीं मिलता। जबकि नियम के अनुसार क्रशर में काम करने वाली महिलाओं को बीमारी से बचने के लिए गुड़ दिया जाना अनिवार्य है। फूलो इस खदान में काम करने वाली सबसे पुरानी आदिवासी महिला है। वह बचपन से काम कर रही है और अब उसकी शादी भी हो गई है। वह कहती हैं कि खंडहरनुमा पहाड़ के अंदर ही पानी रिसता है। जिसका उपयोग महिलाएं पीने के पानी के रूप में करती हैं।
नामकुम प्रखंड के महिलौंग स्थित स्टोन क्रशर में खुशी मुंडा जिसकी उम्र महज 10 साल होगी काम करती है। खुशी कच्ची उम्र में अपनी मां को आर्थिक मदद देने के लिए काम कर रही है। इससे पहले वह बचपन से शहरों में घरेलू कामगार का काम करती थी। जब थोड़ी बड़ी हुई तो रेजा का काम करती थी। लेकिन अब अपने गांव के पास ही स्टोन क्रशर में पत्थर तोड़ने, ढोने का काम कर रही। खुशी की मां विधवा है और उसके दो बड़े भाई हैं। एक छोटा भाई भी है जो दूसरों के घरों में काम करता है और वह शहर में उन्हीं लोगों के घर में ही रहता है। गांव में एक कमरे वाला एक मिट्टी का घर है। जिसमें एक रसोई रूम है और दूसरा एक कमरा है। जहां वह कुछ किताबे लेकर राम में पढ़ती है। रसोई रूम में ही वह अपनी मां के साथ सोती है। उसके घर में न तो ठंड से बचने के लिए कंबल है न ही कोई बेड। खुशी की मां बालो मुंडा की उम्र 65 है। वह 15 साल से स्टोन क्रशर में काम कर रही है। अपनी पूरी जिंदगी क्रशर में काम कर वह गुजार रही है। उसकी मां की कमाई से पूरे परिवार का खर्च निकलता है। इन दिनों खुशी और उसकी मां दोनों मिलकर परिवार के खर्चे चला रहें। दूसरी ओर खुशी के दो भाई हैं जो कुछ नहीं करते। वो इधर-उधर भटकते हैं और आवारागर्दी करते हैं। मां-बेटी की कमाई से पूरे परिवार का खर्च चल रहा है। तुपुदाना प्रखंड स्थित बिरचनद्वार सिंह के स्टोन क्रशर में काम करने वाली करीब 15-20 महिलाएं हैं। जिसमें आधे से अधिक महिलाएं विधवा हैं। आधी कच्ची उम्र की महिलाएं हैं।
इन आदिवासी महिलाओं का जिक्र सिर्फ इसलिए कर रही कि एक ओर आदिवासी युवा बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण महिलाएं परिवार के भरण-पोषण के लिए अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगाए बैठी हैं। ऐसी महिलाओं का शैक्षणिक, आर्थिक, समाजिक स्तर बहुत ही निम्न है। ऐसे परिवारों में जन्म लेने वाली बेटियों का भविष्य भी अंधकारमय है। संपन्न परिवारों की चंद महिलाओं की स्थिति आर्थिक, समाजिक और शैक्षणिक रूप से भले ही मजबूत हो लेकिन सुदूर इलाकों में रहने वाली महिलाएं आज भी सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति को छोड़ सिर्फ और सिर्फ किसी तरह अपनी आर्थिक स्थिति को ठीक कर लेने के लिए ताउम्र जद्दोजहद कर रही हैं। पत्थर खदान में चुंकि सबसे ज्यादा महिलाएं काम कर रहीं और आदिवासी महिलाओं की संख्या इनमें सबसे अधिक है। और इन महिलाओं की स्थिति नजरअंदाज होती रही है। इसलिए जरूरत है किताबों से दरकिनार कर दिए गए इन मुद्दों व स्थितियों पर भी विचार हो।

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